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ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 115 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 115/ मन्त्र 3
    ऋषिः - उपस्तुतो वार्ष्टिहव्यः देवता - अग्निः छन्दः - जगती स्वरः - निषादः

    तं वो॒ विं न द्रु॒षदं॑ दे॒वमन्ध॑स॒ इन्दुं॒ प्रोथ॑न्तं प्र॒वप॑न्तमर्ण॒वम् । आ॒सा वह्निं॒ न शो॒चिषा॑ विर॒प्शिनं॒ महि॑व्रतं॒ न स॒रज॑न्त॒मध्व॑नः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तम् । वः॒ । विम् । न । द्रु॒ऽसद॑म् । दे॒वम् । अन्ध॑सः । इन्दु॑म् । प्रोथ॑न्तम् । प्र॒ऽवप॑न्तम् । अ॒र्ण॒वम् । आ॒सा । वह्नि॑म् । न । शो॒चिषा॑ । वि॒ऽर॒प्शिन॑म् । महि॑ऽव्रतम् । न । स॒रज॑न्तम् । अध्व॑नः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तं वो विं न द्रुषदं देवमन्धस इन्दुं प्रोथन्तं प्रवपन्तमर्णवम् । आसा वह्निं न शोचिषा विरप्शिनं महिव्रतं न सरजन्तमध्वनः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तम् । वः । विम् । न । द्रुऽसदम् । देवम् । अन्धसः । इन्दुम् । प्रोथन्तम् । प्रऽवपन्तम् । अर्णवम् । आसा । वह्निम् । न । शोचिषा । विऽरप्शिनम् । महिऽव्रतम् । न । सरजन्तम् । अध्वनः ॥ १०.११५.३

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 115; मन्त्र » 3
    अष्टक » 8; अध्याय » 6; वर्ग » 18; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (वः) हे मनुष्यों ! तुम (तं देवम्) उस परमात्मदेव (अन्धसः-इन्दुम्) आध्यानीय स्नेहकर्त्ता (प्रोथन्तम्) प्राप्त होते हुए (प्रवपन्तम्) ज्ञानबीज बोते हुए (अर्णवम्) समुद्र के समान महान् (विं न द्रुषदम्) वृक्ष पर बैठनेवाले पक्षी के समान, संसारवृक्ष पर विराजमान परमात्मा को स्तुति में लाओ (आसा) भलीभाँति फेंकने के साधन (शोचिषा) तेज से (विरप्शिनम्) महान् (महिव्रतम्) महाकर्मवाले (अध्वनः-सरजन्तम्) मोक्षमार्ग के स्रष्टा (वह्निम्) संसार के वहन करनेवाले परमात्मा की स्तुति करो ॥३॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को चाहिये कि स्नेहकर्त्ता व्यापक ज्ञान के बीज को देनेवाले संसार के अधिष्ठाता मोक्षमार्ग के सृजन करनेवाले परमात्मा की स्तुति करें ॥३॥

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    विषय

    मार्गदर्शक प्रभु

    पदार्थ

    [१] (तम्) = उस प्रभु को उपासित करो जो (वः) = तुम्हारे (विं न) = पक्षी के समान (द्रुषदम्) = शरीररूप वृक्ष पर आसीन होनेवाले हैं। (देवम्) = प्रकाशमय है, (अन्धसः इन्दुम्) = सोम के द्वारा हमें शक्तिशाली बनानेवाले हैं। (प्रोथन्तम्) = हमारे सब अन्तः शत्रुओं को जो पराभूत करनेवाले हैं [to sabdne]। वासनाओं को पराभूत करके (प्रवपन्तम्) = जो सद्गुणों के बीजों को बोनेवाले हैं। (अर्णवम्) = ज्ञान समुद्र हैं । [२] उस प्रभु का उपासन करो जो प्रभु (आसा वह्निं न) = मुख से अग्नि के समान हैं, अत्यन्त तेजस्वी हैं। (शोचिषा) = अपनी ज्ञानदीप्ति से (विरप्शिनम्) = महान् हैं । और (महिव्रतं न) = इस महान् व्रतवाले सूर्य की तरह (अध्वनः) = मार्गों को (स-रजन्तम्) = [सह रंजयन्तम्] एक साथ दीप्त करते हुए हैं। सूर्य अन्धकार को दूर करके बाह्य मार्गों को प्रकाशित करता है। इसी प्रकार हृदयस्थ प्रभु अज्ञानान्धकार को दूर करके हमारे कर्त्तव्य मार्गों को प्रदर्शित करते हैं ।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम उस प्रभु का उपासन करें जो हमारे हृदयों में आसीन हैं, प्रकाशमय हैं, हमारी बुराइयों को दूर करके अच्छाइयों के बीज को हमारे में बोनेवाले हैं, और सूर्य के समान मार्गदर्शक हैं।

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    विषय

    पक्षी के तुल्य प्रभु का वर्णन।

    भावार्थ

    हे विद्वान् जनो ! (वः) आप लोग (द्रु-सदं विं न) वृक्ष पर विराजते पक्षी के तुल्य, ‘द्रु-सद्’ द्रुतगति से जाने वाले सूर्य आदि समस्त जगत् के अधिष्ठाता, (विं) व्यापक, (अन्धसः) जीवनप्रद कर्मफल के (देवम्) दाता, (इन्दुम्) सर्वप्रकाशक, सर्वैश्वर्यवान्, (प्रोथन्तम्) सर्वत्र व्यापक, (प्र-वपन्तम्) सब लोकों में अन्न, जीवादि का बीज वपन करने वाले, (अर्णवम्) समुद्र के समान (आसा) सर्वजगत् को प्रेरणा करने वाले महान् सामर्थ्य से (वह्निम्) जगत् को उठाने हारे (वि-रप्शिनम्) महान्, (महिव्रतम्) बड़े २ कर्म करने वाले और (शोचिषा) तेज से (अध्वनः सरजन्तम्) अनेकों मार्गों को रंजित या प्रकाशित करते हुए प्रभु की स्तुति करो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिरुपस्तुतो वाष्टिर्हव्यः॥ अग्निर्देवता॥ छन्द:- १, २, ४, ७ विराड् जगती। ३ जगती। ५ आर्चीभुरिग् जगती। ६ निचृज्जगती। ८ पादनिचृत् त्रिष्टुप्। ९ पादनिचृच्छक्वरी। नवर्चं सूक्तम्॥

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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (वः) हे मनुष्याः ! यूयम्, व्यत्ययेन द्वितीया (तं देवम्-अन्धसः-इन्दुम्) तं परमात्मदेवम् आध्यानीयं स्नेहसेक्तारं “इन्दुरिन्धतेः” (प्रोथन्तम्) पर्याप्नुवन्तं (प्रवपन्तम्) ज्ञानबीजं वपन्तं (अर्णवम्) समुद्रमिव महान्तं (विं न द्रुषदम्) वृक्षसदं पक्षीव संसारवृक्षसदं तं परमात्मानं स्तुवीध्वमिति शेषः (आसा) समन्तक्षेपणेन “आङ्पूर्वात् असु क्षेपणे” ततः क्विप् (शोचिषा) तेजसा (विरप्शिनम्) महान्तं (महिव्रतम्) महाकर्माणं (अध्वनः सरजन्तम्) मोक्षमार्गस्य स्रष्ट्रारं (वह्निम्) संसारस्य वोढारं परमात्मानं स्तुवीध्वम्, उभयत्र नकारौ पदपूरणौ ॥३॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O celebrants of yajna, celebrate Agni, the leader, watching every thing like a bird on the tree, abiding in every thing dynamic, brilliant and generous, profuse giver of food and joy, thundering as a cloud of living showers and deep as the sea, consumer of havi by flames of fire and giver of light by sun rays, mighty strong and exalted, grand achiever of victories and pioneer path maker and illuminator like the sun.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    माणसांनी स्नेहकर्ता व्यापक ज्ञानाचे बीज प्रदान करणाऱ्या संसाराचा अधिष्ठाता असलेल्या मोक्षमार्गाचे सृजन करणाऱ्या परमेश्वराची स्तुती करावी. ॥३॥

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