Sidebar
सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1866
ऋषिः - पायुर्भारद्वाजः
देवता - संग्रामशिषः
छन्दः - पङ्क्तिः
स्वरः - पञ्चमः
काण्ड नाम -
1
य꣡त्र꣢ बा꣣णाः꣢ स꣣म्प꣡त꣢न्ति कुमा꣣रा꣡ वि꣢शि꣣खा꣡ इ꣢व । त꣡त्र꣢ नो꣣ ब्र꣡ह्म꣢ण꣣स्प꣢ति꣣र꣡दि꣢तिः꣣ श꣡र्म꣢ यच्छतु वि꣣श्वा꣢हा꣣ श꣡र्म꣢ यच्छतु ॥१८६६॥
स्वर सहित पद पाठय꣡त्र꣢꣯ । बा꣣णाः꣢ । सं꣣प꣡त꣢न्ति । स꣣म् । प꣡त꣢꣯न्ति । कु꣣माराः꣢ । वि꣣शिखाः꣢ । वि꣣ । शिखाः꣢ । इ꣣व । त꣡त्र꣢꣯ । नः꣣ । ब्र꣡ह्म꣢꣯णः । प꣡तिः꣢꣯ । अ꣡दि꣢꣯तिः । अ । दि꣣तिः । श꣡र्म꣢꣯ । य꣢च्छतु । विश्वा꣡हा꣢ । श꣡र्म꣢꣯ । य꣣च्छतु ॥१८६६॥
स्वर रहित मन्त्र
यत्र बाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव । तत्र नो ब्रह्मणस्पतिरदितिः शर्म यच्छतु विश्वाहा शर्म यच्छतु ॥१८६६॥
स्वर रहित पद पाठ
यत्र । बाणाः । संपतन्ति । सम् । पतन्ति । कुमाराः । विशिखाः । वि । शिखाः । इव । तत्र । नः । ब्रह्मणः । पतिः । अदितिः । अ । दितिः । शर्म । यच्छतु । विश्वाहा । शर्म । यच्छतु ॥१८६६॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1866
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 6; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 21; खण्ड » 1; सूक्त » 6; मन्त्र » 3
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 6; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 21; खण्ड » 1; सूक्त » 6; मन्त्र » 3
Acknowledgment
विषय - पूर्ण प्रयत्न और कल्याण
पदार्थ -
प्रस्तुत मन्त्र में ' बाणा: ' शब्द जीवात्मा के लिए प्रयुक्त हुआ है। उपनिषद् में ‘प्रणव' को धनुष कहा है, ब्रह्म को ‘लक्ष्य' और आत्मा को 'शर' [शरो ह्यात्मा] । वह जीव जो निरन्तर [वण्-to sound] उस प्रभु का गुणगान कर रहा है 'बाण' है । ये 'बाण' प्रभु के नाम जपने में लगे हों और हाथ-पर-हाथ रखकर बैठे हों, ऐसी बात नहीं; वे निरन्तर क्रियाशील हैं। ये ही कामादि शत्रुओं को बुरी तरह से मारनेवाले होने से 'कुमार' है । ये अपने जीवन में वासनाओं के विनाश के लिए बद्धप्रतिज्ञ हैं, ये अपनी शिखा को उसी दिन बाँधेंगे जिस दिन अपनी प्रतिज्ञा को पूरा कर लेंगे । इसी से यहाँ मन्त्र में इन्हें 'विशिख' कहा है। जब मनुष्य अपना जीवन इस प्रकार का बनाता है तभी वह ज्ञान का पति, विनाशरहित प्रभु उनका कल्याण करते हैं । (यत्र) = जिस समय में (बाणा:) = प्रभु के नाम जप करनेवाले (सम्पतन्ति) = सम्यक् गतिशील होते हैं, अपने को सदा उत्तम कार्यों में व्याप्त रखते हैं, और इस प्रकार (कुमारा:) = कामादि वासनाओं को बुरी तरह से मारनेवाले होते हैं और (वि-शिखाइव) = ऐसे प्रतीत होते हैं कि इन्होंने वासना-विजय के लिए प्रतिज्ञा - सी धारण की है और प्रतिज्ञापूर्ति तक अपनी शिखा न बाँधने का निश्चय किया है (तत्र) = उस समय (ब्रह्मणस्पतिः) = ज्ञान का पति परमात्मा (अदितिः) = जिसकी शरण में जाने पर खण्डन या नाश का भय नहीं [अविद्यमाना दितिर्यस्मात्] (नः) = हमें (शर्म) = कल्याण व सुख (यच्छतु) = प्राप्त कराए और अब तो (विश्वाहा) = सब दिन, अर्थात् सदा (शर्म यच्छतु) = वे प्रभु हमें कल्याण प्राप्त कराएँ ।
वस्तुत: जिस दिन हम १. वाणा: = प्रभु स्तवन में रत होंगे, २. सम्पतन्ति = उत्तम क्रियाशील होंगे। ३. कुमारा:=वासनाओं को कुचलनेवाले बनेंगे, ४. विशिखा इव - वासनाविनाश के लिए वद्धप्रतिज्ञ होंगे, उसी दिन हम प्रभु की कृपा के पात्र होंगे और कल्याण के भागी होंगे। बिना जीव के पूर्ण प्रयत्न के प्रभु अपने आप ही हमारा कल्याण नहीं कर देते ।
भावार्थ -
हम वासना- विनाश के लिए पूर्ण प्रयत्न करते हुए प्रभु के कृपापात्र बनें ।
इस भाष्य को एडिट करें