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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 742
ऋषिः - मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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स꣡ घा꣢ नो꣣ यो꣢ग꣣ आ꣡ भु꣢व꣣त्स꣢ रा꣣ये꣡ स पुर꣢꣯न्ध्या । ग꣢म꣣द्वा꣡जे꣢भि꣣रा꣡ स नः꣢꣯ ॥७४२॥

स्वर सहित पद पाठ

सः । घ꣣ । नः । यो꣡गे꣢꣯ । आ । भु꣣वत् । सः꣢ । रा꣣ये꣢ । सः । पु꣡र꣢꣯न्ध्या । पु꣡र꣢꣯म् । ध्या꣣ । ग꣡म꣢꣯त् । वा꣡जे꣢꣯भिः । आ । सः । नः꣣ ॥७४२॥


स्वर रहित मन्त्र

स घा नो योग आ भुवत्स राये स पुरन्ध्या । गमद्वाजेभिरा स नः ॥७४२॥


स्वर रहित पद पाठ

सः । घ । नः । योगे । आ । भुवत् । सः । राये । सः । पुरन्ध्या । पुरम् । ध्या । गमत् । वाजेभिः । आ । सः । नः ॥७४२॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 742
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 10; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 3; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
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पदार्थ -

(सः) = वह प्रभु (घ) = निश्चय से (न:) = हमारे (योगे) = जीवन-यात्रा के प्रथम प्रयाण में शक्ति व ज्ञान जुटाने के कार्य में (आभुवत्) = सर्वथा सहायक हो । एक ब्रह्मचारी प्रातः- सायम् प्रभु के चरणों में उपस्थित होकर एक प्रेरणा प्राप्त करता है और एकाग्रता व संयम से ज्ञान व शक्ति के योग में समर्थ होता है। (सः) = वही प्रभु जीवन-यात्रा के दूसरे प्रयाण में (राये) = देने के योग्य धन के लिए (न:) = हमारे (आभुवत्) = साथ हों। गृहस्थ में धन की आवश्यकता है। साथ ही उस धन में आसक्ति न होकर दान देने की वृत्ति की आवश्यकता है। ‘राये' शब्द में ये दोनों ही भावनाएँ आ गयीं। ‘राये’, ‘रा=दाने' यह शब्द उसी धन के लिए प्रयुक्त होता है जो दिया जा सके। खूब धन देनेवाला गृहस्थ ही अपने परिवार का पालन करता हुआ तीनों आश्रमियों का पालन कर पाता है और इस प्रकार अपने यात्रा के इस प्रयाण को सफलता से पूर्ण करता है । (सः) = वह प्रभु हमें हमारी जीवन-यात्रा के तीसरे प्रयाण में—वानप्रस्थाश्रम में (पुरन्ध्या) = पालक व पूरक बुद्धि से व बुद्धिजन्य ज्ञान से युक्त करें। ('स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात्') = सदा स्वाध्याय में लगे रहें एवं, सतत स्वाध्याय से अपने ज्ञान को परिपक्व करके जब हम जीवन-यात्रा के चतुर्थ प्रयाण में परिव्राजक बन चारों दिशाओं में भ्रमण करते हुए ज्ञानप्रसार के लिए आगे बढ़ें तब (सः) = वे प्रभु भी (नः) = हमें (वाजेभिः) = शक्तिशाली गतियों के हेतु से (आगमत्) = सर्वथा प्राप्त हों । एक संन्यासी अपनी उपदेश-यात्रा में उस प्रभु से ही शक्ति पाता है और मानापमान से विचलित न होता हुआ और अकेलेपन के कारण भयभीत न होता हुआ आगे और आगे बढ़ता है । वह प्रभु को अपने साथ अनुभव करता है, अत: डरे क्यों? इस प्रकार उसकी यात्रा पूर्णतया सफल होती है। सामुदायिक प्रार्थना का यही लाभ है कि हमें सदा प्रभु का साथ प्राप्त होता है । 

भावार्थ -

हम प्रभु को अपने साथ अनुभव करते हुए आगे और आगे बढ़ते चलें और लक्ष्य स्थान पर पहुँचें।

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