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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1430
ऋषिः - नृमेधपुरुमेधावाङ्गिरसौ
देवता - इन्द्रः
छन्दः - अनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
काण्ड नाम -
3
त꣡त्ते꣢ य꣣ज्ञो꣡ अ꣢जायत꣣ त꣢द꣣र्क꣢ उ꣣त꣡ हस्कृ꣢꣯तिः । त꣡द्विश्व꣢꣯मभि꣣भू꣡र꣢सि꣣ य꣢ज्जा꣣तं꣢꣫ यच्च꣣ ज꣡न्त्व꣢म् ॥१४३०॥
स्वर सहित पद पाठतत् । ते꣣ । यज्ञः꣢ । अ꣣जायत । त꣢त् । अ꣣र्कः꣢ । उ꣣त꣢ । ह꣡स्कृ꣢꣯तिः । त꣢त् । वि꣡श्व꣢꣯म् । अ꣣भिभूः꣢ । अ꣣भि । भूः꣢ । अ꣢सि । य꣢त् । जा꣣त꣢म् । यत् । च꣣ । ज꣡न्त्व꣢꣯म् ॥१४३०॥
स्वर रहित मन्त्र
तत्ते यज्ञो अजायत तदर्क उत हस्कृतिः । तद्विश्वमभिभूरसि यज्जातं यच्च जन्त्वम् ॥१४३०॥
स्वर रहित पद पाठ
तत् । ते । यज्ञः । अजायत । तत् । अर्कः । उत । हस्कृतिः । तत् । विश्वम् । अभिभूः । अभि । भूः । असि । यत् । जातम् । यत् । च । जन्त्वम् ॥१४३०॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1430
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 19; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 12; खण्ड » 6; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 19; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 12; खण्ड » 6; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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विषय - आत्मविजय से विश्व-विजय तक
पदार्थ -
पिछले मन्त्र के प्रसङ्ग से ही कहते हैं कि वृत्रहनन कर लेने पर १. (तत्) = तब (ते) = तेरा यह जीवन य(ज्ञः) = यज्ञरूप हो जाता है । वासना- विनाश हुआ और जीवन यज्ञमय बना । २. (तत्) = तभी अर्कः (ते) = ये मन्त्र तेरे होते हैं । अर्क निरुक्त में मन्त्रवाचक भी है । मनुष्य वृत्रहनन के बाद ही ज्ञानी बन सकता है। ३. (उत) = और तभी (हस्कृतिः) = तेरे जीवन में प्रकाशमय दिन का निर्माण होता है। तेरे जीवन में उत्तरोत्तर प्रकाश की वृद्धि होकर अन्धकारमयी रात्रि समाप्त हो जाती है और प्रकाश का आधार दिन-ही- दिन हो जाता है और ४. सबसे बड़ी बात तो यह कि (तत्) = तभी (विश्वम्) = सब संसार को (यत् जातम्) = जो हो चुका है (यत् च जन्त्वम्) = जो होना है इस सब विश्व को (अभिभूः असि) = अपने वश में करनेवाला होता है। मनु ने कहा है कि ('जितेन्द्रियो हि शक्नोति वशे स्थापयितुं प्रजाः'), राजा स्वयं जितेन्द्रिय बनकर ही लोकों पर शासन करता है ।
भावार्थ -
जितेन्द्रिय ही विश्व को जीतता है।
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