अथर्ववेद - काण्ड 19/ सूक्त 56/ मन्त्र 1
सूक्त - यमः
देवता - दुःष्वप्ननाशनम्
छन्दः - त्रिष्टुप्
सूक्तम् - दुःस्वप्नानाशन सूक्त
य॒मस्य॑ लो॒कादध्या ब॑भूविथ॒ प्रम॑दा॒ मर्त्या॒न्प्र यु॑नक्षि॒ धीरः॑। ए॑का॒किना॑ स॒रथं॑ यासि वि॒द्वान्त्स्वप्नं॒ मिमा॑नो॒ असु॑रस्य॒ योनौ॑ ॥
स्वर सहित पद पाठय॒मस्य॑। लो॒कात्। अधि॑। आ। ब॒भू॒वि॒थ॒। प्रऽम॑दा। मर्त्या॑न्। प्र। यु॒न॒क्षि॒। धीरः॑। ए॒का॒किना॑। स॒ऽरथ॑म्। या॒सि॒। वि॒द्वान्। स्वप्न॑म्। मिमा॑नः। असु॑रस्य। योनौ॑ ॥५६.१॥
स्वर रहित मन्त्र
यमस्य लोकादध्या बभूविथ प्रमदा मर्त्यान्प्र युनक्षि धीरः। एकाकिना सरथं यासि विद्वान्त्स्वप्नं मिमानो असुरस्य योनौ ॥
स्वर रहित पद पाठयमस्य। लोकात्। अधि। आ। बभूविथ। प्रऽमदा। मर्त्यान्। प्र। युनक्षि। धीरः। एकाकिना। सऽरथम्। यासि। विद्वान्। स्वप्नम्। मिमानः। असुरस्य। योनौ ॥५६.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 56; मन्त्र » 1
विषय - विद्वान को अप्रमाद का उपदेश।
भावार्थ -
हे पुरुष ! तू (यमस्य लोकात्) यम, सब इन्द्रियों को अपने वश करने वाले (लोकात्) लोक, स्थान से (अधि आबभूविथ) सब अपने प्राणों पर अधिष्ठाता रूप से उनको वश करने में समर्थ है। तू स्वयं (धीरः) धीर, ध्यानवान् और धारण पोषण में समर्थ होकर (प्रमदा) उत्तम हर्ष से (मर्त्यान्) सब मनुष्यों को (प्र युनक्षि) उत्तम मार्ग में लगा। तू (एकाकिना) अकेला ही (विद्वान्) विद्वान् होकर (असुरस्य) केवल प्राणों में रमण करने वाले विषय विलासी पुरुष के (योनौ) आश्रय में (स्वप्न) स्वप्न आलस्य प्रमाद को जानता हुआ स्वयं (सरथम्) अपने वेग से अपने अन्तरात्मा के आनन्द रस सहित (पासि) जीवनयापन करता है।
अर्थात् यम नियम का पालक पुरुष अन्यों को सुप्रसन्न चित्त होकर भी सम्मार्ग में प्रेरित करे और प्रमाद को केवल प्राणपोषकों का ही जान कर स्वयं अकेला, ज्ञानवान होकर जीवन बितावे।
टिप्पणी -
मर्त्यात् ‘मर्त्तान्’ इति क्वचित्। ‘प्रमदा’ इति सायणसंमतः। प्रमदाः स्त्रिय इति सायणः॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर - यमऋषिः। दुःखनाशनो देवता। त्रिष्टुभः। षडृचं सूक्तम्॥
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