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ऋग्वेद मण्डल - 3 के सूक्त 58 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 3/ सूक्त 58/ मन्त्र 4
    ऋषिः - गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा देवता - अश्विनौ छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    आ म॑न्येथा॒मा ग॑तं॒ कच्चि॒देवै॒र्विश्वे॒ जना॑सो अ॒श्विना॑ हवन्ते। इ॒मा हि वां॒ गोऋ॑जीका॒ मधू॑नि॒ प्र मि॒त्रासो॒ न द॒दुरु॒स्रो अग्रे॑॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ । म॒न्ये॒था॒म् । आ । ग॒त॒म् । कत् । चि॒त् । एवैः॑ । विश्वे॑ । जना॑सः । अ॒श्विना॑ । ह॒व॒न्ते॒ । इ॒मा । हि । वा॒म् । गोऽऋ॑जीका । मधू॑नि । प्र । मि॒त्रासः॑ । न । द॒दुः । उ॒स्रः । अग्रे॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ मन्येथामा गतं कच्चिदेवैर्विश्वे जनासो अश्विना हवन्ते। इमा हि वां गोऋजीका मधूनि प्र मित्रासो न ददुरुस्रो अग्रे॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आ। मन्येथाम्। आ। गतम्। कत्। चित्। एवैः। विश्वे। जनासः। अश्विना। हवन्ते। इमा। हि। वाम्। गोऽऋजीका। मधूनि। प्र। मित्रासः। न। ददुः। उस्रः। अग्रे॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 3; सूक्त » 58; मन्त्र » 4
    अष्टक » 3; अध्याय » 4; वर्ग » 3; मन्त्र » 4
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह।

    अन्वयः

    हे अश्विनावध्यापकोपदेशकौ यौ युवां विश्वे जनासो हवन्तेऽग्रे हीमा गोऋजीका मधूनि मित्रासो न प्रददुस्तानुस्रो वामेवैः कदाऽऽगतं चिदपि तानामन्येथाम् ॥४॥

    पदार्थः

    (आ) समन्तात् (मन्येथाम्) विजानीतम् (आ) (गतम्) आगच्छतम् (कत्) कदा (चित्) अपि (एवैः) सद्यः प्रापकैर्विद्युदादिचालितैर्यानैः (विश्वे) सर्वे (जनासः) प्रसिद्धा मनुष्याः (अश्विना) वायुविद्युतौ (हवन्ते) आददति (इमा) इमानि (हि) यतः (वाम्) (गोऋजीका) गवां दुग्धादिना मिश्रितानि (मधूनि) (प्र) (मित्रासः) सखायः (न) इव (ददुः) दद्युः (उस्रः) गाः। उस्रेति गोनाम०। निघं० २। ११। (अग्रे) पूर्वम् ॥४॥

    भावार्थः

    विदुषां योग्यतास्ति ये प्रीत्या धार्मिकाः सुसेवका विद्यार्थिनश्श्रोतारो वा समीपमागच्छेयुस्तेभ्यः प्रशस्तानि विज्ञानादीनि दद्युः। हि यतो सर्वे मनुष्याः सर्वैः सह मित्रवद्वर्त्तेरन् ॥४॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

    पदार्थ

    हे (अश्विना) अध्यापक और उपेदशक जन ! आप दोनों को (विश्वे) सम्पूर्ण (जनासः) प्रसिद्ध मनुष्य (हवन्ते) ग्रहण करते हैं (अग्रे) और प्रथम (हि) कि जिससे (इमा) इन (गोऋजीका) गौवों के दुग्ध आदि से मिले हुए (मधूनि) सोमलतारूप औषधियों के रसों को (मित्रासः) मित्र लोगों के (न) सदृश (प्र, ददुः) देवें। उनको तथा (उस्रः) गौओं को (वाम्) आप दोनों (एवैः) शीघ्र पहुँचानेवाले बिजुली आदि से चलाये गये वाहनों से (कत्) कब (आ, गतम्) प्राप्त हुए (चित्) भी (आ) सब प्रकार (मन्येथाम्) जानिये ॥४॥

    भावार्थ

    विद्वानों की योग्यता है कि जो प्रीति से धार्मिक उत्तम सेवक विद्यार्थी वा श्रोताजन समीप आवैं, उनको उत्तम विज्ञान आदि देवैं, जिससे सब मनुष्य सबके साथ मित्रों के सदृश वर्त्ताव करैं ॥४॥

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    विषय

    प्रातःकालीन साधना

    पदार्थ

    [१] हे (अश्विना) = प्राणापानो! (आमन्येथाम्) = आप हमें अवबोध [ज्ञान] देनेवाले होओ। (कच्चित्) = क्या आप हमें (एवैः) = गतियों द्वारा (आगतम्) = प्राप्त होते हो ? अर्थात् आप अवश्य प्राप्त होते हो। हम अपने प्राणापान की शक्ति को बढ़ाकर क्रियाशील बनें। आपको (विश्वे जनासः) = सब लोग (हवन्ते) = पुकारते हैं। सब प्राणापान की साधना करते हैं। सब कुछ इस प्राणापान पर ही निर्भर करता है। हम प्रातः उठकर प्राणसाधना करें, स्वाध्यायशील हों और यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्त हो जाएँ। [२] (अश्विनी) = देवो! (वाम्) = आपके लिए (इमा) = इन (गोऋजीका मधूनि) = गोदुग्ध मिश्रित मधुओं को- ओषधियों से सारभूत पदार्थों को (ददुः) = देते हैं। इस प्रकार देते हैं, (न) = जैसे कि (मित्रासः) = मित्र मित्रों के लिए उत्तम पदार्थों को देते हैं, अर्थात् प्राणापान-शक्ति का वर्धन करने के लिए गोदुग्ध मिश्रित मधु [मधुर पदार्थों] का ही प्रयोग करना चाहिए। इस प्रकार (उस्त्रः) = इनकी ज्ञानरश्मियाँ (अग्रे) = आगे और आगे बढ़ती हैं- इनका ज्ञान उत्तरोत्तर दीप्त होता जाता है।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम प्रात: उठकर प्राणसाधना में प्रवृत्त हों, ज्ञान प्राप्त करने के लिए यत्नशील हों यज्ञादि कार्यों में प्रवृत्त हों। गोदुग्ध व मधु आदि सारभूत पदार्थों का ही प्रयोग करें।

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    विषय

    अश्वी, नासत्य, सोमपान आदि पदों की व्याख्या।

    भावार्थ

    हे (अश्विना) अश्व अर्थात् राष्ट्र के स्वामिवत् स्त्री पुरुषो ! आप दोनों को (विश्वे जनासः) सभी मनुष्य लोग (आहवन्ते) आदरपूर्वक बुलावें और (कत् चित्) कभी कभी आप दोनों (एवैः) उत्तम ज्ञानयुक्त पुरुषों द्वारा (आमन्येथाम्) उत्तम २ ज्ञान का अभ्यास किया करो और (कत् चित्) कभी कभी (एवैः) उत्तम गमन साधन रथों से (आ गतम्) आया जाया करो। (अग्रे) सब से प्रथम (उस्रः) सूर्य की किरणों के समान उत्तम पद पर पहुंचे हुए विद्वान् पुरुष (मित्रासः) तुम्हारे अति स्नेही मित्रों के सदृश लोग (वां) तुम दोनों का (इमा) इन (गोऋजीका) गाय के दूधसे मिले हुए (मधूनि) अन्नों के समान ही (गोऋजीका) उत्तम वाणियों से ऋजुता विनय धर्म मार्ग (मधूनि) मधुर ज्ञान (ददुः) दिया करें।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    विश्वामित्र ऋषिः॥ अश्विनौ देवते॥ छन्दः– १, ८, ९ त्रिष्टुप्। २, ३, ४, ५, ७ निचृत्त्रिष्टुप्। ६ भुरिक् पंक्तिः॥ नवर्चं सूक्तम्॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    धार्मिक उत्तम सेवक, विद्यार्थी किंवा श्रोतागण प्रेमाने विद्वानाजवळ येतात तेव्हा त्यांना उत्तम विज्ञान द्यावे. ज्यामुळे सर्व माणसे सर्वांबरोबर मित्रांप्रमाणे वागतील. ॥ ४ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Ashvins, scholars, teachers, specialists, come by whatever fastest means of transport you can at the earliest and study our plans and projects. All the best people of the world invite and call upon you. These cherished programmes and achievements on earth and plans of solar energy are for your consideration which, as friends, they dedicate to you for approval and application in advance of the sunrise.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The duties and functions of automobile engineers are told.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O teachers and preachers ! all men invoke you. Come with your speedy vehicles driven by energy. To you, men offer the sweet-Soma juice mixed with milk as friends give gifts to friends. Come to those who invite you lovingly and reverently and also to protect the cows.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    It is the duty of the enlightened persons to give good knowledge to all those, who are students attendants or other members of the audience, and approach them with love and reverence. Consequently, all may treat others like friends.

    Foot Notes

    (एवैः) सद्यः प्रापके विद्युदादिचालितैर्यानैः । एवैः अयनैः । अवृनैर्वेति (NKT 2, 7, 25) = By the vehicles driven by electricity etc. (गोऋजीका ) गवां दुग्धादिना मिश्रितानि । गो-गोदुग्धम् इत्यस्य प्रमाणं निरुक्ते । अथाप्यस्यां तद्धितेन कृत्सवन्निगमा भवन्ति । गोभिः श्रीणीत मत्सरम् ( ऋ 9, 46, 4) इति पयसः (NKT 2, 2, 5,)= Mixed with the milk of the cows.

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