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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 584
ऋषिः - ऊरुराङ्गिरसः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - ककुप्
स्वरः - मध्यमः
काण्ड नाम - पावमानं काण्डम्
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ए꣣ष꣡ स्य धार꣢꣯या सु꣣तो꣢ऽव्या꣣ वा꣡रे꣢भिः पवते म꣣दि꣡न्त꣢मः । क्री꣡ड꣢न्नू꣣र्मि꣢र꣣पा꣡मि꣢व ॥५८४॥
स्वर सहित पद पाठए꣣षः । स्यः । धा꣡र꣢꣯या । सु꣣तः꣢ । अ꣡व्याः꣢꣯ । वा꣡रे꣢꣯भिः । प꣣वते । मदि꣡न्त꣢मः । क्रीड꣢न् । ऊ꣣र्मिः꣢ । अ꣣पा꣢म् । इ꣣व ॥५८४॥
स्वर रहित मन्त्र
एष स्य धारया सुतोऽव्या वारेभिः पवते मदिन्तमः । क्रीडन्नूर्मिरपामिव ॥५८४॥
स्वर रहित पद पाठ
एषः । स्यः । धारया । सुतः । अव्याः । वारेभिः । पवते । मदिन्तमः । क्रीडन् । ऊर्मिः । अपाम् । इव ॥५८४॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 584
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 4; मन्त्र » 7
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 11;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 4; मन्त्र » 7
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 11;
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विषय - विशालता
पदार्थ -
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'उरु: आङ्गिरस' है। यह शब्द 'ऊर्णुञ् आच्छादने' धातु से बना है। यह प्राणिमात्र को अपने प्रेम से आच्छादित करने का प्रयत्न करता है। अपने प्रेम को विशाल बनाकर ही यह वासना से ऊपर उठकर 'आङ्गिरस' = शक्तिशाली हुआ है।
यह इस निश्चय पर पहुँचा है कि (एषः) = यह (स्यः) = वह प्रसिद्ध (सोम) = वीर्य [vitality] (धारया) = जीवन के हेतु से (सुतः) = उत्पन्न किया गया है। इसको शरीर में ही खपाकर हमें अपने अङ्ग-प्रत्यङ्ग को 'स्वस्थ, सबल व सशक्त' बनाना है। यह सोम हमें (अव्या) = रक्षण में सर्वोत्तम- ज्ञान के मार्ग में आनेवाली रुकावटों [Bars] से (पवते) = परे ले जाता है - उनसे हमें ऊपर उठा देता है। वस्तुतः यह सोम ज्ञानाग्नि का ईंधन बनकर उसे दीप्त कर देता है। ज्ञान की प्राप्ति के साथ (मदिन्तमः) = यह हमें अत्यन्त मद व उल्लास को प्राप्त करानेवाला है। (इव) = जैसे (अपाम् उर्मि:) = जलों की तरंग (क्रीडन्) = क्रीड़ा करती हुई होती हैं उसी प्रकार यह मनुष्य सारी क्रियाओं को 'गुणा गुणेषु वर्तन्ते' - गुणों की परस्पर होती हुई क्रीड़ा ही समझता है। क्रीड़ा में उत्साह है- निराशा नहीं । सोम-सम्पन्न व्यक्ति गिरकर भी उत्साह - शून्य नहीं होता।
भावार्थ -
प्रेम को विशाल बनाकर हम वासना पर विजय पाएँ।
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