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ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 110 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 110/ मन्त्र 2
    ऋषिः - जम्दग्नी रामो वा देवता - आप्रियः छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    तनू॑नपात्प॒थ ऋ॒तस्य॒ याना॒न्मध्वा॑ सम॒ञ्जन्त्स्व॑दया सुजिह्व । मन्मा॑नि धी॒भिरु॒त य॒ज्ञमृ॒न्धन्दे॑व॒त्रा च॑ कृणुह्यध्व॒रं न॑: ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तनू॑ऽनपात् । प॒थः । ऋ॒तस्य॑ । याना॑न् । मध्वा॑ । स॒म्ऽअ॒ञ्जन् । स्व॒द॒य॒ । सु॒ऽजि॒ह्व॒ । मन्मा॑नि । धी॒भिः । उ॒त । य॒ज्ञम् । ऋ॒न्धन् । दे॒व॒ऽत्रा । च॒ । कृ॒णु॒हि॒ । अ॒ध्व॒रम् । नः॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तनूनपात्पथ ऋतस्य यानान्मध्वा समञ्जन्त्स्वदया सुजिह्व । मन्मानि धीभिरुत यज्ञमृन्धन्देवत्रा च कृणुह्यध्वरं न: ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तनूऽनपात् । पथः । ऋतस्य । यानान् । मध्वा । सम्ऽअञ्जन् । स्वदय । सुऽजिह्व । मन्मानि । धीभिः । उत । यज्ञम् । ऋन्धन् । देवऽत्रा । च । कृणुहि । अध्वरम् । नः ॥ १०.११०.२

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 110; मन्त्र » 2
    अष्टक » 8; अध्याय » 6; वर्ग » 8; मन्त्र » 2
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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (सुजिह्व) हे शोभन ज्वालावाली अग्नि ! या शोभन वेदवाणीवाले परमात्मन् ! (तनूनपात्) यज्ञ करनेवाले यजमान देहों को न गिरानेवाले या स्तुतिकर्त्ता देहों जनों को न गिरानेवाले परमात्मन् ! (ऋतस्य) होमयज्ञ के या ब्रह्मयज्ञ के (यानान् पथः) जाने योग्य मार्गों को (मध्वा) मधु से (समञ्जन्) संयुक्त करता हुआ (स्वदय) स्वयं स्वाद से ग्रहण कर या अन्यों को स्वाद दे (धीभिः) कर्मों से (उत) तथा (मन्मानि) मननसाधन अन्तःकरणों को (यज्ञम्) होमयज्ञ या ब्रह्मयज्ञ को (ऋन्धन्) समृद्ध करता हुआ स्थिर रहे या विराज (नः) हमारे (च) और (अध्वरम्) अहिंसनीय कर्म को (देवत्रा) देवों में या इन्द्रियों में (कृणुहि) प्रेरित कर, इन्द्रियाँ विषयों से विरक्त हो जावें ॥२॥

    भावार्थ

    यज्ञ में प्रयुक्त अग्नि शोभन ज्वालावाला यज्ञ करनेवाले यजमानपरिवार को स्वस्थ रखता है और उनके गृहसम्बन्धी जीवनमार्गों को मधुर बना देता है, गृहस्थकर्मों से उनके यज्ञ और अन्तःकरणों को समृद्ध करता है, अहिंसनीय यथार्थ आचरण को इन्द्रियों में चरितार्थ कर देता है एवं वेदवाणी से सम्पन्न परमात्मा स्तुति करनेवाले जनों को गिरने नहीं देता है, पतित नहीं होने देता है, उनके ब्रह्मयज्ञ के प्रकारों को मधुर बनाता है, कर्मों से अध्यात्मयज्ञ तथा अन्तःकरणों को समृद्ध करता है और अहिंसनीय-अहिंसा आदि व्रत को इन्द्रियों में चरितार्थ करा देता है, जो विषयों से विरक्त हो जाती हैं ॥२॥

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    विषय

    प्रभु का उपदेश

    पदार्थ

    [१] गत मन्त्र के अनुसार आराधना करनेवाले 'राम' को प्रभु कहते हैं कि (तनूनपात्) = तू शरीर को न गिरने देनेवाला हो, तेरा स्वास्थ्य गिर न जाए। (ऋतस्य यानान्) = ऋत के, यज्ञ के व प्रभु के प्राप्त करानेवाले (पथः) = मार्गों को (मध्वा) = माधुर्य से (समञ्जन्) = अलंकृत करता हुआ, इन्हीं ऋत के प्राप्ति हेतुभूत मार्गों पर चलता हुआ, हे (सुजिह्व) = उत्तम जिह्वावाले राम ! तू (स्वदया) = जीवन को आनन्दमय बनानेवाला हो। [२] (च) = और (धीभिः) = उत्तम बुद्धियों व कर्मों के साथ (मन्मानि) = स्तोत्रों को (उत) = और (यज्ञम्) = यज्ञों को (ऋन्धन्) = समृद्ध करता हुआ (नः) = हमारे इस (अध्वरम्) = हिंसारहित यज्ञात्मक कर्म को (देवत्रा) = देवों की प्राप्ति के निमित्त (कृणुहि) = कर । अध्वरों के द्वारा तू अपने में दिव्य गुणों को बढ़ानेवाला हो।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम स्वस्थ, ऋत प्राप्ति के हेतुभूत मार्गों पर चलनेवाले, मधुर, स्तवनशील, यज्ञों को अपनानेवाले तथा दिव्यगुणों की प्राप्ति के हेतुभूत हिंसारहित कर्मों को करनेवाले हों ।

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    विषय

    देहपतन होने देने वाले आत्मा का वर्णन। हिंसारहित यज्ञ का प्रतिपादन।

    भावार्थ

    हे (तनूनपात्) देहवत् विस्तृत समाज को भी नीचे न गिरने देने हारे ! हे (सु-जिह्न) उत्तम, सुखदायक वाणी वाले ! (यानान्) जाने योग्य (ऋतस्य पथः) सत्य ज्ञान और धर्म के मार्गों को (मध्वा) मधुर ज्ञानोपदेश से (सम्-अञ्जन्) अच्छी तरह प्रकाशित करता हुआ (स्वदय) उनका अन्यों को आनन्द रस का आस्वादन करा। उनको अधिक सुखप्रद कर। तू (धीभिः) उत्तम बुद्धियों और कर्मों से (मन्मानि) अनेक ज्ञानमय कर्मों को और (यज्ञम्) यज्ञ को (ऋन्धन्) सम्पादन करता हुआ, (देवत्रा च) मनुष्यों के बीच में भी (नः अध्वरं) हमारा हिंसारहित यज्ञ (कृणुहि) सम्पादन कर।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषि जमदग्नी रामो वा भार्गवः। देवता आप्रियः॥ छन्दः–१, २, ५, १०, ११ निचृत् त्रिष्टुप्। ३ आर्ची त्रिष्टुप्। ४, ८ पादनिचृत् त्रिष्टुप्॥ ६, ७, ९ त्रिष्टुप्। एकादशर्चं सूक्तम्॥

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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (सुजिह्व) हे शोभनज्वाले ! “काली कराली च…सप्तजिह्वा” [मुण्डको० १।२।१] यद्वा शोभनवेदवाग्युक्त ! “जिह्वा वाङ्नाम” [निघ० १।११] (तनूनपात्) यज्ञकर्तॄन् देहान् जनान् न पातयितः ! यद्वा प्रशस्तदेहान् स्तोतॄन् न पातयितः परमात्मन् ! (ऋतस्य) सोमयज्ञस्य यद्वा ब्रह्मयज्ञस्य वा (यानान् पथः) यातुं योग्यान् मार्गान् (मध्वा) मधुना (समञ्जन्) संयोजयन् सन् (स्वदय) त्वं स्वदय यद्वा स्तोतॄन् स्वादय (धीभिः) कर्मभिः (उत) अपि (मन्मानि) मननसाधनानि खल्वन्तःकरणानि (यज्ञम्) होमयज्ञं ब्रह्मयज्ञं वा (ऋन्धन्) समृद्धानि कुर्वन् तिष्ठ (नः) अस्माकम् (अध्वरं च) अहिंसनीयं श्रेष्ठकर्म (देवत्रा कृणुहि) देवेषु तथेन्द्रियेषु प्रेरय यथा विषयेभ्यो विरक्तानि खल्विन्द्रियाणि भवेयुः ॥२॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O Tanu-napat, sustainer of your own existential form and promoter of our health and mind, O divine light of holy flames, enjoy and sprinkle with honey the paths of yajna by which the fragrances rise and the yajakas proceed to the divinities by observance of the law of Truth, and, augmenting our thoughts with acts of holiness and beatifying the yajna, take over our songs and yajna of love and non-violence and establish it in the heights of divinities.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    यज्ञात प्रयुक्त असलेला अग्नी शोभिवंत व ज्वालायुक्त असून, यज्ञ करणाऱ्या यजमान परिवाराला स्वस्थ ठेवतो व त्यांच्या गार्हस्थ जीवनमार्गाला मधुर बनवितो, तसेच गृहस्थकर्माद्वारे त्यांच्या यज्ञाला व अंत:करणाला समृद्ध करतो. अहिंसामय यथार्थ आचरणाला इंद्रियात चरितार्थ करतो व वेदवाणीने संपन्न परमात्म्याची स्तुती करणाऱ्या लोकांचे अवमूल्यन होऊ देत नाही. पतित होऊ देत नाही. त्यांच्या ब्रह्मयज्ञाच्या प्रकारांना मधुर बनवितो. कर्मांनी अध्यात्मयज्ञ व अंत:करणांना समृद्ध करतो व अहिंसनीय - अहिंसा इत्यादी व्रताला इंद्रियात चरितार्थ करतो. जी विषयातून विरक्त होतात. ॥२॥

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