ऋग्वेद - मण्डल 5/ सूक्त 60/ मन्त्र 7
ऋषिः - श्यावाश्व आत्रेयः
देवता - मरुतो वाग्निश्च
छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
अ॒ग्निश्च॒ यन्म॑रुतो विश्ववेदसो दि॒वो वह॑ध्व॒ उत्त॑रा॒दधि॒ ष्णुभिः॑। ते म॑न्दसा॒ना धुन॑यो रिशादसो वा॒मं ध॑त्त॒ यज॑मानाय सुन्व॒ते ॥७॥
स्वर सहित पद पाठअ॒ग्निः । च॒ । यत् । म॒रु॒तः॒ । वि॒श्व॒ऽवे॒द॒सः॒ । दि॒वः । वह॑ध्वे । उत्ऽत॑रात् । अधि॑ । स्नुऽभिः॑ । ते । म॒न्द॒सा॒नाः । धुन॑यः । रि॒शा॒द॒सः॒ । वा॒मम् । ध॒त्त॒ । यज॑मानाय । सु॒न्व॒ते ॥
स्वर रहित मन्त्र
अग्निश्च यन्मरुतो विश्ववेदसो दिवो वहध्व उत्तरादधि ष्णुभिः। ते मन्दसाना धुनयो रिशादसो वामं धत्त यजमानाय सुन्वते ॥७॥
स्वर रहित पद पाठअग्निः। च। यत्। मरुतः। विश्वऽवेदसः। दिवः। वहध्वे। उत्ऽतरात्। अधि। स्नुऽभिः। ते। मन्दसानाः। धुनयः। रिशादसः। वामम्। धत्त। यजमानाय। सुन्वते ॥७॥
ऋग्वेद - मण्डल » 5; सूक्त » 60; मन्त्र » 7
अष्टक » 4; अध्याय » 3; वर्ग » 25; मन्त्र » 7
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अष्टक » 4; अध्याय » 3; वर्ग » 25; मन्त्र » 7
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनर्मनुष्याः किं कुर्य्युरित्याह ॥
अन्वयः
हे मनुष्या ! यद्येऽग्निरिव विश्ववेदसो दिवो रिशादसो मन्दसानो धुनयो मरुतो यूयं सुन्वते यजमानाय वामं धत्त। उत्तरादधि ष्णुभिर्वामं वहध्वे ते च यूयं सदा सर्वानुपकुरुत ॥७॥
पदार्थः
(अग्निः) पावक इव (च) (यत्) ये (मरुतः) मननशीला मानवाः (विश्ववेदसः) समग्रैश्वर्य्याः (दिवः) कामयमानाः (वहध्वे) प्राप्नुत (उत्तरात्) पश्चात् (अधि) उपरिभावे (स्नुभिः) इच्छावद्भिः (ते) (मन्दसानाः) आनन्दन्तः (धुनयः) दुष्टानां कम्पकाः (रिशादसः) हिंसकानां नाशकाः (वामम्) प्रशस्यम् (धत्त) (यजमानाय) सङ्गन्त्रे (सुन्वते) यज्ञकर्त्रे ॥७॥
भावार्थः
अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः । त एव महात्मानः सन्ति ये सर्वार्थं सत्यं दधति ॥७॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥
पदार्थ
हे मनुष्यो ! (यत्) जो (अग्निः) अग्नि के सदृश (विश्ववेदसः) सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य से युक्त (दिवः) कामना करते हुए (रिशादसः) हिंसकों के नाश करनेवाले (मन्दसानाः) आनन्द करते हुए (धुनयः) दुष्टों के कम्पानेवाले (मरुतः) विचारशील मनुष्य आप लोग (सुन्वते) यज्ञ करने और (यजमानाय) पदार्थों के मेल करनेवाले जन के लिये (वामम्) प्रशंसा करने योग्य व्यवहार को (धत्त) धारण करो और (उत्तरात्) पीछे से (अधि) ऊपर के होने में (स्नुभिः) इच्छा वालों से प्रशंसा करने योग्य को (वहध्वे) प्राप्त हूजिये (ते, च) वे भी आप लोग सदा सब का उपकार करिये ॥७॥
भावार्थ
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । वे ही महात्मा हैं, जो सब के लिये सत्य को धारण करते हैं ॥७॥
विषय
ऐश्वर्य दान का उपदेश ।
भावार्थ
भा०-हे ( मरुतः ) वायुवत् बलवान् पुरुषो ! आप (विश्व-वेदसः) सब प्रकार के धनों के स्वामी ( अग्निः ) अग्रणी, तेजस्वी पुरुष आप (दिवः ) ज्ञान प्रकाश तेज की कामना करते हुए ( उत्तरात् ) अपने से उत्कृष्ट (दिवः) ज्ञानयुक्त सूर्यवत् तेजस्वी पुरुष से (स्नुभिः ) अन्य उत्तम इच्छावान् पुरुषों सहित वा ज्ञान के उपदेशों द्वारा ( यत् अधि वहध्वे) जो अधिकार वा ज्ञान प्राप्त करते हो, (ते) वे आप लोग (मन्दसानाः ) आनन्द प्रसन्न ( धुनयः ) बाह्य और भीतरी शत्रुओं को कंपाते, दूर करते हुए ( रिषादसः) हिंसक प्राणियों का नाश करते हुए ( यजमानाय ) ज्ञान आदि का दान, उत्तम गुणों की याचना और सत्संग आदि करने वाले तथा ( सुन्वते ) अन्न ऐश्वर्यादि देने वाले पुरुष की वृद्धि के लिये ( वामं ) उत्तम ऐश्वर्य ( धत्त ) प्रदान करो ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
श्यावाश्व आत्रेय ऋषिः ॥ मरुतो मरुतो वाग्निश्च देवता ॥ छन्द:- १, ३, ४, ५ निचृत् त्रिष्टुप् । २ भुरिक् त्रिष्टुप । विराट् त्रिष्टुप् । ७, ८ जगती ॥ अष्टर्चं सूक्तम् ॥
विषय
प्रभु-स्मरण व प्राणसाधना
पदार्थ
[१] (अग्निः) = वह अग्रणी परमात्मा (च) = और (मरुतः) = प्राण (यत्) = क्योंकि (विश्ववेदसः) = सम्पूर्ण धनोंवाले हैं। प्रभु स्मरण व प्राणसाधना हमारे जीवन में सब ऐश्वर्यों का कारण बनते हैं। ये अग्नि और मरुत् (उत्तराद् दिवः) = उत्कृष्ट द्युलोक के (ष्णुभिः) = शिखरों से (अधिवहध्वे) = हमारा वहन करते हैं, अर्थात् ये हमें उत्कृष्ट द्युलोक के शिखर पर पहुँचानेवाले होते हैं। ज्ञान की चरमसीमा ही 'उत्कृष्ट द्युलोक' है । प्रभु-स्मरण व प्राणसाधना से हम इस उत्कृष्ट द्युलोक में पहुँचते हैं। [२] (ते) = वे (मन्दसाना:) = हमारे जीवनों को आनन्दमय बनाते हुए, (धुनयः) = शत्रुओं को कम्पित करनेवाले, (रिशादसः) = शत्रुओं को खा जानेवाले प्राणो! आप (सुन्वते) सोम का सम्पादन करनेवाले (यजमानाय) = यज्ञशील पुरुष के लिये (वामं धत्त) = सुन्दर धनों को धारण करो । प्रभु-स्मरण व प्राणसाधना से हमारा जीवन निर्दोष व यज्ञमय बने और सुन्दर धनों का धारण करनेवाला हो ।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु-स्मरण व प्राणसाधना ही हमें पृथिवी से अन्तरिक्ष में, अन्तरिक्ष से द्युलोक में व द्युलोक के शिखर पर पहुँचाते हैं। ये हमें निर्दोष व यज्ञशील बनाकर उत्तम धनों से धन्य बनाते हैं।
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जे सर्वस्वी सत्य धारण करतात तेच महात्मे असतात. ॥ ७ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
O Agni, leading light, and Maruts, dynamic leaders and pioneers, blest with knowledge and wealth of the world, you abide on top of the regions of light and love by your own will and desire and bring down showers of light and wisdom. O leaders and pioneers, such as you are, movers and shakers of the negatives, and as you rejoice on the vedi with the yajakas, bring down the gift of life’s wealth and beauty from over the levels of ordinary mortals for the yajamana and the creative soma yajaka.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
What should men do is told further.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O thoughtful men ! you always do good to others. You are purifiers like the fire, endowed with all wealth, desiring the good of all, destroyer of the violent and are ever cheerful. You shakers of the wicked, uphold all that is admirable for a performer of the Yajna who is associated with right lover persons. You do always what is auspicious from behind and above (in all directions. Ed.) along with all men of noble desires.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
Those only are Mahatmas (great souls) who up-hold truth for all.
Foot Notes
(विश्ववेदसः ) समग्रेश्यर्यः । वेदः इति धननाम (NG 2, 10) = Endowed with. (रिशादसः) हिंसकानां नाशकाः । रिष-हिंसायाम् (भ्वा० ) = Destroyers of the violent. (धुनय:) दुष्टानां कम्पकाः । अद्-भक्षणे (अदा० )। = Shakers of the wicked.
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