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अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 113/ मन्त्र 2
तं हि स्व॒राजं॑ वृष॒भं तमोज॑से धि॒षणे॑ निष्टत॒क्षतुः॑। उ॒तोप॒मानां॑ प्रथ॒मो नि षी॑दसि॒ सोम॑कामं॒ हि ते॒ मनः॑ ॥
स्वर सहित पद पाठतत् । हि । स्व॒ऽराज॑म् । वृ॒ष॒भम् । तम् । ओज॑से । धि॒षणे॒ । इति॑ । नि॒:ऽत॒त॒क्षतु॑: ॥ उ॒त । उ॒प॒ऽमाना॑म् । प्र॒थ॒म: । नि । सी॒द॒सि॒ । सोम॑ऽकामम् । हि । ते॒ । मन॑: ॥११३.२॥
स्वर रहित मन्त्र
तं हि स्वराजं वृषभं तमोजसे धिषणे निष्टतक्षतुः। उतोपमानां प्रथमो नि षीदसि सोमकामं हि ते मनः ॥
स्वर रहित पद पाठतत् । हि । स्वऽराजम् । वृषभम् । तम् । ओजसे । धिषणे । इति । नि:ऽततक्षतु: ॥ उत । उपऽमानाम् । प्रथम: । नि । सीदसि । सोमऽकामम् । हि । ते । मन: ॥११३.२॥
अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 113; मन्त्र » 2
विषय - राजा, सूर्य और परमेश्वर।
भावार्थ -
(स्वराजं) स्वयं अपने बल और तेज से प्रकाशमान, (वृषभम्) श्रेष्ठ, (तम् हि) उस पुरुष को (धिषणे) समस्त विश्व को धारण करने वाले आकाश और पृथिवी जिस प्रकार सूर्य को (ओजसे) पराक्रम के कार्य के लिये समर्थ करती हैं उसी प्रकार (तम्) उस वीर पुरुष को (धिषणे) धारण में समर्थ नर और नारीगण अथवा राजा प्रजावर्ग मिलकर (ओजसे) बल पराक्रम की वृद्धि के लिये (निः ततक्षत्तुः) अपना राजा बनाते हैं। हे इन्द ! राजन् ! तू भी (उपमानाम्) अपने समान अन्यों के बीच में (प्रथमः) सबसे श्रेष्ठ होकर (निषीदसि) विराजता हैं। (ते मनः हि) तेरा मन भी अवश्य (सोमकामं) राष्ट्रैश्वर्य की कामना करता है।
टिप्पणी -
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ऋषि | देवता | छन्द | स्वर - भर्ग ऋषिः। इन्द्रो देवता। प्रगाथः। द्व्यचं सूक्तम्॥
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