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अथर्ववेद > काण्ड 20 > सूक्त 2

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  • अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 2/ मन्त्र 1
    सूक्त - गृत्समदो मेधातिथिर्वा देवता - मरुद्गणः छन्दः - एकावसाना विराड्गायत्री सूक्तम् - सूक्त-२

    म॒रुतः॑ पो॒त्रात्सु॒ष्टुभः॑ स्व॒र्कादृ॒तुना॒ सोमं॑ पिबतु ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    म॒रुत॑: । पो॒त्रात् । सु॒ऽस्तभ॑: । सु॒ऽअ॒र्का॑त् । ऋ॒तुना॑ । सोम॑म् । पि॒ब॒तु॒ ॥२.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    मरुतः पोत्रात्सुष्टुभः स्वर्कादृतुना सोमं पिबतु ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    मरुत: । पोत्रात् । सुऽस्तभ: । सुऽअर्कात् । ऋतुना । सोमम् । पिबतु ॥२.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 2; मन्त्र » 1

    भावार्थ -
    (मरुतः) मरुद्गण, समस्त प्राणगण देवजन, विद्वान् पुरुष (पोत्रात्) पोता, सोम को पवित्र करने वाले (सुस्तुभः) उत्तम रूप से स्तुति करने योग्य (स्वर्कात्) उत्तम अर्चनीय, परमेश्वर से प्राप्त करके (ऋतुना) अपने प्राण के बलसे (सोमम्) उस ब्रह्मानन्दरस या प्रेरक जीवन या वीर्य, सोम को (पिबतु = पिबन्तु) पान करें, प्राप्त करें। आसध्वा बर्हिर्भरतस्य सूनवाः पोत्रादा सोमं पिवतदिवो नरः। ऋ० २। ३६। २॥ मरुतः पिवतऋतुना पोत्र्यद् यज्ञं पुनीतन। ऋ० १। १५। १॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर - गृत्समदो मेधातिथिर्वा ऋषिः। मरुदिन्द्राग्निर्द्रविणोदाः देवताः। १, २ विराड गायत्र्यौ। आर्ष्युष्णिक्। ४ साम्नी त्रिष्टुप्। चतुऋचं सूक्तम्॥

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