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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1457
ऋषिः - वसिष्ठो मैत्रावरुणिः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)
स्वरः - पञ्चमः
काण्ड नाम -
1
मा꣢ नो꣣ अ꣡ज्ञा꣢ता वृ꣣ज꣡ना꣢ दुरा꣣ध्यो꣢३꣱मा꣡शि꣢वा꣣सो꣡ऽव꣢ क्रमुः । त्व꣡या꣢ व꣣यं꣢ प्र꣣व꣢तः꣣ श꣡श्व꣢तीर꣣पो꣡ऽति꣢ शूर तरामसि ॥१४५७॥
स्वर सहित पद पाठमा꣢ । नः꣢ । अ꣡ज्ञा꣢꣯ताः । अ । ज्ञा꣢ताः । वृज꣡नाः꣢ । दु꣣राध्यः꣢ । दुः꣣ । आध्यः꣢ । मा । अ꣡शि꣢꣯वासः । अ । शि꣣वासः । अ꣡व꣢꣯ । क्र꣣मुः । त्व꣡या꣢ । व꣣य꣢म् । प्र꣣व꣡तः꣢ । श꣡श्व꣢꣯तीः । अ꣣पः꣢ । अ꣡ति꣢꣯ । शू꣣र । तरामसि ॥१४५७॥
स्वर रहित मन्त्र
मा नो अज्ञाता वृजना दुराध्यो३माशिवासोऽव क्रमुः । त्वया वयं प्रवतः शश्वतीरपोऽति शूर तरामसि ॥१४५७॥
स्वर रहित पद पाठ
मा । नः । अज्ञाताः । अ । ज्ञाताः । वृजनाः । दुराध्यः । दुः । आध्यः । मा । अशिवासः । अ । शिवासः । अव । क्रमुः । त्वया । वयम् । प्रवतः । शश्वतीः । अपः । अति । शूर । तरामसि ॥१४५७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1457
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 6; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 13; खण्ड » 3; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 6; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 13; खण्ड » 3; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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विषय - सत्सङ्ग व साफल्य
पदार्थ -
हे प्रभो ! आपकी कृपा से हम दृढ़ सङ्कल्प व ज्योति से युक्त हों और (नः) = हमें (अज्ञाता:) = अज्ञातप्रच्छन्नरूप से अन्दर प्रविष्ट हो जानेवाले अथवा [न ज्ञातं येषाम्] ज्ञानशून्य (वृजना:) = पापी (दुराध्यः) = दुष्ट ध्यान करनेवाले–सदा अशुभ का चिन्तन करनेवाले (अशिवासः) = अमङ्गलरूप लोग (मा मा अवक्रमुः) = हमारे समीप कदापि न आएँ । हमें कभी ऐसे लोगों का सङ्ग न प्राप्त हो । सदा सत्सङ्ग को प्राप्त होते हुए हम ज्ञान को प्राप्त करनेवाले पुण्यकृत्, स्वाध्याय – शुभचिन्तन करनेवाले और शिवा [मङ्गलरूप] ही बनें ।
(वयम्) = हम (त्वया प्रवत:) = तुझ रक्षक से [प्रवतः अवतिकर्मा – नि० १०.२०] (शश्वती:) = प्लुत गतिवाले, अर्थात् जिनके लिए हम अत्यन्त परिश्रम कर रहे हैं, ऐसे (अप:) = कर्मों को हे (शूर) = सब विघ्नों की हिंसा करनेवाले प्रभो ! (अति तरामसि) = पार कर जाएँ, अर्थात् सब कर्मों में हमें सफलता प्राप्त हो। वस्तुतः यदि मनुष्य प्रभु को अपना रक्षक अनुभव करता हुआ परिश्रमपूर्वक कर्म करता है तो विघ्नध्वंसकारी प्रभु उसे कर्म के पार पहुँचाते ही हैं।
भावार्थ -
हम अशिव लोगों के सङ्ग से दूर रहें तथा प्रभुकृपा से परिश्रमपूर्वक कर्मों में साफल्य । का लाभ करें |
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