अथर्ववेद - काण्ड 19/ सूक्त 33/ मन्त्र 1
स॑हस्रा॒र्घः श॒तका॑ण्डः॒ पय॑स्वान॒पाम॒ग्निर्वी॒रुधां॑ राज॒सूय॑म्। स नो॒ऽयं द॒र्भः परि॑ पातु वि॒श्वतो॑ दे॒वो म॒णिरायु॑षा॒ सं सृ॑जाति नः ॥
स्वर सहित पद पाठस॒ह॒स्र॒ऽअ॒र्घः। श॒तऽका॑ण्डः। पय॑स्वान्। अ॒पाम्। अ॒ग्निः। वी॒रुधा॑म्। रा॒ज॒ऽसूय॑म्। सः। नः॒। अ॒यम्। द॒र्भः। परि॑। पा॒तु॒। वि॒श्वतः॑। दे॒वः। म॒णिः। आयु॑षा। सम्। सृ॒जा॒ति॒। नः॒ ॥३३.१॥
स्वर रहित मन्त्र
सहस्रार्घः शतकाण्डः पयस्वानपामग्निर्वीरुधां राजसूयम्। स नोऽयं दर्भः परि पातु विश्वतो देवो मणिरायुषा सं सृजाति नः ॥
स्वर रहित पद पाठसहस्रऽअर्घः। शतऽकाण्डः। पयस्वान्। अपाम्। अग्निः। वीरुधाम्। राजऽसूयम्। सः। नः। अयम्। दर्भः। परि। पातु। विश्वतः। देवः। मणिः। आयुषा। सम्। सृजाति। नः ॥३३.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 33; मन्त्र » 1
विषय - ‘दर्भ’, ‘अग्नि’ नामक अभिषिक्त राजा।
भावार्थ -
(सहस्रार्धः) सहस्रों के बराबर अकेला बलशाली या सहस्रों पुरुषों और राजाओं से सहस्रों प्रकार के सम्मान प्राप्त करने वाला, (शतकाण्डः) सैंकड़ों बाणों या बाणधारियों का स्वामी, (पयस्वान्) समुद्र के समान गम्भीर और स्वयं ‘पयः’ अर्थात् पुष्टिकारक सामर्थ्य वाला (अपाम्) समुद्र के जलों के बीच में भी (अग्निः) दहकने वाले और्वानल के समान प्रजाओं के बीच में (अग्निः) अग्रणी नेता के समान और (वीरुधाम्) बढ़ते शत्रु बलों को विशेष रूप से रोकने वाले योद्धाओं का (राजसूयम्) राजारूप से प्रेरक (सः अयं) वह यह (दर्भः) शत्रुनाशक ‘दर्भ’ सेनापति, (देवः) सबको शान्तिदायक, देव, राजा (नः) हमें (विश्वतः) सब ओर से (परि पातु) रक्षा करे और वह (मणिः) मननशील और शत्रुस्तम्भन में समर्थ या उज्वलमणि, रत्न का धारक होकर (नः) हमें (आयुषा संसृजाति) दीर्घ आयु से युक्त करे।
टिप्पणी -
(प्र०) ‘सहस्रार्घ्यः’ (च०) ‘दैव’, ‘संसृजतु’ इति पैप्प० सं०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर - सर्वकामो भृगुर्ऋषिः। दर्भो देवता। १ जगती। २, ५ त्रिष्टुभौ। ३ आर्षी पंक्तिः। ४ आस्तारपंक्तिः। पञ्चर्चं सूक्तम्॥
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