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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 547
ऋषिः - ययातिर्नाहुषः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - अनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
काण्ड नाम - पावमानं काण्डम्
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सु꣣ता꣢सो꣣ म꣡धु꣢मत्तमाः꣣ सो꣢मा꣣ इ꣡न्द्रा꣢य म꣣न्दि꣡नः꣢ । प꣣वि꣡त्र꣢वन्तो अक्षरन्दे꣣वा꣡न्ग꣢च्छन्तु वो꣢ म꣡दाः꣢ ॥५४७॥
स्वर सहित पद पाठसु꣣ता꣡सः꣢ । म꣡धु꣢꣯मत्तमाः । सो꣡माः꣢꣯ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । मन्दि꣡नः꣢ । प꣣वि꣡त्र꣢वन्तः । अ꣣क्षरन् । देवा꣢न् । ग꣣च्छन्तु । वः । म꣡दाः꣢꣯ ॥५४७॥
स्वर रहित मन्त्र
सुतासो मधुमत्तमाः सोमा इन्द्राय मन्दिनः । पवित्रवन्तो अक्षरन्देवान्गच्छन्तु वो मदाः ॥५४७॥
स्वर रहित पद पाठ
सुतासः । मधुमत्तमाः । सोमाः । इन्द्राय । मन्दिनः । पवित्रवन्तः । अक्षरन् । देवान् । गच्छन्तु । वः । मदाः ॥५४७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 547
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 1; मन्त्र » 3
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 8;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 1; मन्त्र » 3
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 8;
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विषय - हम दिव्यता में आनन्द लें
पदार्थ -
औरों के साथ अपने जीवन को सम्बद्ध करके चलानेवाला ‘नाहुष' सदा गतिमय रथवाला [वायोरिव रथं ‘याति' यस्य स] 'ययाति' इस मन्त्र का ऋषि है। इन ययातियों का जीवन निम्न प्रकार का होता है -
१. (सुतासः) = ये सदा निर्माणात्मक कार्य ही करते हैं, इनका जीवन ध्वंस के लिए नहीं होता। अ-ध्वर=यशमय जीवन हिंसा व तोड़-फोड़ से रहित होना ही चाहिए।
२. (मधुमत्तमाः) = ये अत्यन्त माधुर्य को लिए हुए होते हैं। इनकी वाणी से कभी कोई कटु शब्द उच्चरित नहीं होता। वे मधुर ही मधुर शब्दों का प्रयोग करते हैं।
३. (सोमाः) = ये सौम्य, विनीत व अतिमानिता से दूर होते हैं। अभिमान इनकी दिव्यता को कभी कलंकित नहीं करता। नम्रता से ये सदा उन्नत बने रहते हैं। अभिमान के कारण ये लोगों के द्वेष्य नहीं बनते।
४. (इन्द्राय) = सौम्य बने रहने के लिए ये सदा उस परमैश्वर्यवान् प्रभु के लिए मन्दिन:-[मन्दतेः स्तुतिकर्मणः] स्तुति करनेवाले होते हैं। प्रभु की स्तुति ही इनकी उदात्तता को स्थिर रखती है।
५. (पवित्रवन्तः) =ज्ञानवाले बनते हैं। ज्ञान के कारण ही तो ये सुखों में फँसकर स्वार्थी नहीं हो जाते।
६. (अक्षरन्) = ज्ञान के द्वारा ये मलों को अपने से दूर करते हैं। उत्तरोत्तर पवित्रता का साधन ही इनके जीवन का उद्देश्य होता है। ये अपवित्र वस्तुओं में आनन्द का अनुभव नहीं करते। प्रभु के इस आदेश को ये नहीं भूलते कि (वो मदा:) = तुम्हारे आनन्द (देवान् गच्छन्तु) = दिव्य गुणों की ओर चलें अर्थात् तुम अच्छी बातों में आनन्द लेने का प्रयत्न करो। इसीलिए यह 'ययाति नाहुष' जीवन की साधना, दिव्यगुणों की प्राप्ति व निर्माणात्मक कार्यों में आनन्द लेने का प्रयत्न करता है ।
भावार्थ -
मैं दिव्यता की वृद्धि में आनन्द लेनेवाला बनूँ।
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