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ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 88 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 88/ मन्त्र 11
    ऋषिः - मूर्धन्वानाङ्गिरसो वामदेव्यो वा देवता - सूर्यवैश्वानरौ छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    य॒देदे॑न॒मद॑धुर्य॒ज्ञिया॑सो दि॒वि दे॒वाः सूर्य॑मादिते॒यम् । य॒दा च॑रि॒ष्णू मि॑थु॒नावभू॑ता॒मादित्प्राप॑श्य॒न्भुव॑नानि॒ विश्वा॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    य॒दा । इत् । ए॒न॒म् । अद॑धुः । य॒ज्ञिया॑सः । दि॒वि । दे॒वाः । सूर्य॑म् । आ॒दि॒ते॒यम् । य॒दा । च॒रि॒ष्णू इति॑ । मि॒थु॒नौ । अभू॑ताम् । आत् । इत् । प्र । अ॒प॒श्य॒न् । भुव॑नानि । विश्वा॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यदेदेनमदधुर्यज्ञियासो दिवि देवाः सूर्यमादितेयम् । यदा चरिष्णू मिथुनावभूतामादित्प्रापश्यन्भुवनानि विश्वा ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यदा । इत् । एनम् । अदधुः । यज्ञियासः । दिवि । देवाः । सूर्यम् । आदितेयम् । यदा । चरिष्णू इति । मिथुनौ । अभूताम् । आत् । इत् । प्र । अपश्यन् । भुवनानि । विश्वा ॥ १०.८८.११

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 88; मन्त्र » 11
    अष्टक » 8; अध्याय » 4; वर्ग » 12; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (यत्) जब (यज्ञियासः-देवाः) यज्ञसम्पादी सृष्टि के प्राण (दिवि) हिरण्यमय ब्रह्माण्ड में (आदितेयम्) पृथिवी से सम्बद्ध हुए (सूर्यम् अदधुः) सूर्य को धारण करते हैं-स्थापित करते हैं (यदा) जब कि (चरिष्णू मिथुना-अभूताम्) दो सहचारी सूर्य और उषा परस्पर आश्रयभूत प्रकट होते हैं (आत्-इत्) अनन्तर ही (विश्वा भूतानि प्र-अपश्यन्) सब प्राणी देखते हैं ॥११॥

    भावार्थ

    सृष्टि के प्राण सृष्टि के पदार्थों कणों को संगत करते हुए पृथिवी से संगत हो सूर्य और उषा जोड़े को प्रकट करते हैं, जिन्हें सब प्राणी देखते हैं ॥११॥

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    विषय

    यज्ञिय देवों को प्रभु-दर्शन

    पदार्थ

    [१] (यदा) = जब (इत्) = निश्चय से (एनम्) = इस (सूर्यम्) = सबको कर्मों की प्रेरणा देनेवाले, (आदितेयम्) = अदिति के पुत्र को, अर्थात् अदिति स्वास्थ्य [अखण्डन] के द्वारा दर्शनीय अथवा अदीनता व दिव्यगुणों के द्वारा दर्शनीय प्रभु को (यज्ञियासः) = यज्ञ आदि उत्तम कर्मों में लगे हुए (देवा:) = देववृत्ति के पुरुष (दिवि) = ज्ञान के प्रकाश के होने पर (अदधुः) = धारण करते हैं । [२] यहाँ प्रभु को अदिति का पुत्र इसलिए कहा है कि जैसे पुत्र की उत्पत्ति पिता से होती है इसी प्रकार प्रभु का दर्शन अदिति से होता है। अदिति का अर्थ है– [क] स्वास्थ्य तथा [ख] अदीना देवमाता । प्रभु के दर्शन के लिये स्वास्थ्य का ठीक रखना आवश्यक है, साथ ही अदीनतापूर्वक दिव्यगुणों को धारण करना अत्यन्त आवश्यक है। प्रभु का दर्शन यज्ञिय देवों को होता है। उत्तम कर्मों को करना ही यज्ञिय बनना है तथा दैवी सम्पत्ति के वर्धन से हम देव बनते हैं। ये यज्ञिय देव ज्ञान के प्रकाश के होने पर प्रभु-दर्शन कर पाते हैं । एवं हाथों में यज्ञ हों, मन में दैवी वृत्ति हो, मस्तिष्क ज्ञान से परिपूर्ण हो, तो मनुष्य प्रभु का धारण करनेवाला बनता है। [३] (यदा) = जब (मिथुनौ) = घर में पति-पत्नी शिक्षणालय में शिष्य और आचार्य, राष्ट्र में राजा प्रजा ये दोनों (चरिष्णू) = खूब क्रियाशील होते हैं, आलस्य से शून्य होते हैं, (आत् इत्) = तब ही (विश्वा भुवनानि) = सब लोग (प्रापश्यन्) = उस प्रभु को प्रकर्षेण देखनेवाले बनते हैं। प्रभु-दर्शन की सब से बड़ी योग्यता 'आलस्यशून्यता' ही है। जब सब मिलकर राष्ट्र को अच्छा बनाने का प्रयत्न करते हैं, शिक्षणालय व घर को अच्छा बनाने का प्रयत्न करते हैं, तभी प्रभु दर्शन होता है।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम उत्तम कर्मोंवाले, देववृत्तिवाले व ज्ञान को प्रकाश को प्राप्त करनेवाले बनकर प्रभु-दर्शन के अधिकारी बनें।

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    विषय

    महान् सूर्य प्रभु। उसकी प्रकृति से संगति और समस्त लोकों की उत्पत्ति

    भावार्थ

    (यदा इत्) जब (यज्ञियासः देवाः) यज्ञशील, यज्ञ के साधक, (देवाः) विद्वान् जन (एनम्) इस (सूर्यम्) समस्त जगत् के प्रकाशक और प्रेरक सूर्य को (दिवि) आकाश में (आदितेयम्) ‘आदितेय’ अर्थात् अखण्ड शक्ति, प्रकृति के अधीन कभी अस्त न होने वाला, स्वतः अविनाशी रूप से (अदधुः) धारण करते हैं, जानते हैं, उसको प्राप्त करते हैं और (यदा) जब (चरिष्णू) सूर्य चन्द्र वा उषा और आदित्य के तुल्य दोनों (मिथुनौ) एक दूसरे का आश्रय देने वाले परस्परोपजीवी, परस्पर संगत (अभूताम्) होते हैं। (आत् इत्) अनन्तर ही वे (विश्वा भुवना) समस्त लोकों को (प्र अपश्यन्) देखते हैं (२) परमेश्वर महान् सूर्य है जो अदिति, प्रकृति का स्वामी होने से आदितेय है। अदिति अर्थात् प्रकृति और सूर्य, प्रभु जब दोनों परस्पर मिथुनीभाव में होकर जगत् को रचते हैं तभी नाना लोक बनते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः मूर्धन्वानाङ्गिरसो वामदेव्यो वा॥ देवता—सूर्यवैश्वानरो॥ छन्दः—१–४, ७, १५, १९ विराट् त्रिष्टुप्। ५, ८ त्रिष्टुप्। ६, ९–१४, १६, १७ निचृत् त्रिष्टुप्। १८ आर्ची स्वराट् त्रिष्टुप्। एकोनविंशत्यृचं सूक्तम्।

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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (यत्) यदा (यज्ञियासः-देवाः) यज्ञसम्पादिनः प्राणाः (दिवि) हिरण्यमये ब्रह्माण्डे (आदितेयम्) अदितिः पृथिवी “अदितिः पृथिवीनाम” [निघ० १।१] पृथिव्या सह सम्बद्धं लक्ष्यीकृत्य (सूर्यम्-अदधुः) दधति-धारयन्ति-स्थापयन्ति (यदा चरिष्णू मिथुना-अभूताम्) यदा पुनर्द्वौ सहचारिणौ मिथुनौ परस्परमाश्रयभूतौ वाऽऽदित्यश्चोषाश्च प्रादुर्भवतः (आत्-इत्) अनन्तरं हि (विश्वा भूतानि प्र-अपश्यन्) सर्वाणि भूतानि सर्वे प्राणिनः प्रत्यक्षं पश्यन्ति, इत्येषोऽर्थो निरुक्तानुसारी ॥११॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    When the divine powers, performers of cosmic yajna, place this sun, child of the refulgence of Aditi, mother Infinity, in the heavenly region, then it becomes two, moving together as twofold power, Agni and Vaishvanara, sun and dawn, and as they pervade all regions of the world, so do all regions of the world see them.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    सृष्टीचे प्राण सृष्टीच्या पदार्थ कणांना संगत करून पृथ्वीला संगत होऊन सूर्य व उषेची जोडी प्रकट करतात. त्यानंतरच सर्व प्राणी पाहू शकतात. ॥११॥

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