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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1398
ऋषिः - भरद्वाजो बार्हस्पत्यः देवता - अग्निः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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ब्र꣡ह्म꣢ प्र꣣जा꣢व꣣दा꣡ भ꣢र꣣ जा꣡त꣢वेदो꣣ वि꣡च꣢र्षणे । अ꣢ग्ने꣣ य꣢द्दी꣣द꣡य꣢द्दि꣣वि꣢ ॥१३९८॥

स्वर सहित पद पाठ

ब्र꣡ह्म꣢꣯ । प्र꣣जा꣡व꣢त् । प्र꣡ । जा꣡व꣢꣯त् । आ । भ꣣र । जा꣡त꣢꣯वेदः । जा꣡त꣢꣯ । वे꣡दः । वि꣡च꣢꣯र्षणे । वि । च꣣र्षणे । अ꣡ग्ने꣢꣯ । यत् । दी꣣द꣡य꣢त् । दि꣣वि꣢ ॥१३९८॥


स्वर रहित मन्त्र

ब्रह्म प्रजावदा भर जातवेदो विचर्षणे । अग्ने यद्दीदयद्दिवि ॥१३९८॥


स्वर रहित पद पाठ

ब्रह्म । प्रजावत् । प्र । जावत् । आ । भर । जातवेदः । जात । वेदः । विचर्षणे । वि । चर्षणे । अग्ने । यत् । दीदयत् । दिवि ॥१३९८॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1398
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 7; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 12; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
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पदार्थ -

पिछले मन्त्र में उत्तम सन्तान का उल्लेख था । उसी प्रसङ्ग में कहते हैं कि हे प्रभो! यह सब तो आपकी कृपा से होता है । हे (जातवेदः) = सर्वज्ञ ! (विचर्षणे) = विशेषरूप से सबका ध्यान [चर्षणिः पश्यतिकर्मा—to look after] करनेवाले (अग्ने) = सबकी उन्नति-साधक प्रभो ! (प्रजावत्) = प्रजा की भाँति (ब्रह्म) = ज्ञान को भी तो (आभर) =  समन्तात् हमारे अन्दर भरने का ध्यान कीजिए। आपने हमें सन्तान प्राप्त कराई है तो ज्ञान भी प्राप्त कराइए । मूर्ख सन्तान से तो 'अजात और मृत' सन्तानें ही अच्छी हैं। सन्तान न हुई हो अथवा होकर मर गयी हो तो उतना दुःख नहीं होता जितना कि मूर्खसन्तान से। पहली दो एक बार ही दुःख देनेवाली होती हैं— मूर्ख सन्तान तो पग-पग पर दुःख का कारण बनती है, इसलिए हे प्रभो ! हमें तो वही सन्तान दीजिए, (यत्) = जो (दिवि) = ज्ञान के प्रकाश में (दीदयत्) = खूब चमकनेवाली हो और (दिवि) = विद्वानों में (दीदयत्) = शोभा पाए । संक्षेप में हमारी सन्तान ‘भरद्वाज' – बल- सम्पन्न होती हुई 'बार्हस्पत्य' – ऊँचे ज्ञानवाली हो । 

भावार्थ -

प्रभुकृपा से हम ज्ञानी सन्तान प्राप्त करें ।

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