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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 184 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 184/ मन्त्र 4
    ऋषिः - अगस्त्यो मैत्रावरुणिः देवता - अश्विनौ छन्दः - भुरिक्पङ्क्ति स्वरः - पञ्चमः

    अ॒स्मे सा वां॑ माध्वी रा॒तिर॑स्तु॒ स्तोमं॑ हिनोतं मा॒न्यस्य॑ का॒रोः। अनु॒ यद्वां॑ श्रव॒स्या॑ सुदानू सु॒वीर्या॑य चर्ष॒णयो॒ मद॑न्ति ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒स्मे इति॑ । सा । वा॒म् । मा॒ध्वी॒ इति॑ । रा॒तिः । अ॒स्तु॒ । स्तोम॑म् । हि॒नो॒त॒म् । मा॒न्यस्य॑ । का॒रोः । अनु॑ । यत् । वा॒म् । श्र॒व॒स्या॑ । सु॒दा॒नू॒ इति॑ सुऽदानू । सु॒ऽवीर्या॑य । च॒र्ष॒णयः॑ । मद॑न्ति ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अस्मे सा वां माध्वी रातिरस्तु स्तोमं हिनोतं मान्यस्य कारोः। अनु यद्वां श्रवस्या सुदानू सुवीर्याय चर्षणयो मदन्ति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अस्मे इति। सा। वाम्। माध्वी इति। रातिः। अस्तु। स्तोमम्। हिनोतम्। मान्यस्य। कारोः। अनु। यत्। वाम्। श्रवस्या। सुदानू इति सुऽदानू। सुऽवीर्याय। चर्षणयः। मदन्ति ॥ १.१८४.४

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 184; मन्त्र » 4
    अष्टक » 2; अध्याय » 5; वर्ग » 1; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ सज्जनताश्रयमध्यापकोपदेशकविषयमाह ।

    अन्वयः

    हे सुदानू ! या वां माध्वी रातिर्वर्त्तते साऽस्मे अस्तु युवां मान्यस्य कारोः स्तोमं हिनोतं यद्यौ श्रवस्या वां सुवीर्य्याय चर्षणयोऽनु मदन्ति तौ वयमप्यनु मदेम ॥ ४ ॥

    पदार्थः

    (अस्मे) अस्मभ्यम् (सा) श्रीः (वाम्) युवयोः (माध्वी) मधुरादिगुणयुक्ता (रातिः) दानम् (अस्तु) भवतु (स्तोमम्) श्लाघ्यम् (हिनोतम्) प्राप्नुतम् (मान्यस्य) प्रशंसितुं योग्यस्य (कारोः) कारकस्य (अनु) आनुकूल्ये (यत्) (वाम्) युवाम् (श्रवस्या) आत्मनः श्रव श्रवणमिच्छया (सुदानू) सुष्ठुदातारौ (सुवीर्य्याय) उत्तमपराक्रमाय (चर्षणयः) मनुष्याः (वदन्ति) कामयन्ते ॥ ४ ॥

    भावार्थः

    या आप्तानां नीतिर्विदुषां स्तुतिः कमनीया भवेत् सोत्तमपराक्रमाय प्रभवति ॥ ४ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अब सज्जनता का आश्रय लिये हुए अध्यापक और उपदेशक विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

    पदार्थ

    हे (सूदानू) अच्छे देनेवाले ! जो (वाम्) तुम दोनों की (माध्वी) मधुरादि गुणयुक्त (रातिः) देनि वर्त्तमान है (सा) वह (अस्मे) हम लोगों के लिये (अस्तु) हो। और तुम (मान्यस्य) प्रशंसा के योग्य (कारोः) कार करनेवाले की (स्तोमम्) प्रशंसा को (हिनोतम्) प्राप्त होओ और (श्रवस्या) अपने को सुनने की इच्छा से (यत्) जिन (वाम्) तुमको (सुवीर्य्याय) उत्तम पराक्रम के लिये (चर्षणयः) साधारण मनुष्य (अनु, मदन्ति) अनुमोदन देते हैं तुम्हारी कामना करते हैं, उनको हम भी अनुमोदन देवें ॥ ४ ॥

    भावार्थ

    जो आप्त श्रेष्ठ सद्धर्मी सज्जनों की नीति और विद्वानों की स्तुति मनोहर हो, वह उत्तम पराक्रम के लिये समर्थ होती है ॥ ४ ॥

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    विषय

    मधुर जीवन

    पदार्थ

    १. हे प्राणापानो! (वाम्) = आपका (सा) = वह (माध्वी) = माधुर्य से पूर्ण (राति:) = दान (अस्मे अस्तु) = हमारे लिए हो । प्राणसाधना से सब अवाञ्छनीय तत्त्व नष्ट होते हैं और जीवन बड़ा सुन्दर बन जाता है। २. (मान्यस्य) = [मान पूजायाम्] पूजा की वृत्तिवाले (कारो:) = कुशलता से कार्य करनेवाले के (स्तोमम्) = स्तुतिसमूह को (हिनोतम्) = [हि वृद्धौ] बढ़ानेवाले होओ। शुद्ध हृदय होकर यह प्रभु का स्तवन करनेवाला बने। इसका स्तवन कुशलता से कर्मों को करने से युक्त हो । यह केवल शाब्दिक स्तुति में ही न पड़ा रहे, कर्मशील बने । ३. हे (सुदानू) = अच्छी प्रकार बुराइयों का खण्डन करनेवाले प्राणापानो ! (यत्) = जब (श्रवस्या) = उत्तम ज्ञान की प्राप्ति की इच्छा से (चर्षणयः) = श्रमशील मनुष्य (वाम् अनुमदन्ति) = आपकी साधना के अनुपात में आनन्द का अनुभव करते हैं तो उस समय वे (सुवीर्यस्य) = उत्तम शक्ति के लिए होते हैं। प्राणसाधना से शक्ति की ऊर्ध्वगति होने से हम शक्तिसम्पन्न बनते हैं। यही शक्ति ज्ञानाग्नि का ईंधन बनकर हमारी ज्ञानाग्नि को दीप्त करती है। इस ज्ञानाग्नि की दीप्ति से हमारा ज्ञान बढ़ता है।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्राणसाधना से जीवन मधुर बनता है, स्तुति की वृत्ति बनती है, शक्ति बढ़ती है और ज्ञानाग्नि दीप्त होती है।

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    विषय

    विद्वान् स्त्री पुरुषों के कर्त्तव्य ।

    भावार्थ

    हे उत्तम स्त्री पुरुषो ! हे ( सुदानू ) उत्तम दानशील, एक दूसरे को अच्छी प्रकार समर्पण करने वाले वर वधू ! ( चर्षणयः ) विद्वान् पुरुष ( श्रवस्या ) यश की कामना से ही ( सुवीर्याय ) उत्तम वीर्यवान् पुत्र को प्राप्त करने के लिये अथवा ( वां ) तुम दोनों में से ( सुवीर्याय ) उत्तम वीर्यवान् पुरुष के उत्साह वृद्धि के लिये ही ( वां अनुमदन्ति ) तुम दोनों को देख २ कर प्रसन्न होते हैं, तुम दोनों की खुशी के साथ लोग खुशी मनाते हैं। हमारी कामना है । कि ( वां ) तुम दोनों की (सा) वह उत्तम ( रातिः ) दानशीलता या परस्पर समृद्धि ( अस्मे ) हमारे बीच में हमारे लिये ( माध्वी ) मधुर, रम्य और उत्तम फलजनक (अस्तु) हो । आप दोनों ( मान्यस्य ) प्रमाण भूत, ज्ञानमय शास्त्रों में प्रवीण और माननीय आप्त, (कारोः) क्रिया कुशल, अनुभवी पुरुष के ( स्तोमम् ) कहे उपदेशों को (हिनोतम् ) प्रसन्नता से प्राप्त करो ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अगस्त्य ऋषिः ॥ अश्विनौ देवते ॥ छन्दः—१ पङ्क्तिः। ४ भुरिक् पङ्क्तिः। ५, ६, निचृत् पङ्क्तिः । २, ३, विराट् त्रिष्टुप् ॥ षडर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    आप्त श्रेष्ठ सद्धर्मी सज्जनांची नीती व विद्वानांची स्तुती मनोहर असेल तर ती पराक्रमासाठी समर्थ असते. ॥ ४ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Ashvins, givers of light and knowledge, may that generosity with all its gifts be sweet as honey to us. Receive and accept the song of celebration created by the venerable poet, O lords of generosity, since all people in search of honour and valour enjoy and celebrate life in accordance and harmony with your life and culture.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    Emphasis on truthful and honest policy and actions.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O liberal donors ! may your sweet liberality be displayed towards us. Accept and acknowledge the admiration of a venerable person, who performs good deeds. May we also honor, desire and please you, in order to get the strength and fame, O noble teachers and preachers !

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Absolutely truthful and honest policy and praise of the enlightened persons encourage a man to take a right path.

    Foot Notes

    (हिनोतम्) प्राप्तुम् | हि-गति वृद्धयोः । गतेस्त्रिष्वर्थेषु अत्न प्राप्त्यर्थग्रहणम् । = Acquire. ( अनुमदन्ति ) कामयन्ते = Desire and please.

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