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अथर्ववेद > काण्ड 20 > सूक्त 40

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  • अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 40/ मन्त्र 2
    सूक्त - मधुच्छन्दाः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री सूक्तम् - सूक्त-४०

    अ॑नव॒द्यैर॒भिद्यु॑भिर्म॒खः सह॑स्वदर्चति। ग॒णैरिन्द्र॑स्य॒ काम्यैः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒न॒व॒द्यै: । अ॒भिद्यु॑ऽभि: । म॒ख: । सह॑स्वत् । अ॒र्च॒ति॒ ॥ ग॒णै: । इन्द्र॑स्य । काम्यै॑: ॥४०.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अनवद्यैरभिद्युभिर्मखः सहस्वदर्चति। गणैरिन्द्रस्य काम्यैः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अनवद्यै: । अभिद्युऽभि: । मख: । सहस्वत् । अर्चति ॥ गणै: । इन्द्रस्य । काम्यै: ॥४०.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 40; मन्त्र » 2

    भावार्थ -
    ऐश्वर्यमय राष्ट्र रूप, (सहस्वत्) अति बलशाली (मखः) यज्ञ (इन्द्रस्य काम्यैः) इन्द्र को अति प्रिय लगने वाले (अनवद्यैः) दोष रहित, अनिन्द्य, (अभिद्युभिः) तेजस्वी (गणैः) गणों सहित विराजमान (इन्द्रस्य) इन्द्र की (अर्चति) स्तुति करता है। अथवा यज्ञ इन्द्र को प्रिय लगने वाले (गणैः) ऋचा समूहों से उसकी स्तुति करता है। एष वै मखो य एष तपति। श० १४। १। ३ । ५ ॥ (सहस्वत् मखः) शत्रु को पराजय करने वाले बल से युक्त सूर्य के समान तापकारी सेनापति (अनवद्यैः अभिद्युभिः काम्यैः गणैः सह) निर्दोष, तेजस्वी, कान्तिमान् भटगणों के साथ (इन्द्रस्य अर्चति) इन्द्र का ही आदर सत्कार करता है।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर - मधुच्छन्दा ऋषिः। मरुतो देवता। गायत्र्यः। तृचं सूक्तम्॥

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