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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 56
ऋषिः - कण्वो घौरः
देवता - ब्रह्मणस्पतिः
छन्दः - बृहती
स्वरः - मध्यमः
काण्ड नाम - आग्नेयं काण्डम्
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प्रै꣢तु꣣ ब्र꣡ह्म꣢ण꣣स्प꣢तिः꣣ प्र꣢ दे꣣꣬व्ये꣢꣯तु सू꣣नृ꣡ता꣢ । अ꣡च्छा꣢ वी꣣रं꣡ न꣢꣯र्यं प꣣ङ्क्ति꣡रा꣢धसं दे꣣वा꣢ य꣣ज्ञं꣡ न꣢यन्तु नः ॥५६॥
स्वर सहित पद पाठप्र꣢ । ए꣣तु । ब्रह्म꣢꣯णः प꣡तिः꣢꣯ । प्र । दे꣣वी꣢ । ए꣣तु । सूनृ꣡ता꣢ । सु꣣ । नृ꣡ता꣢꣯ । अ꣡च्छ꣢꣯ । वी꣣र꣢म् । न꣡र्य꣢꣯म् । प꣣ङ्क्ति꣡रा꣢धसम् । प꣣ङ्क्ति꣢म् । रा꣣धसम् । देवाः꣢ । य꣣ज्ञ꣢म् । न꣣यन्तु । नः ॥५६॥
स्वर रहित मन्त्र
प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्र देव्येतु सूनृता । अच्छा वीरं नर्यं पङ्क्तिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः ॥५६॥
स्वर रहित पद पाठ
प्र । एतु । ब्रह्मणः पतिः । प्र । देवी । एतु । सूनृता । सु । नृता । अच्छ । वीरम् । नर्यम् । पङ्क्तिराधसम् । पङ्क्तिम् । राधसम् । देवाः । यज्ञम् । नयन्तु । नः ॥५६॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 56
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 1; मन्त्र » 2
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 6;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 1; मन्त्र » 2
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 6;
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विषय - यज्ञ के विस्तार के लिए आवश्यक तीन बातें
पदार्थ -
मानव-जीवन एक यज्ञ है। इस जीवन को यज्ञमय बनाना ही दोनों लोकों को सुखी बनाने का साधन है। 'हमारा जीवन यज्ञमय बना रहे' इसके लिए तीन बातें आवश्यक हैं१.
(ब्रह्मणस्पतिः) = ज्ञान का पति सर्वज्ञ प्रभु प्(र एतु) = हमें प्रकर्षेण प्राप्त हो । प्रातः - सायं तो हम उसका चिन्तन करें ही, दिन-रात में भी सभी क्रियाओं को करते हुए हम उसे स्मरण करें। प्रभु के स्मरण से हम भोग-विलास में न फँसेंगे और हमारा जीवन यज्ञमय बना रहेगा।
२. (सूनृता )= [सु ऊन् ऋत] उत्तम, दु:खों का परिहाण करनेवाला सत्यवाणीरूप देवी - दिव्य गुण प्र एतु हमें प्रकर्षेण प्राप्त हो। सत्य के साथ सभी उत्तम गुण हमारे जीवन का अङ्ग बनते हैं और हमारा जीवन यज्ञमय बना रहता है।
३. (देवा:) = सब प्राकृतिक शक्तियाँ व सब विद्वान् हमारे इस (यज्ञं अच्छ) = यज्ञिय जीवन में (वीरम्) = ऐसी सन्तान (नयन्तु) = प्राप्त कराएँ जो (नर्यम्) [नरहितम्]=लोकहित करनेवाली हो तथा (पङ्क्तिराधसम्) = ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र व निषाद पाँचों के हितकर कार्यों को सिद्ध करनेवाली हो। सन्तान की प्रतिकूलता में उस यज्ञ में कुछ शिथिलता आ जाना स्वाभाविक है।
हम पूर्ण प्रयत्न करके अपने इस जीवन को यज्ञिय बनाएँ, भोग-मार्ग धीरपुरुषों का मार्ग नहीं। यज्ञमय जीवनवाला धीरपुरुष ही इस मन्त्र का ऋषि ‘कण्व' = मेधावी होता है।
भावार्थ -
हम प्रभु का स्मरण करें, सत्य को धारण करें व यज्ञिय प्रवृत्तिवाली सन्तान को प्राप्त करें, जिससे हमारा यह जीवन यज्ञमय बना रहे ।
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