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अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 50/ मन्त्र 1
कन्नव्यो॑ अत॒सीनां॑ तु॒रो गृ॑णीत॒ मर्त्यः॑। न॒ही न्व॑स्य महि॒मान॑मिन्द्रि॒यं स्वर्गृ॒णन्त॑ आन॒शुः ॥
स्वर सहित पद पाठकत् । नव्य॑: । अ॒त॒सीना॑म् । तु॒र: । गृ॒णी॒त॒ । मर्त्य॑: ॥ न॒हि । नु । अ॒स्य॒ । म॒हि॒ऽमान॑म् । इ॒न्द्रि॒यम् । स्व॑: । गृ॒णन्त॑: । आ॒न॒शु: ॥५०.१॥
स्वर रहित मन्त्र
कन्नव्यो अतसीनां तुरो गृणीत मर्त्यः। नही न्वस्य महिमानमिन्द्रियं स्वर्गृणन्त आनशुः ॥
स्वर रहित पद पाठकत् । नव्य: । अतसीनाम् । तुर: । गृणीत । मर्त्य: ॥ नहि । नु । अस्य । महिऽमानम् । इन्द्रियम् । स्व: । गृणन्त: । आनशु: ॥५०.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 50; मन्त्र » 1
विषय - प्रभु की 'महिमा-इन्द्रिय-स्व:' का आनन्त्य
पदार्थ -
१. अतसीनाम-परिव्राजकों की [निरन्तर गतिशील संन्यासियों की] (तरः) = वासनाओं का संहार करनेवाले उस प्रभु की (नव्यः मर्त्यः) = स्तुति करने में उत्तम मनुष्य भी (कत् गृणीत) = कैसे स्तुति करे। प्रभु के गुणों व सामों का वर्णन कर सकना उसकी शक्ति से परे की बात है। कुशल-से-कुशल स्तोता भी प्रभु का स्तुति के द्वारा व्यापन नहीं कर सकता। २. (गृणन्तः) = स्तुति करते हुए व्यक्ति (नु) = निश्चय से (अस्य) = इस प्रभु की (महिमानम्) = महिमा को (इन्द्रियम्) = बल को व (स्व:) = प्रकाश को (नहि आनश:) = व्याप्त करनेवाले नहीं होते। प्रभु की महिमा बल व प्रकाश अनन्त हैं। सान्त शक्ति व ज्ञानवाले जीवों के लिए प्रभु का पूर्ण यशोगान सम्भव नहीं है।
भावार्थ - मनुष्य प्रभु की महिमा, बल व प्रकाश को अपनी स्तुति द्वारा व्यक्त नहीं कर पाता।
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