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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 771
ऋषिः - श्यावाश्व आत्रेयः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
1

आ꣡दीं꣢ त्रि꣣त꣢स्य꣣ यो꣡ष꣢णो꣣ ह꣡रि꣢ꣳ हिन्व꣣न्त्य꣡द्रि꣢भिः । इ꣢न्दु꣣मि꣡न्द्रा꣢य पी꣣त꣡ये꣢ ॥७७१॥

स्वर सहित पद पाठ

आ꣢त् । ई꣣म् । त्रित꣡स्य꣢ । यो꣡ष꣢꣯णः । ह꣡रि꣢꣯म् । हि꣣न्वन्ति । अ꣡द्रि꣢꣯भिः । अ । द्रि꣣भिः । इ꣡न्दु꣢꣯म् । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । पी꣣त꣡ये꣢ ॥७७१॥


स्वर रहित मन्त्र

आदीं त्रितस्य योषणो हरिꣳ हिन्वन्त्यद्रिभिः । इन्दुमिन्द्राय पीतये ॥७७१॥


स्वर रहित पद पाठ

आत् । ईम् । त्रितस्य । योषणः । हरिम् । हिन्वन्ति । अद्रिभिः । अ । द्रिभिः । इन्दुम् । इन्द्राय । पीतये ॥७७१॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 771
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 21; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 6; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
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पदार्थ -

(आत्) = अब (ईम्) = निश्चय से (त्रितस्य) = काम-क्रोध-लोभ से तीर्ण 'त्रित' की (योषणः) = [यु अमिश्रण] अपने को दोषों से दूर करने की वृत्तियाँ (अद्रिभिः) = दृढ़ मनोवृत्तियों से (हरिम्) = सब दु:खों को हरनेवाले प्रभु को (हिन्वन्ति) = प्राप्त कराती हैं। प्रभु प्राप्ति का मार्ग यह है कि१. मनुष्य 'काम, क्रोध, लोभ' को जीतकर 'त्रित' बनें, २. वह अपने को यथासम्भव दोषों से पृथक् करे [योषण: ], ३. दृढ़ मनोवृत्तिवाला हो [अद्रिभिः]।

प्रभु ने शरीर में आहार के पाचन की व्यस्था में अन्तिम धातु के रूप में वीर्य को उत्पन्न किया है। वह वीर्य ‘इन्दु' कहलाता है, क्योंकि यह अत्यन्त शक्तिशाली है । मन्त्र के ऋषि (‘श्यावाश्व आत्रेय') = इस (इन्दुम्) = इन्दु को (हिन्वन्ति) = शरीर में ही प्रेरित करते हैं, जिससे १. (इन्द्राय) = उस परमैश्वर्यनिधान प्रभु की प्राप्ति कर सकें और २. (पीतये) = शरीर की रोगों से रक्षा कर सकें [पा-रक्षणे]। शरीर में सोम की रक्षा जहाँ शरीर को नीरोग रखती है, वहाँ यह मनुष्य को पवित्र हृदय व तीक्ष्ण बुद्धि बनाकर प्रभु-दर्शन के भी योग्य करती है ।

भावार्थ -

हम सोम का पान करें, जिससे प्रभु-दर्शन प्राप्त करें तथा नीरोग हों। नीरोगता ऐहिक लाभ है तो प्रभु-प्राप्ति आमुष्मिक । ये दोनों ही लाभ सोम को शरीर में सुरक्षित करने से होते हैं।

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