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ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 150/ मन्त्र 3
स च॒न्द्रो वि॑प्र॒ मर्त्यो॑ म॒हो व्राध॑न्तमो दि॒वि। प्रप्रेत्ते॑ अग्ने व॒नुष॑: स्याम ॥
स्वर सहित पद पाठसः । च॒न्द्रः । वि॒प्र॒ । मर्त्यः॑ । म॒हः । व्राध॑न्ऽतमः । दि॒वि । प्रऽप्र॑ । इत् । ते॒ । अ॒ग्ने॒ । व॒नुषः॑ । स्याम ॥
स्वर रहित मन्त्र
स चन्द्रो विप्र मर्त्यो महो व्राधन्तमो दिवि। प्रप्रेत्ते अग्ने वनुष: स्याम ॥
स्वर रहित पद पाठसः। चन्द्रः। विप्र। मर्त्यः। महः। व्राधन्ऽतमः। दिवि। प्रऽप्र। इत्। ते। अग्ने। वनुषः। स्याम ॥ १.१५०.३
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 150; मन्त्र » 3
अष्टक » 2; अध्याय » 2; वर्ग » 19; मन्त्र » 3
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अष्टक » 2; अध्याय » 2; वर्ग » 19; मन्त्र » 3
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह ।
अन्वयः
हे अग्ने विद्वन् यथा वयं वनुषस्ते तवोपकारकाः प्रप्रेत् स्याम। हे विप्र यथा स मर्त्यो व्राधन्तमो महश्चन्द्रो दिवीव वर्त्तते तथा त्वं वर्त्तस्व ॥ ३ ॥
पदार्थः
(सः) (चन्द्रः) आह्लादकारकः (विप्र) मेधाविन् (मर्त्यः) मनुष्यः (महः) महान् (व्राधन्तमः) अतिशयेन वर्द्धमानः (दिवि) (प्रप्र) (इत्) एव (ते) तव (अग्ने) विद्वन् (वनुषः) संविभाजकस्य (स्याम) भवेम ॥ ३ ॥
भावार्थः
अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा पृथिव्यादिपदार्थज्ञा विद्वांसो विद्याप्रकाशे प्रवर्त्तन्ते तथेतरैरपि वर्त्तितव्यम् ॥ ३ ॥अस्मिन् सूक्ते विद्वद्गुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति वेद्यम् ॥इति पञ्चाशदुत्तरं शततमं सूक्तमेकोनविंशो वर्गश्च समाप्तः ॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदार्थ
हे (अग्ने) विद्वान् ! जैसे हम लोग (वनुषः) अलग सबको बाँटनेवाले (ते) आपके उपकार करनेवाले (प्रप्र, इत्, स्याम) उत्तम ही प्रकार से होवें। वा हे (विप्र) धीर बुद्धिवाले जन जैसे (सः) वह (मर्त्यः) मनुष्य (व्राधन्तमः) अतीव उन्नति को प्राप्त जैसे (महः) बड़ा (चन्द्रः) चन्द्रमा (दिवि) आकाश में वर्त्तमान है, वैसे तू भी अपना वर्त्ताव रख ॥ ३ ॥
भावार्थ
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पृथिव्यादि पदार्थों को जाने हुए विद्वान् जन विद्याप्रकाश में प्रवृत्त होते हैं, वैसे और जनों को भी वर्त्ताव रखना चाहिये ॥ ३ ॥इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥ यह एक सौ पचासवाँ सूक्त और उन्नीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
विषय
चन्द्र- मह-व्राधन्तम
पदार्थ
१. गतमन्त्र के अनुसार प्रभु के चाबुक के संकेत को समझनेवाले लोग उत्तम जीवनवाले होते हैं। इसका चित्रण करते हुए कहते हैं कि हे (विप्र) = विशेष रूप से हमारा पूरण करनेवाले प्रभो ! [प्रा पूरणे] (सः मर्त्यः) = वह मनुष्य जो प्रभु के संकेतों को ग्रहण करता है (चन्द्रः) = आह्लादमय जीवनवाला होता है; यह औरों को भी आह्लादित करनेवाला होता है, (महः) = यह महान् बनता है, अथवा पूजा की वृत्तिवाला होता है। प्रातः- सायं प्रभु की उपासना को अपना नैत्यिक कर्त्तव्य समझता है; दिवि अपने प्रकाशमयरूप में यह (व्राधन्तमः) = [प्रवृद्धतमः - सा०, व्राध= broad] खूब विशाल हृदयवाला होता है। २. ऐसे लोगों की यही कामना होती है कि हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो ! हम (इत्) = निश्चय से (ते) = आपके ही वनुषः प्र प्रस्याम प्रकृष्ट उपासक बनें। वस्तुतः प्रभु की उपासना ही तो उनके जीवनों को सुन्दर बनाती है।
भावार्थ
भावार्थ – प्रभु-भक्त का जीवन आह्लादमय, प्रभु-पूजन की वृत्तिवाला व विशाल हृदय को लिये हुए होता है।
विषय
अल्हादक प्रभु की शरण ।
भावार्थ
( दिवि चन्द्रः ) आकाश में जिस प्रकार चन्द्रमा सब को आह्लादित करने वाला, (व्राधन्तमः) नित्य वृद्धि को प्राप्त होने वाला होता है उसी प्रकार हे (विप्र) विद्वन् ! विविध ऐश्वर्यों और ज्ञानों से स्वयं पूर्ण और अन्यों को पूर्ण करने हारे ! (सः) वह उत्तम पुरुष भी (महः) महान् ( दिवि ) सब कामनाओं के पूर्ण करने में और तेज में (व्राधन्तमः) सदा वृद्धिशील होकर ( चन्द्रः ) सब को आह्लादकारक होता है । हे ( अग्ने ) अग्रणी नायक ! ऐसे ( वनुषः ) सेवन करने और ज्ञान और ऐश्वर्य दान देने वाले ( ते ) तेरे अधीन रह कर हम ( प्र-प्र इत् स्याम ) उत्तम उत्तम पद को प्राप्त होंवे । इत्येकोनविंशो वर्गः ॥
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
दीर्घतमा ऋषिः ॥ अग्निर्देवता ॥ छन्दः- १, ३ भुरिग्गायत्री । २ निचृदुष्णिक् ॥ तृचं सूक्तम् ॥
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जसे पृथ्वी इत्यादी पदार्थांना जाणणारे विद्वान लोक विद्या प्रकाशित करण्यास प्रवृत्त होतात, तसे इतरांनीही वागावे. ॥ ३ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
O lord of light and generosity, Agni, surely that mortal is blest and brilliant like the moon in the heavens, great and greater, ever rising most high, who is worshipful and gives in charity with thanks and divine admiration. May we, we pray, be dedicated to you, singing songs of devotion in admiration of the Divine.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The virtuous Ged is again adored.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O God ! you are store house of knowledge. May we always think or do good to you who distribute your wealth among the deserving persons. O wise man! I have advanced very forward physically, intellectually and spiritually and remain in the focus for knowledge and wisdom. It is just like the great God, who gives happiness to all. We should also behave and emulate properly.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
The learned men are knowers of the substances like the earth. Such men are always in focus of the wisdom and knowledge. Others should also follow the same path.
Foot Notes
(ब्राधन्तमः) अतिशयेन वर्द्धमान: – Growing or advancing much physically, mentally and spiritually. (चन्द्रः) आह्लादकारकः = Giver of joy. (वनुषः) सभाजकस्य = Of the distributor of wealth and knowledge.
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