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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 598
ऋषिः - मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम - आरण्यं काण्डम्
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इ꣢न्द्र꣣ वा꣡जे꣢षु नोऽव स꣣ह꣡स्र꣢प्रधनेषु च । उ꣣ग्र꣢ उ꣣ग्रा꣡भि꣢रू꣣ति꣡भिः꣢ ॥५९८॥
स्वर सहित पद पाठइ꣡न्द्र꣢꣯ । वा꣡जे꣢꣯षु । नः꣣ । अव । सह꣡स्र꣢प्रधनेषु । स꣣ह꣡स्र꣢ । प्र꣣धनेषु । च । उग्रः꣢ । उ꣣ग्रा꣡भिः꣢ । ऊ꣣ति꣡भिः꣢ ॥५९८॥
स्वर रहित मन्त्र
इन्द्र वाजेषु नोऽव सहस्रप्रधनेषु च । उग्र उग्राभिरूतिभिः ॥५९८॥
स्वर रहित पद पाठ
इन्द्र । वाजेषु । नः । अव । सहस्रप्रधनेषु । सहस्र । प्रधनेषु । च । उग्रः । उग्राभिः । ऊतिभिः ॥५९८॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 598
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » 2; मन्त्र » 4
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 2;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » 2; मन्त्र » 4
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 2;
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विषय - उदात्त रक्षण
पदार्थ -
इन्द्रियों का अधिष्ठाता जीव जब इन्द्रियों को वश करने का प्रयत्न करने लगता है तो उसे यह अनुभव होता है कि यह मन तो अत्यन्त चञ्चल है। इसे वश में करना सम्भव नहीं है। इसलिए हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशाली, सब शत्रुओं का द्रावण करनेवाले प्रभो! (वाजेषु) = वासनाओं के साथ होनेवाले संग्रामों में [When we wage war against them] (नः) = हमारी (अव) = रक्षा कीजिए। इन्द्रियाँ और मन विषयों के प्रति रागवाले होकर उनकी ओर भागते हैं और मैं उन्हें रोकता हूँ। आप मेरी रक्षा करेंगे तभी मैं इन्हें रोक पाऊँगा। (च) = और (सहस्रप्रधनेषु) = सैकड़ों प्रकार से मेरा विदारण करनेवाले इन संग्रामों में (उग्र) = तेजस्वी प्रभो! (उग्राभिः) = उत्कृष्ट (ऊतिभिः) = रक्षणों से आप हमें (अव) = सुरक्षित कीजिए | विषय प्रबल हैं, = परन्तु आपके सम्पर्क में आकर मैं प्रबल हो जाता हूँ। 'काम' प्रद्युम्न = उत्कृष्ट बलवाला है। यह प्रिय लगता है, परन्तु आप प्रियतम हैं। आपके साथ होने पर सब वैषयिक आनन्द तुच्छ हो जाता है और मैं उसका शिकार नहीं होता।
विषयों की प्राप्ति के लिए की जानेवाली सब कुटिलताओं से ऊपर उठकर मैं 'मधुच्छन्दा वैश्वामित्र' हो जाता हूँ। वस्तुतः काम व्यापक होकर विश्वप्रेम का रूप धारण कर लेता है । वही आदर्श जीवन होता है।
भावार्थ -
प्रभुकृपा से मैं अध्यात्म संग्रामों में विजयी बनूँ।
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