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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1798
ऋषिः - वसिष्ठो मैत्रावरुणिः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - विराडनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
काण्ड नाम -
4
श्रु꣣धी꣡ हवं꣢꣯ विपिपा꣣न꣢꣫स्याद्रे꣣र्बो꣢धा꣣ वि꣢प्र꣣स्या꣡र्च꣢तो मनी꣣षा꣢म् । कृ꣣ष्वा꣢꣫ दुवा꣣ꣳस्य꣡न्त꣢मा꣣ स꣢चे꣣मा꣢ ॥१७९८॥
स्वर सहित पद पाठश्रु꣣धि꣢ । ह꣡व꣢꣯म् । वि꣡पिपान꣡स्य꣢ । वि꣢ । पिपान꣡स्य꣢ । अ꣡द्रेः꣢꣯ । अ । द्रेः꣣ । बो꣡ध꣢꣯ । वि꣡प्र꣢꣯स्य । वि । प्र꣣स्य । अ꣡र्च꣢꣯तः । म꣣नीषा꣢म् । कृ꣣ष्व꣢ । दु꣡वा꣢꣯ꣳसि । अ꣡न्त꣢꣯मा । स꣡चा꣢꣯ । इ꣣मा꣢ ॥१७९८॥
स्वर रहित मन्त्र
श्रुधी हवं विपिपानस्याद्रेर्बोधा विप्रस्यार्चतो मनीषाम् । कृष्वा दुवाꣳस्यन्तमा सचेमा ॥१७९८॥
स्वर रहित पद पाठ
श्रुधि । हवम् । विपिपानस्य । वि । पिपानस्य । अद्रेः । अ । द्रेः । बोध । विप्रस्य । वि । प्रस्य । अर्चतः । मनीषाम् । कृष्व । दुवाꣳसि । अन्तमा । सचा । इमा ॥१७९८॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1798
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 13; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 3; सूक्त » 4; मन्त्र » 1
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 13; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 3; सूक्त » 4; मन्त्र » 1
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विषय - वसिष्ठ की प्रभु-अर्चना
पदार्थ -
१. हे प्रभो! आप (हवम्) = पुकार को (श्रुधी) = सुनिए । किसकी ? [क] (विपिपानस्य) = जो आपके दर्शन का अत्यन्त प्यासा है । [ख] (अद्रेः) = जो आपके दर्शन के दृढ़ निश्चय से हटाया नहीं जा सकता । वस्तुत: वसिष्ठ प्रभु-दर्शन के लिए अत्यन्त उत्कण्ठित है। वह प्रभु से प्रार्थना करता है कि आप मेरी पुकार सुनिए और मुझे दर्शन दीजिए। जैसे प्यासे को सिवाय पानी के और कुछ नहीं रुचता इसी प्रकार मेरा सन्तोष आपके दर्शन के सिवाय किसी भी और वस्तु से नहीं हो सकता । मुझे इस दर्शन के दृढ़ निश्चय से 'सन्तान-सम्पत्ति - आमोद, प्रमोद व दीर्घजीवन' आदि का कोई भी प्रलोभन पृथक् नहीं कर सकता। मैं अपने इस निश्चय पर चट्टान की भाँति दृढ़ हूँ — अद्रि हूँ।
२. (विप्रस्य) = विशेषरूप से अपने पूरण [प्रा-पूरणे] के लिए प्रयत्नशील और इसीलिए (अर्चतः) = आपकी अर्चना करते हुए मेरी (मनीषाम्) = बुद्धि को (बोध) = आप ज्ञान के प्रकाशवाला कीजिए ।
हे प्रभो! आप अपने प्रिय का कल्याण करने के लिए उसकी बुद्धि को ही तो सुन्दर बना देते हैं। मैं भी आपका भक्त हूँ- आपकी अर्चना में लगा हूँ। आपकी अर्चना द्वारा अपनी न्यूनताओं को दूर करना चाहता हूँ। आप मेरी बुद्धि को बोधमय कीजिए- मुझे प्रकाश दिखाइए, जिससे मैं ठीक मार्ग का ही आक्रमण करूँ ।
३. (कृष्वा दुवांसि) = [दुवस्= Wealth] आप मुझे धन प्राप्त कराइए । हे प्रभो ! मैं क्यों इस धनार्जन में अपना समय नष्ट करूँ। मेरे लिए आवश्यक धन तो आपने ही प्राप्त कराना है। मेरा समय तो जीवन को पवित्र बनाने में, बुद्धि को प्रकाशमय करने में और आपकी आज्ञानुसार लोकहित में व्यतीत हो । यह प्राकृतिक शरीर आपका दिया हुआ है, इसका पोषण तो आपको ही करना है।
४. हम तो इस धन के धन्धे में न उलझकर आपको पाने के लिए ही प्रयत्नशील हों और (अन्तम्) = आपकी समीपता को (आ सचेम) = सर्वथा सेवन करनेवाले बनें ।
भावार्थ -
१. मेरी प्रभु- दर्शन की प्यास अत्यन्त तीव्र हो, २. मैं प्रभु - दर्शन के दृढ़ निश्चय से किसी भी प्रकार विदीर्ण [पृथक्] न किया जा सकूँ, ३. मुझमें अपने जीवन की पूर्णता के लिए सतत प्रयत्न हो, ४. इसीलिए मैं प्रभु का अर्चन करूँ, ५. प्रकाश को देखने का प्रयत्न करूँ, ६. धन को धन्धा न बनाकर प्रभु पर विश्वास से चलूँ; और ७. अन्त में प्रभु के सामीप्य का अनुभव करूँ । वसिष्ठ की आराधना इससे भिन्न हो ही कैसे सकती है ?