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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 55
ऋषिः - वसिष्ठो मैत्रावरुणिः
देवता - अग्निः
छन्दः - बृहती
स्वरः - मध्यमः
काण्ड नाम - आग्नेयं काण्डम्
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दे꣣वो꣡ वो꣢ द्रविणो꣣दाः꣢ पू꣣र्णां꣡ वि꣢वष्ट्वा꣣सि꣡च꣢म् । उ꣡द्वा꣢ सि꣣ञ्च꣢ध्व꣣मु꣡प꣢ वा पृणध्व꣣मा꣡दिद्वो꣢꣯ दे꣣व꣡ ओ꣢हते ॥५५॥
स्वर सहित पद पाठदे꣣वः꣢ । वः꣣ । द्रविणोदाः꣢ । द्र꣣विणः । दाः꣢ । पू꣣र्णा꣢म् । वि꣣वष्टु । आसि꣡च꣢म् । आ꣣ । सि꣡च꣢꣯म् । उत् । वा꣣ । सिञ्च꣡ध्व꣢म् । उ꣡प꣢꣯ । वा꣣ । पृणध्वम् । आ꣢त् । इत् । वः꣣ । देवः꣢ । ओ꣣हते ॥५५॥
स्वर रहित मन्त्र
देवो वो द्रविणोदाः पूर्णां विवष्ट्वासिचम् । उद्वा सिञ्चध्वमुप वा पृणध्वमादिद्वो देव ओहते ॥५५॥
स्वर रहित पद पाठ
देवः । वः । द्रविणोदाः । द्रविणः । दाः । पूर्णाम् । विवष्टु । आसिचम् । आ । सिचम् । उत् । वा । सिञ्चध्वम् । उप । वा । पृणध्वम् । आत् । इत् । वः । देवः । ओहते ॥५५॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 55
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 1; मन्त्र » 1
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 6;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 1; मन्त्र » 1
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 6;
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विषय - दया का उमड़ता हुआ समुद्र
पदार्थ -
हे मनुष्यो! उत् (सिञ्चध्वम् ) = अपने हृदयों को दया की भावना से इतना सींचो कि वह दया तुम्हारे हृदयों से बाहर प्रवाहित होने लगे। (वा) = और (उप) = दुःखियों के समीप पहुँचकर (पृणध्वम्) = उनके जीवन को सुखी बनाओ [पृण सुखी करना]।
दुःखी पुरुष जब हमारे समीप आएँ तो हम उनकी सहायता करें यह भी भद्रता है, परन्तु प्रभु इससे कुछ अधिक चाहते हैं। प्रभु की इच्छा है कि हम दुःखियों के आने की प्रतिक्षा क्यों करें, हम उनके समीप पहुँचकर उन्हें सुख पहुँचाएँ। पीड़ितों के पास पहुँचकर उनकी पीड़ा दूर करने पर (आत् इत्) = उसके पश्चात् अवश्य ही (देवः) = प्रभु (वः) = तुम्हें (ओहते) = प्राप्त होते हैं। प्रभु-प्राप्ति इन ('सर्व-भूत-हिते रताः') को ही होती है।
आसिचम् - हृदय में दया की भावना के पूर्ण सेचन को विवष्टु- चाहते की न्यूनता हमें प्रभु से दूर रखती है। वह प्रभु पूर्णां हैं। दया
जब व्यक्ति करुणामय बनकर सबकी सहायता करता है तो उसके पास स्वयं अपनी आवश्यकताओं के लिए धन की कमी हो जाती है और कई बार ऐसा विचार आने लगता है कि इतने श्रम से कमाये हुए धन को इस प्रकार औरों पर कैसे व्यय कर दें? इस प्रश्न का उत्तर वेद इस रूप मे देता है कि (वः) = तुम्हें (देवः) = वह प्रभु ही (द्रविणोदाः) = धन देनेवाले हैं। सब धन उस प्रभु का है। उस प्रभु के धन को प्रभु की प्रजा के कल्याण में व्यय कर देना ही ठीक है।
भावार्थ -
प्रभु की प्राप्ति के लिए दो बातें आवश्यक हैं- हृदय का दया से पूर्ण होना और दुःखियों की सेवा करना । ये दोनों बातें तभी हो सकती हैं जब हम अपने मन को वश में करके इस मन्त्र के ऋषि ‘वसिष्ठ' बनें।
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