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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 75 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 75/ मन्त्र 5
    ऋषिः - गोतमो राहूगणः देवता - अग्निः छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    यजा॑ नो मि॒त्रावरु॑णा॒ यजा॑ दे॒वाँ ऋ॒तं बृ॒हत्। अग्ने॒ यक्षि॒ स्वं दम॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यज॑ । नः॒ । मि॒त्रावरु॑णा । यज॑ । दे॒वान् । ऋ॒तम् । बृ॒हत् । अग्ने॑ । यक्षि॑ । स्वम् । दम॑म् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यजा नो मित्रावरुणा यजा देवाँ ऋतं बृहत्। अग्ने यक्षि स्वं दमम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यज। नः। मित्रावरुणा। यज। देवान्। ऋतम्। बृहत्। अग्ने। यक्षि। स्वम्। दमम् ॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 75; मन्त्र » 5
    अष्टक » 1; अध्याय » 5; वर्ग » 23; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

    अन्वयः

    हे अग्ने यतस्त्वं स्वं दमं यक्षि तस्मान्नो मित्रावरुणा यज बृहदृतं देवाँश्च यज ॥ ५ ॥

    पदार्थः

    (यज) सङ्गमय। अत्र द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (नः) अस्मभ्यम् (मित्रावरुणा) बलपराक्रमकारकौ प्राणोदानौ (यज) सङ्गच्छस्व (देवान्) दिव्यगुणान् भोगान् (ऋतम्) सत्यं विज्ञानम् (बृहत्) महाविद्यादिगुणयुक्तम् (अग्ने) विज्ञानयुक्त (यक्षि) यजसि। अत्र लडर्थे लुङ्। (स्वम्) स्वकीयम् (दमम्) दान्तस्वभावं गृहम् ॥ ५ ॥

    भावार्थः

    यथा परमेश्वरस्य परोपकारन्यायादिशुभगुणदानस्वभावोऽस्ति तथैव विद्वद्भिरपि तादृक् स्वभावः कर्त्तव्यः ॥ ५ ॥ अत्रेश्वराग्निविद्वद्गुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति वेदितव्यम् ॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

    पदार्थ

    हे (अग्ने) पूर्ण विद्यायुक्त विद्वान् मनुष्य ! जिस कारण (स्वम्) आप अपने (दमम्) उत्तम स्वभावरूपी घर को (यक्षि) प्राप्त होते हैं, इसी से (नः) हमारे लिये (मित्रावरुणा) बल और पराक्रम के करनेवाले प्राण और उदान को (यज) अरोग कीजिये (बृहत्) बड़े-बड़े विद्यादिगुणयुक्त (ऋतम्) सत्य विज्ञान को (यज) प्रकाशित कीजिये ॥ ५ ॥

    भावार्थ

    जैसे परमेश्वर का परोपकार के लिये न्याय आदि शुभ गुण देने का स्वभाव है, वैसे ही विद्वानों को भी अपना स्वभाव रखना चाहिये ॥ ५ ॥ इस सूक्त में ईश्वर अग्नि और विद्वान् के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये ॥

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    विषय

    मेरा शरीर प्रभु का घर हो

    पदार्थ

    १. हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो ! आप (नः) = हमारे साथ (मित्रावरुणा) = मित्र और वरुण को (यज) = संगत कीजिए । आपकी कृपा से हम सबके प्रति स्नेह करनेवाले तथा निर्द्वेषता को धारण करनेवाले हों । २. (देवान् यज) = आप हमारे साथ देवताओं को संगत कीजिए । आपकी कृपा से हममें दिव्य भावनाओं की वृद्धि हो । ३. (बृहत् ऋतम्) = सब प्रकार की वृद्धियों के कारणभूत ऋत का आप हमारे साथ मेल कीजिए । हम अपने जीवन में इस ऋत का पालन करनेवाले बनें । ४. हे (अग्ने) = प्रभो ! इस प्रकार मित्र, वरुण, देव व बृहत् ऋत का सम्पर्क होने पर हमारा जीवन बड़ा प्रशस्त बन जाता है और हमारा यह शरीर प्रभु आपका घर ही बन जाता है, तब हम प्रभु आपसे प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभो ! (स्वं दमम्) = आप अपने घर के साथ (यक्षि) = संगत होओ । हमारा यह शरीर आपका निवासस्थान हो । हम आपका आतिथ्य करनेवाले हों ।

    भावार्थ

    भावार्थ - प्रभुकृपा से हम मित्रता, निर्द्वेषता, दिव्यगुण व ऋत को धारण करके अपने इस शरीर को प्रभु का गृह बना पाएँ ।

    विशेष / सूचना

    विशेष - सूक्त के आरम्भ में कहा है कि - हम सात्त्विक भोजन द्वारा ज्ञानप्रवण बनें [१] । वेदवाणियों के सेवन से हम सशक्त मेधावी बनें [२] । प्रभु अज्ञेय व अचिन्त्य हैं [३] । वे हमारे प्रिय मित्र हैं [४] । हम मित्रतादि को धारण करते हुए प्रभु के गृह बनें [५] । इस प्रभु का उपगमन [उपासन] हमारे जीवनों को अत्यन्त आनन्दमय बनाता है - इन शब्दों से अगला सूक्त आरम्भ होता है -

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    विषय

    राजा और विद्वान् के कर्तव्योपदेश ।

    भावार्थ

    हे (अग्ने) विद्वन् ! तू (स्वं दमम्) अपने गृह के और उसके समान देह या इन्द्रियों के दमन कार्य को ( यक्षि ) अभ्यास कर । (नः) हमारे ( मित्रावरुणा ) प्राण और अपान दोनों को ( यज ) सुंसगत कर ॥ ( बृहत् ऋतम् यज ) बड़े भारी ऋत, सत्य, वेद ज्ञान को प्राप्त कर और अन्यों को उसका उपदेश कर । इति त्रयोविंशो वर्गः ॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    गोतमो राहूगण ऋषिः । निर्देवता । छन्दः—१ गायत्री । २, ४, ५ निचृद्गायत्री । ३ विराड् गायत्री । पञ्चर्चं सूक्तम् ।

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    विषय

    विषय (भाषा)- फिर वह मनुष्य कैसा हो, इस विषय का उपदेश इस मन्त्र में किया है ॥

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    सन्धिच्छेदसहितोऽन्वयः- हे अग्ने यतः त्वं स्वं दमं यक्षि तस्मान् नः मित्रावरुणा यज बृहत् ऋतं देवान् च यज ॥५॥

    पदार्थ

    पदार्थः- हे (अग्ने) विज्ञानयुक्त=विशेष ज्ञान से युक्त परमेश्वर ! (यतः)=क्योंकि, (स्वम्) स्वकीयम्=अपने, (दमम्) दान्तस्वभावं गृहम्= धैर्यवान् स्वभाव से घर में, (यक्षि) यजसि=यज्ञ करते हो। (तस्मात्)=उससे, (नः) अस्मभ्यम्=हमारे लिये, (मित्रावरुणा) बलपराक्रमकारकौ प्राणोदानौ =बल और पराक्रम, तथा प्राण और उदान की, (यज) सङ्गमय=सङ्गति करके, (बृहत्) महाविद्यादिगुणयुक्तम्=बहुत विद्या आदि के गुण से युक्त, (ऋतम्) सत्यं विज्ञानम्=विशेष सत्य ज्ञानवाले, (देवान्) दिव्यगुणान् भोगान्= दिव्य गुणों से भोग करने के लिये , (च)=भी, (यज) सङ्गच्छस्व=साथ-साथ चलो ॥५॥

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    महर्षिकृत भावार्थ का अनुवादक-कृत भाषानुवाद- जैसे परमेश्वर के परोपकार, न्याय आदि शुभ गुण देने का स्वभाव है, वैसे ही विद्वानों को भी अपना स्वभाव रखना चाहिये ॥५॥

    विशेष

    सूक्त के महर्षिकृत भावार्थ का अनुवादक-कृत भाषानुवाद- इस सूक्त में ईश्वर अग्नि और विद्वान् के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये ॥५॥ अनुवादक की टिप्पणियाँ- 1-प्राण- इसका स्थान नासिका से हृदय तक है। नेत्र, श्रोत्र, मुख आदि अवयव इसी के सहयोग से कार्य करते हैं। 2-उदान-यह कण्ठ से शिर (मस्तिष्क) तक के अवयवों में रहता है। शब्दों का उच्चारण, वमन आदि क्रियायें इससे होती हैं। यह कण्ठ के केन्द्र में स्थित है। शरीर को उठाये रखना इसका कार्य है। मृत्यु के समय उदान ही सूक्ष्म शरीर को बाहर निकाल कर ले जाता है।

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)- हे (अग्ने) विशेष ज्ञान से युक्त परमेश्वर ! (यतः) क्योंकि (स्वम्) अपने (दमम्) धैर्यवान् स्वभाव से निवास-स्थान में, [अर्थात् सम्पूर्ण विश्व में] (यक्षि) यज्ञ करते हो। (तस्मात्) उससे (नः) हमारे लिये (मित्रावरुणा) बल और पराक्रम, तथा प्राण और उदान की (यज) सङ्गति करके (बृहत्) बहुत विद्या आदि के गुण से युक्त, (ऋतम्) विशेष सत्य ज्ञानवाले, (देवान्) दिव्य गुणों से भोग करने के लिये (च) भी (यज) [यज्ञ में सङ्गति करते हुए] साथ-साथ चलो ॥५॥

    संस्कृत भाग

    यज॑ । नः॒ । मि॒त्रावरु॑णा । यज॑ । दे॒वान् । ऋ॒तम् । बृ॒हत् । अग्ने॑ । यक्षि॑ । स्वम् । दम॑म् ॥ विषयः- पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥ भावार्थः(महर्षिकृतः)- यथा परमेश्वरस्य परोपकारन्यायादिशुभगुणदानस्वभावोऽस्ति तथैव विद्वद्भिरपि तादृक् स्वभावः कर्त्तव्यः ॥५॥ सूक्तस्य भावार्थः(महर्षिकृतः)- अत्रेश्वराग्निविद्वद्गुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति वेदितव्यम् ॥५॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जसा परमेश्वर परोपकार, न्याय इत्यादी शुभ गुण देणारा असतो तसेच विद्वानानेही वागावे. ॥ ५ ॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    Agni, do yajna for Mitra and Varuna, pranic energy of prana and apana. Do yajna for the divine energies of nature. Do yajna for Rtam, promotion of Eternal Knowledge of divine Law. Do yajna for the sake of your own home and for self-control and self-culture.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    How is Agni is taught further in the fifth Mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O learned person ! as you abide peacefully in your house, having self control, please unite us with strengthening Prana and Udana (vital breaths), Unite us with divine enjoyments and with true knowledge endowed with great wisdom and other virtues.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (मित्रावरुणा) बलपराक्रमकारको प्राणोदानौ ॥ = Prana and Udana which produce strength. (ऋतम् ) सत्यं विज्ञानम् = True knowledge.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    As God is Doer of good to all, just and liberal Donor, learned persons should also imitate Him.

    Translator's Notes

    प्राणोदानौ मित्रावरुणौ (शतपथे ३.२.२.१३) ऋतमितिसत्यनाम (निघ० ३.१०) As Rita (ऋत) is derived from ॠ गतिप्रापणयो: and the first meaning of गति is knowledge, therefore Rishi Dayananda has interpreted ऋतम् as सत्यं विज्ञानम् or true knowledge. As Rishi Dayananda has clearly hinted in the Bhavartha (purport) besides the above, there is spiritual meaning of the Mantra relating to God which is as follows:- O God, bring to us teachers and preachers who are friendly to all and destroyers of the darkness of ignorance. Bring to our great sacrifice (of knowledge) the enlightened truthful persons. Grant to us Thy perfect peace and bliss. प्राणौदानौ मित्रावरुणौ ( शत० ३.२.२ १३ ) तद्वद् वर्तमानौ अध्यापकोपदेशकौ जिमिदा-स्नेहने सर्वसुह् त् प्रज्ञानान्धकार निवारकश्च तौ अध्यापकोपदेशकौ । मित्रावरुणौ अध्यापकोपदेशकौ इति दयानन्दर्षिः ऋ० ७.१३.१० भाष्ये । (दमम् ) दाम्यन्ति सर्वाणि दुःखान्यस्मिन् इति दमः परमेश्वरस्य सच्चिदानन्दस्वरूपम् दाम्यन्तिउपशाम्यन्ति दुःखानि यस्मिन् स दम: परमानन्दपदम् इति दयानन्दषिः ऋ० १. १. ८ भाष्ये । Here ends the commentary on the seventy-fifth hymn and 23rd Varga of the 1st Mandala of the Rigveda. This hymn is connected with the previous hymn as there is mention of the attributes of God, Agni [fire] and learned persons here.

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    Subject of the mantra

    Then, what kind of that person should be?This subject has been preached in this mantra.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    He=O! (agne)= God endowed with special knowledge, (yataḥ) =because, (svam) =own, (damam) =In the abode with a composure nature, [arthāt sampūrṇa viśva meṃ]= i.e. all over the world, (yakṣi) =you perform yajna, (tasmāt) =by that, (naḥ) =for us, (mitrāvaruṇā)=of strength and bravery, and of life and udāna, (yaja)= by associating, (bṛhat)=blessed with great knowledge etc., (ṛtam)=those with special true knowledge, (devān)= to enjoy by divine qualities, (ca) =also, (yaja)=accompany, [yajña meṃ saṅgati karate hue] =attending the yajna.

    English Translation (K.K.V.)

    O God endowed with special knowledge! Because, with your composure nature, you perform yajna at your abode, that is, in the entire world. By associating with strength and bravery, life-breath and udāna, having the qualities of much knowledge etc., having special knowledge of the truth, and in order to enjoy the divine virtues, accompany in attending the yajna.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    Just as God has the nature of giving good qualities like benevolence, justice etc., scholars should also have the same nature. Since the qualities of God, fire and a scholar are described in this hymn, the interpretation of this hymn should be understood to be consistent with the interpretation of the previous hymn.

    TRANSLATOR’S NOTES-

    1-Prᾱņa- Its location is from the nostrils to the heart. Organs like eyes, ears, mouth etc. work with the help of this. 2-Udᾱna- Its location is in the organs from the gut to the head (brain). Actions like utterance of words, vomit etc. take place from it. It is located in the center of the gorge. Its function is to keep the body up. At the time of death, it is Udᾱna that takes the subtle body out.

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