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ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 110 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 110/ मन्त्र 5
    ऋषिः - जम्दग्नी रामो वा देवता - आप्रियः छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    व्यच॑स्वतीरुर्वि॒या वि श्र॑यन्तां॒ पति॑भ्यो॒ न जन॑य॒: शुम्भ॑मानाः । देवी॑र्द्वारो बृहतीर्विश्वमिन्वा दे॒वेभ्यो॑ भवत सुप्राय॒णाः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    व्यच॑स्वतीः । उ॒र्वि॒या । वि । श्र॒य॒न्ता॒म् । पति॑ऽभ्यः । न । जन॑यः । शुम्भ॑मानाः । देवीः॑ । द्वा॒रः॒ । बृ॒ह॒तीः॒ । वि॒श्व॒म्ऽइ॒न्वाः॒ । दे॒वेभ्यः॑ । भ॒व॒त॒ । सु॒प्र॒ऽअ॒य॒णाः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    व्यचस्वतीरुर्विया वि श्रयन्तां पतिभ्यो न जनय: शुम्भमानाः । देवीर्द्वारो बृहतीर्विश्वमिन्वा देवेभ्यो भवत सुप्रायणाः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    व्यचस्वतीः । उर्विया । वि । श्रयन्ताम् । पतिऽभ्यः । न । जनयः । शुम्भमानाः । देवीः । द्वारः । बृहतीः । विश्वम्ऽइन्वाः । देवेभ्यः । भवत । सुप्रऽअयणाः ॥ १०.११०.५

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 110; मन्त्र » 5
    अष्टक » 8; अध्याय » 6; वर्ग » 8; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (देवीः-द्वारः) दिव्य अग्निज्वालाएँ (पतिभ्यः-न) पतियों के लिये जैसे (शुम्भमानाः-जनयः) सुशोभित हुई जायाएँ-पत्नियाँ (व्यचस्वतीः) विशिष्ट सुख पहुँचाती हुईं (उर्विया) वरणीयतम जङ्घाओं से (विश्रयन्ताम्) विशेष आश्रय लेती हैं, वैसे तुम आश्रय लेवो। (बृहतीः) वे तुम उदार, विशाल (देवेभ्यः) वायु आदि देवों के लिये (विश्वमिन्वाः) सब प्राप्त करानेवाली सुखप्रद होवो। अध्यात्मदृष्टि से-अध्यात्म यज्ञ में-परमात्मा की व्याप्तियाँ या विभूतियाँ उसके द्वारभूत पतियों के लिये सुशोभायमान पत्नियाँ जैसे होती हैं, वैसे स्तुति करनेवालों के लिये आकर्षक तथा सुख प्राप्त करानेवाली होती हैं, यह आशय है ॥५॥

    भावार्थ

    होमयज्ञ में अग्नि की ज्वालाएँ वायु आदि देवों का आलिङ्गन सा करती हुईं शोभायमान प्रतीत होती हैं, वे उदार बनी हुई अपने को देवों के प्रति समर्पित कर रही हैं एवं अध्यात्मयज्ञ में परमात्मा की व्याप्तियाँ या विभूतियाँ स्तुति करनेवालों के लिये आकर्षक सुख प्राप्त करानेवाली बन जाती हैं ॥५॥

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    विषय

    इन्द्रिय द्वार

    पदार्थ

    [१] (न) = जिस प्रकार (जनय:) = पत्नियाँ (शुम्भमाना:) = उत्तम वस्त्रादि से शोभित हुई हुई (पतिभ्यः) = पतियों के लिए (विश्रयन्ताम्) = विशेषरूप से सेवा करनेवाली होती हैं इसी प्रकार (देवी: द्वार:) = दिव्य गुणोंवाले इन्द्रिय-द्वार (उर्विया) = विस्तार के द्वारा, अपनी-अपनी शक्तियों के विस्तार से शोभित हुए हुए (व्यचस्वती:) = व्यापनवाले होकर, ज्ञानेन्द्रियाँ ज्ञान का व्यापन करती हुई और कर्मेन्द्रियाँ यज्ञादि कर्मों का व्यापन करती हुई विश्रयन्ताम् आत्मा का सेवन करनेवाली हों। [२] ये दिव्य इन्द्रिय द्वार (बृहती:) = वृद्धिवाले हों । (विश्वं इन्वाः) = ये इन्द्रिय द्वारा सब शक्तियों का व्यापन करते हुए (देवेभ्यः) = देववृत्ति के पुरुषों के लिए (सुप्रायणाः भवत) = उत्तम प्रकृष्ट गमनवाले हों। अपने-अपने कार्यों को अच्छी प्रकार करती हुई इन्द्रियाँ मनुष्य को देव बनानेवाली होती हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ- इन्द्रियों को विकसित शक्तिवाला व उत्तम मार्ग पर चलनेवाला बनाकर हम देव बनें।

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    विषय

    गृहदेवियों, वेदवाणियों का द्वारों के तुल्य वर्णन।

    भावार्थ

    (शुम्भमानाः) उत्तम गुणों और आभूषणों, वस्त्रों से सजती हुईं (जनयः न) गृह देवियां जिस प्रकार (पतिभ्यः) अपने २ पतियों के लिये (सु-प्र-अयनाः) सुख प्राप्त कराने वाली होती हैं उसी प्रकार (द्वारः) गृह के द्वार (देवीः) प्रकाश से युक्त (व्यचस्वतीः) विशेष विस्तृत, (उर्विया) विशाल, (बृहतीः) बड़े, (विश्वमिन्वाः) सबको प्रसन्न और सुखी करने वाले होकर (उर्विया) बहुत २ (वि श्रयन्तां) खुलें, अनेक सुख प्रदान करें, और (देवेभ्यः) उत्तम मनुष्यों के लिये (सु-प्र-अयणाः भवत) सुख से आने जाने के लिये, सुखप्रद हों। इसी प्रकार (बृहताः) वेद-वाणियां भी (वि-अचस्वतीः) विविध ज्ञान की प्रकाशक, (उर्विया वि श्रयन्तां) बहुत ज्ञान, विविध प्रकार से देने वाली हैं। (विश्व-मिन्वाः) जगत् के समस्त ज्ञान को देने वाली, (सु-प्र-अयणाः) सुखमय उत्तम मार्ग बतलाने वाली हों। इत्यष्टमो वर्गः॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषि जमदग्नी रामो वा भार्गवः। देवता आप्रियः॥ छन्दः–१, २, ५, १०, ११ निचृत् त्रिष्टुप्। ३ आर्ची त्रिष्टुप्। ४, ८ पादनिचृत् त्रिष्टुप्॥ ६, ७, ९ त्रिष्टुप्। एकादशर्चं सूक्तम्॥

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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (देवीः-द्वारः) दिव्याः-अग्निज्वालाः “देवीर्द्वारः अग्निरिति शाकपूणिः” [निरु० ८।१०] (पतिभ्यः-न जनयः शुम्भमानाः) पतिभ्यो मैथुनधर्मे सुशोभिषमाणा जाया इव (व्यचस्वतीः) व्यञ्चनवत्यो विशिष्टसुखगमनवत्यः (उर्विया) उरुत्वेन वरतमेन वरणीयतमेन जङ्घाङ्गेनेव (विश्रयन्ताम्) विशेषेणाश्रयन्तां प्रत्यक्षदृष्ट्योच्यते (बृहतीः) ता यूयं बृहत्यः-उदाराः-विशालाः (देवेभ्यः-विश्वमिन्वाः) वायुप्रभृतिभ्यः सर्वप्रापिकाः सुखप्रदा भवत। इति निरुक्तानुसारी खल्वर्थः। अध्यात्मयज्ञे परमात्मनो व्याप्तयो विभूतयो वा तद्द्वारभूताः पतिभ्यः सुशोभमानाः पत्न्यो यथा भवन्ति, स्तोतृभ्यः-आकर्षिका भवन्ति सर्वसुखप्रापिकाश्च भवन्तीत्याशयः ॥५॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Let the doors of divine vision and wisdom open wide and high, unbounded, unbarred, universal, accommodative and blissful for the divinities of nature and humanity, and sustain and promote the people as gracious women with open arms inspire and exalt their husbands.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    होमयज्ञात अग्नीच्या ज्वाला वायू इत्यादी देवांचे आलिंगन केल्याप्रमाणे शोभायमान दिसतात. उदार बनून आपल्या देवांना समर्पित करतात व अध्यात्मयज्ञात परमात्म्याची व्याप्ती किंवा विभूती स्तुती करणाऱ्यासाठी आकर्षक सुख प्राप्त करविणाऱ्या बनतात. ॥५॥

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