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ऋग्वेद मण्डल - 5 के सूक्त 60 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 5/ सूक्त 60/ मन्त्र 5
    ऋषिः - श्यावाश्व आत्रेयः देवता - मरुतो वाग्निश्च छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    अ॒ज्ये॒ष्ठासो॒ अक॑निष्ठास ए॒ते सं भ्रात॑रो वावृधुः॒ सौभ॑गाय। युवा॑ पि॒ता स्वपा॑ रु॒द्र ए॑षां सु॒दुघा॒ पृश्निः॑ सु॒दिना॑ म॒रुद्भ्यः॑ ॥५॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒ज्ये॒ष्ठासः॑ । अक॑निष्ठासः । ए॒ते । सम् । भ्रात॑रः । व॒वृ॒धुः॒ । सौभ॑गाय । युवा॑ । पि॒ता । स्वपा॑ । रु॒द्रः । ए॒षा॒म् । सु॒ऽदुघा॑ । पृश्निः॑ । सु॒ऽदिना॑ । म॒रुत्ऽभ्यः॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते सं भ्रातरो वावृधुः सौभगाय। युवा पिता स्वपा रुद्र एषां सुदुघा पृश्निः सुदिना मरुद्भ्यः ॥५॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अज्येष्ठासः। अकनिष्ठासः। एते। सम्। भ्रातरः। ववृधुः। सौभगाय। युवा। पिता। सुऽअपाः। रुद्रः। एषाम्। सुऽदुघा। पृश्निः। सुऽदिना। मरुत्ऽभ्यः ॥५॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 5; सूक्त » 60; मन्त्र » 5
    अष्टक » 4; अध्याय » 3; वर्ग » 25; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनर्मनुष्यैः कथं भवितव्यमित्याह ॥

    अन्वयः

    हे मनुष्या ! यथा स्वपा युवा रुद्रः पितैषां सुदुघा सुदिना पृश्निर्मरुद्भ्यो मनुष्येभ्यो विद्यादिदानं ददाति तथाऽज्येष्ठासोऽकनिष्ठास एते भ्रातरः सौभगाय सं वावृधृः ॥५॥

    पदार्थः

    (अज्येष्ठासः) ज्येष्ठभावरहिताः (अकनिष्ठासः) कनिष्ठभावमप्राप्ताः (एते) (सम्) (भ्रातरः) बन्धवः (वावृधुः) वर्धन्ते (सौभगाय) श्रेष्ठैश्वर्य्यस्य भावाय (युवा) (पिता) पालकः (स्वपाः) श्रेष्ठकर्मानुष्ठानः (रुद्रः) अन्येषां रोदयिता (एषाम्) (सुदुघा) सुष्ठु कामस्य प्रपूरिका (पृश्निः) अन्तरिक्षमिव बुद्धिः (सुदिना) उत्तमदिना (मरुद्भ्यः) वायुभ्यः ॥५॥

    भावार्थः

    ये मनुष्याः पूर्णयुवावस्थायां विद्याः समाप्य सुशीलतां स्वीकृत्यातीवोत्तमाः सन्तः सुशीलाः स्त्रियः स्वीकृत्य च प्रयतन्ते त ऐश्वर्य्यं प्राप्यानन्दिता भवन्ति ॥५॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर मनुष्यों को कैसे होना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे मनुष्यो ! जैसे (स्वपाः) श्रेष्ठ कर्म का अनुष्ठान करनेवाला (युवा) युवावस्थायुक्त और (रुद्रः) अन्यों को रुलानेवाला (पिता) पालक जन और (एषाम्) इन की (सुदुघा) उत्तम प्रकार मनोरथ को पूर्ण करनेवाली (सुदिना) सुन्दर दिन जिससे वह (पृश्निः) अन्तरिक्ष के सदृश बुद्धि (मरुद्भ्यः) मनुष्यों के लिये विद्यादि दान देती है, वैसे (अज्येष्ठासः) जेठेपन से रहित (अकनिष्ठासः) कनिष्ठपन से रहित (एते) ये (भ्रातरः) बन्धु जन (सौभगाय) श्रेष्ठ ऐश्वर्य्य होने के लिये (सम्, वावृधुः) बढ़ते हैं ॥५॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य पूर्ण युवावस्था में विद्याओं को समाप्त कर और सुशीलता को स्वीकार कर बहुत ही उत्तम हुए उत्तम स्वभावयुक्त स्त्रियों को विवाह द्वारा स्वीकार करके प्रयत्न करते हैं, वे ऐश्वर्य्य को प्राप्त होकर आनन्दित होते हैं ॥५॥

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    विषय

    भ्रातृवत् समान रूप से उनको रहने का उपदेश ।

    भावार्थ

    भा०- ( एते ) ये मनुष्य, समस्त विद्वान् और वीरगण, (अज्येष्ठासः) परस्पर न एक दूसरे से बड़े और ( अकनिष्ठासः ) न एक दूसरे से छोटे, एक समान, मान-आदर, पदाधिकार से युक्त होकर ( भ्रातरः ) भाइयों के समान एक दूसरे को पुष्ट करते हुए ( सौभगाय ) सौभाग्य, अर्थात् उत्तम ऐश्वर्य को प्राप्त करने के लिये ( ववृधुः ) खूब बढ़ें। (एषां ) इनका (पिता) पालन करने वाला ( रुद्रः ) दुष्टों को रुलाने वाला, उनको दूर करने में समर्थ, एवं उत्तम उपदेष्टा, और (युवा) सदा बलशाली,( सु-अपाः) उत्तम सुखजनक कर्मों का करने वाला वा ( स्व-पाः ) अपने बन्धुवत् वा परिजनों की वा ऐश्वर्य की रक्षा करने हारा है । ( मरुद्भ्यः ) इन वायुवत् बलवान् और कर्मण्य प्रजावर्गों के लिये (पृश्निः ) सूर्य, आकाश और पृथिवी, ( सु-दुधा ) गौ के समान सुख पदार्थ देने वाली, और जलवर्षी और अन्नदात्री हों और ( सुदिना ) सूर्य उत्तम दिन प्रकट करने हारा हो। इसी प्रकार 'वायु' अर्थात् ज्ञान की कामना करने वाले शिष्यगण 'मरुत्' हैं वे समान रूप से भ्रातृवत् रहें, उनका पिता आचार्य और विद्वान् वेदवित्, उत्तम ज्ञान-रस देने हारा हो ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    श्यावाश्व आत्रेय ऋषिः ॥ मरुतो मरुतो वाग्निश्च देवता ॥ छन्द:- १, ३, ४, ५ निचृत् त्रिष्टुप् । २ भुरिक् त्रिष्टुप । विराट् त्रिष्टुप् । ७, ८ जगती ॥ अष्टर्चं सूक्तम् ॥

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    विषय

    सब प्राणों की समानता

    पदार्थ

    [१] शरीर में ये प्राण ४९ भागों में बटकर कार्य करते हैं। (एते) = ये (अज्येष्ठासः अकनिष्ठास:) = कोई बड़ा व कोई छोटा नहीं है, कोई प्राण पहले व कोई पीछे पैदा होनेवाला नहीं है। ये सब (भ्रातरः) = शरीर का भरण करनेवाले भाइयों के समान (सौभगाय सं वावृधुः) = शरीर के सौभाग्य [सौन्दर्य] के लिये मिलकर बढ़नेवाले होते हैं । [२] सामान्यतः १० प्राणों [प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय] व आत्मा को ग्यारह रुद्रों के रूप में स्मरण किया जाता है। ये ११ शरीर को छोड़ते हुए रुलाते हैं, सो 'रुद्र' हैं । शरीरस्थ होते हुए ये रोगों का द्रावण करनेवाले होने से 'रुद्र' हैं । (एषाम्) = इन प्राणों का (पिता) = रक्षक यह आत्मा (युवा) = बुराई को पृथक् करनेवाला व अच्छाई को जोड़नेवाला है। स्वधाः सदा उत्तम कर्मोंवाला है। वस्तुतः प्राणों का रक्षण ही हमें 'युवा व स्वधा' बनाता है। उस समय (मरुद्भ्यः) = इन प्राणों के द्वारा (पृश्निः) = प्रकाश की किरण (सुदुघा) = हमारे लिये सुख दोह्य होती है, अर्थात् प्राणसाधना से हम प्रकाश को आसानी से पाते हैं और (सुदिना) = यह प्रकाश हमारे लिये दिनों को उत्तम बनानेवाला होता है ।

    भावार्थ

    भावार्थ- सब प्राण समानरूप से महत्त्ववाले हैं, ये शरीर के सौभाग्य को बढ़ाते हैं। आत्मा इनका रक्षक होता हुआ उत्तम कर्मोंवाला होता है, इनके द्वारा प्रकाश की किरण हमें प्राप्त होती है।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जी माणसे युवावस्थेत विद्येचे अध्ययन करून सुशीलतेने अत्यंत उत्तम स्वभावाच्या स्त्रियांशी विवाह करतात ती प्रयत्न करून ऐश्वर्य प्राप्त करतात व आनंदित होतात. ॥ ५ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    None highest, none lowest, all equal as brothers together, the Maruts, leading lights of life and humanity, work and grow and advance for the honour and prosperity of life and living. Their father and creator, Rudra, lord omnipotent of justice and dispensation, ever young, giver of sustenance, and mother earth and the firmament, ever abundant and generous for the Maruts through the bright days, look after them and inspire them.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    How should men be is told here.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    All these men are brothers. There is none superior among them, none inferior (on account of birth in a certain family or country). Their father is a man of good deeds, young and terrible for the wicked (making them weep) and their mother is good intellect (which is like the firmament), who by giving them education to the fulfiller of noble desires and kind, making all days good for them, who are powerful like the winds. It is in this way that all men grow towards properties.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Those persons who having completed their education in full youth, and being men of good character and temperament marry women of good nature and endeavour, attain prosperity and enjoy bliss.

    Translator's Notes

    The words स्वपा: = may be also taken for God Who is the Doer of the best deeds and पृश्नि: may be taken for the earth as stated in the Shatapath Brahmana 1.8, 3.15 इदं व वशापृश्नि ( Stph 1, 8, 3, 15 ) इयं वै वशा पृश्निर्यदिदमस्यां मूलिचामूलिचान्नायं प्रतिष्ठितं तेनेयं वशा पृश्नि: ( Stph 5, 1, 3, 3 ) ।

    Foot Notes

    (स्वपाः) श्रेष्ठकर्मानुष्ठानः । सु + अपः इति कर्मनाम (NG 2, 1) = Doer of good deeds. ( सुदुधा) सुष्ठ कामस्य प्रपूरिका । सु = दुह- प्रपूरणे ( अदा० ) = Fulfiller of noble nesires. (पुश्नि: ) अन्तरिक्षामिव बुद्धिः । = Intellect which is like the firmament.

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