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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1431
ऋषिः - नृमेधपुरुमेधावाङ्गिरसौ देवता - इन्द्रः छन्दः - अनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः काण्ड नाम -
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आ꣣मा꣡सु꣢ प꣣क्व꣡मैर꣢꣯य꣣ आ꣡ सूर्य꣢꣯ꣳ रोहयो दि꣣वि꣢ । घ꣣र्मं꣡ न सामं꣢꣯ तपता सुवृ꣣क्ति꣢भि꣣र्जु꣢ष्टं꣣ गि꣡र्व꣢णसे बृ꣣ह꣢त् ॥१४३१॥

स्वर सहित पद पाठ

आ꣣मा꣡सु꣢ । प꣣क्व꣢म् । ऐ꣡र꣢꣯यः । आ । सू꣡र्य꣢꣯म् । रो꣣हयः । दिवि꣢ । घ꣣र्म꣢म् । न । सा꣡म꣢꣯न् । त꣣पता । सुवृक्ति꣡भिः꣢ । सु꣣ । वृक्ति꣡भिः꣢ । जु꣡ष्ट꣢꣯म् । गि꣡र्व꣢꣯णसे । गिः । व꣣नसे । बृहत् ॥१४३१॥


स्वर रहित मन्त्र

आमासु पक्वमैरय आ सूर्यꣳ रोहयो दिवि । घर्मं न सामं तपता सुवृक्तिभिर्जुष्टं गिर्वणसे बृहत् ॥१४३१॥


स्वर रहित पद पाठ

आमासु । पक्वम् । ऐरयः । आ । सूर्यम् । रोहयः । दिवि । घर्मम् । न । सामन् । तपता । सुवृक्तिभिः । सु । वृक्तिभिः । जुष्टम् । गिर्वणसे । गिः । वनसे । बृहत् ॥१४३१॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1431
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 19; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 12; खण्ड » 6; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
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पदार्थ -

१. (आमासु) = वृत्रहनन के द्वारा तू इन अपरिपक्व शरीरों में (पक्वम्) = पक्वता (ऐरयः) = प्राप्त कराता है। वासना के विनष्ट होने पर शरीर के सब अङ्ग सुदृढ़ हो जाते हैं, क्योंकि वासना- विनाश से शरीर में शक्ति सुरक्षित रहती है । २. इस वृत्रहनन के द्वारा ही तू (सूर्यम्) = ज्ञानरूप सूर्य को (दिवि) = मस्तिष्करूप द्युलोक में (आरोहयः) = उदित करता है । वासना विनाश से सुरक्षित सोम ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है और ज्ञानसूर्य अधिक और अधिक दीप्त होता चलता है । ३. इस वृत्रहनन के द्वारा तुम (घर्मं न) = तेजस्विता की भाँति (सामम्) = शान्ति को (सुवृक्तिभिः) = प्रभु स्तुतियों के साथ [नि० २.२४] (तपत) = दीप्त करो । [घृ=दीप्ति, साम–Calmness], अर्थात् वृत्रहत्या का परिणाम हमारे जीवनों में इस रूप में प्रकट होता है कि हम प्रभु-स्तवन करते हैं और हमारे शरीरों में तेजस्विता की दीप्ति प्रकट होती है तथा मन के अन्दर शान्ति का राज्य होता है। यह तेजस्वितावाली शान्ति (गिर्वणसे) = वेदवाणियों के द्वारा स्तुति किये जानेवाले प्रभु के लिए (बृहत् जुष्टम्) = बड़ी प्रिय है। यदि हमारे जीवनों में यह शान्ति होती है तो हम प्रभु के प्रिय बनते हैं।

भावार्थ -

हमारे शरीर सुदृढ़ हों, मस्तिष्क में ज्ञानरूप सूर्य का उदय हो, हमें तेजस्विता के साथ शान्ति प्राप्त हो, हम प्रभु-स्तवन करते हुए प्रभु के प्रिय हों ।

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