ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 26 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7 8 9
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 26/ मन्त्र 1
    ऋषि: - विमद ऐन्द्रः प्राजापत्यो वा वसुकृद्वा वासुक्रः देवता - पूषा छन्दः - उष्णिक् स्वरः - ऋषभः

    प्र ह्यच्छा॑ मनी॒षा स्पा॒र्हा यन्ति॑ नि॒युत॑: । प्र द॒स्रा नि॒युद्र॑थः पू॒षा अ॑विष्टु॒ माहि॑नः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्र । हि । अच्छ॑ । म॒नी॒षाः । स्पा॒र्हाः । यन्ति॑ । नि॒ऽयुतः॑ । प्र । द॒स्रा । नि॒युत्ऽर॑थः । पू॒षा । अ॒वि॒ष्टु॒ । माहि॑नः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्र ह्यच्छा मनीषा स्पार्हा यन्ति नियुत: । प्र दस्रा नियुद्रथः पूषा अविष्टु माहिनः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्र । हि । अच्छ । मनीषाः । स्पार्हाः । यन्ति । निऽयुतः । प्र । दस्रा । नियुत्ऽरथः । पूषा । अविष्टु । माहिनः ॥ १०.२६.१

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 26; मन्त्र » 1
    अष्टक » 7; अध्याय » 7; वर्ग » 13; मन्त्र » 1

    पदार्थ -
    (स्पार्हाः) हमारी वाञ्छनीय (नियुतः) नियत-स्थिर प्रतिदिन करने योग्य (मनीषाः) मानसिक स्तुतियाँ (अच्छ हि) अभिमुख ही (प्र यन्ति) पोषक परमात्मा को प्राप्त होती हैं। (दस्रा महिना) वह दर्शनीय महान् (नियुद्रथः) नित्यरमणयोग्य मोक्ष जिसका है, ऐसा (पूषा) पोषणकर्ता परमात्मा (प्र-अविष्टु) उस श्रेष्ठ स्थान मोक्ष को हमारे लिये सुरक्षित रखे-रखता है ॥१॥

    भावार्थ -
    उपासकों की प्रशस्त मानसिक स्तुतियाँ पोषणकर्ता परमात्मा को जब प्राप्त होती हैं, तो वह दर्शनीय महान् मोक्षदाता परमात्मा उसके लिये मोक्षस्थान को सुरक्षित रखता है ॥१॥

    पदार्थः -
    (स्पार्हाः) अस्माकं वाञ्छनीयाः (नियुतः) नियताः स्थिराः प्रत्यहं कर्त्तव्याः (मनीषाः) मनस ईषा मानसिक्यः स्तुतयः (अच्छ हि) अभिमुखमेव (प्र यन्ति) पूषणं पोषकं परमात्मानं प्रकृष्टं गच्छन्ति (दस्रा माहिनः) दर्शनीयः सुस्थाने आकारादेशश्छान्दसः, महान् “माहिनः-महन्नाम” [निघ० ३।३] (नियुद्रथः) स्थिरो नित्यो रमणयोग्यो मोक्षो यस्य सः (पूषा) पोषणकर्त्ता परमात्मा (प्र-अविष्टु) प्रकृष्टं स्थानमवतु-रक्षतु-रक्षतीत्यर्थः ॥१॥

    Meaning -
    With love and faith do our cherished thoughts, prayers and adorations well directed in meditation reach Pusha, lord of health and fulfilment. Great, beatific and blissful, his chariot of ultimate freedom of moksha is ever in readiness, may the lord ever protect and promote us to that ultimate freedom.

    Top