ऋग्वेद - मण्डल 6/ सूक्त 9/ मन्त्र 3
ऋषिः - भरद्वाजो बार्हस्पत्यः
देवता - वैश्वानरः
छन्दः - पङ्क्तिः
स्वरः - पञ्चमः
स इत्तन्तुं॒ स वि जा॑ना॒त्योतुं॒ स वक्त्वा॑न्यृतु॒था व॑दाति। य ईं॒ चिके॑तद॒मृत॑स्य गो॒पा अ॒वश्चर॑न्प॒रो अ॒न्येन॒ पश्य॑न् ॥३॥
स्वर सहित पद पाठसः । इत् । तन्तु॑म् । सः । वि । जा॒ना॒ति॒ । ओतु॑म् । सः । वक्त्वा॑नि । ऋ॒तु॒ऽथा । व॒दा॒ति॒ । यः । ई॒म् । चिके॑तत् । अ॒मृत॑स्य । गो॒पाः । अ॒वः । चर॑न् । प॒रः । अ॒न्येन॑ । पश्य॑न् ॥
स्वर रहित मन्त्र
स इत्तन्तुं स वि जानात्योतुं स वक्त्वान्यृतुथा वदाति। य ईं चिकेतदमृतस्य गोपा अवश्चरन्परो अन्येन पश्यन् ॥३॥
स्वर रहित पद पाठसः। इत्। तन्तुम्। सः। वि। जानाति। ओतुम्। सः। वक्त्वानि। ऋतुऽथा। वदाति। यः। ईम्। चिकेतत्। अमृतस्य। गोपाः। अवः। चरन्। परः। अन्येन। पश्यन् ॥३॥
ऋग्वेद - मण्डल » 6; सूक्त » 9; मन्त्र » 3
अष्टक » 4; अध्याय » 5; वर्ग » 11; मन्त्र » 3
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अष्टक » 4; अध्याय » 5; वर्ग » 11; मन्त्र » 3
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनरपत्यविषमाह ॥
अन्वयः
हे मनुष्या ! योऽमृतस्य गोपा अन्येन पश्यन्नवः परश्चरन्नीं चिकेतत्स इत्तन्तुं स ओतुं वि जानाति स ऋतुथा वक्त्वानि वदाति ॥३॥
पदार्थः
(सः) (इत्) एव (तन्तुम्) कारणम् (सः) (वि) (जानाति) (ओतुम्) रक्षकम् (सः) (वक्त्वानि) वक्तव्यानि (ऋतुथा) ऋतुष्विव (वदाति) वदेत् (यः) (ईम्) उदकमिव शुक्रम् (चिकेतत्) विजानाति (अमृतस्य) नित्यस्य पदार्थस्य (गोपाः) रक्षकः (अवः) अधस्तात् (चरन्) (परः) उपरिष्ठो द्वितीयः (अन्येन) (पश्यन्) समीक्षमाणः ॥३॥
भावार्थः
ये ब्रह्मचर्य्येणाप्तेभ्यो विद्याशिक्षे प्राप्नुवन्ति त एवास्य जगतः पूर्णं कारणं ज्ञातुं ज्ञापयितुञ्च शक्नुवन्ति ॥३॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर अपत्य विषय को कहते हैं ॥
पदार्थ
हे मनुष्यो ! (यः) जो (अमृतस्य) नित्य पदार्थ का (गोपाः) रक्षक (अन्येन) अन्य से (पश्यन्) देखता हुआ (अवः) नीचे (परः) ऊपर स्थित दूसरा (चरन्) चलाता हुआ (ईम्) जल के सदृश शुक्र को (चिकेतत्) जानता है (सः, इत्) वही (तन्तुम्) कारण को (सः) वह (ओतुम्) रक्षक को (वि, जानाति) विशेष करके जानता है (सः) वह (ऋतुथा) जैसे काल-काल में, वैसे (वक्त्वानि) कथन करने योग्यों को (वदाति) कहे ॥३॥
भावार्थ
जो ब्रह्मचर्य्य के द्वारा यथार्थवक्ताओं से विद्या और शिक्षा को प्राप्त होते हैं, वे ही इस जगत् के पूर्ण कारण के पूर्ण कारण को जानने को समर्थ होते हैं ॥३॥
विषय
यज्ञपक्ष में ब्रह्मवाद के पक्षों का स्पष्टीकरण ।
भावार्थ
( सः इत् ) वह ही ( तन्तुं ) तन्तु को जानता है और ( सः ओतुं विजानाति ) वही 'ओतु' अर्थात् बरनी को भी जानता है, ( सः ) वह ही ( ऋतुथा ) समय २ पर और प्रति ज्ञानयोग्य काल में ( वक्त्वानि ) उपदेश करने योग्य वचनों का भी ( ददाति ) उपदेश करता । ( यः गोपाः ) जो सबका रक्षक, ( परः ) सबसे उत्कृष्ट होकर ( अन्येन ) दूसरे के द्वारा ( अमृतस्य पश्यन् ) अविनाशी आत्मा का साक्षात् करता हुआ, उसको देखता हुआ भी (अवः चरन्) इस लोक में व्यापता हुआ ( ईं चिकेतत् ) इस रहस्य को जान लेता है । अर्थात् जो विद्वान् अपने से 'अन्य' गुरु द्वारा ( अवः ) इसके अधीन रहता हुआ ज्ञान का साक्षात् करले, वही उस अमृत अविनाशी तत्व का ज्ञान करता है, वह साधन, साध्य आदि भी जानता है। वही समय २ पर उपदेश भी करता है ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः ॥ वैश्वानरो देवता ॥ छन्दः – १ विराट् त्रिष्टुप् । ५ निचृत्त्रिष्टुप् । ६ त्रिष्टुप् । २ भुरिक् पंक्ति: । ३, ४ पंक्ति: । ७ भुरिग्जगती ॥ सप्तर्चं सूक्तम् ॥
विषय
प्रभु ही ज्ञानी हैं
पदार्थ
[१] (सः इत्) = वे प्रभु ही (तन्तुम्) = यज्ञ-वस्त्र के (तन्तु) = स्थानीय गायत्र्यादि छन्दों को (विजानाति) = जानते हैं और (सः) = वे ही (ओतुम्) = तिरश्चीन सूत्र - भूत यजुओं को जानते हैं। (सः) = वे प्रभु ही (ऋजुथा) = समय के अनुसार (वक्त्वनि) = वक्तव्य कर्त्तव्य कर्मों का (वदाति) = उपदेश करते हैं । [२] (यः) = जो (ईम्) = निश्चय से (चिकेतत्) = जानता है, वह सर्वज्ञ 'वैश्वानर' प्रभु ही (अमृतस्य गोपाः) = अमृतत्व के, मोक्षलोक के रक्षक हैं। (परः) = पर होते हुए वे प्रभु (अवः चरन्) = यहाँ अवस्तात् निचले भूलोक में विचरते हैं। सर्वज्ञ उस प्रभु की सत्ता है। (अन्येन) = अपने से अन्य इस जीव के हेतु से (पश्यन्) = वे इन सब लोक-लोकान्तरों को देखते हैं, इनका ध्यान करते हैं ।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु ही पूर्ण ज्ञानी हैं, वे ही हमें कर्त्तव्य कर्मों का उपदेश देते हैं। वे हमारे लिये इन लोक-लोकान्तरों का ध्यान करते हैं ।
मराठी (1)
भावार्थ
जे ब्रह्मचर्याद्वारे विद्वानांकडून विद्या व शिक्षण घेतात तेच जगाचे कारण जाणण्यास समर्थ असतात. ॥ ३ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
He surely knows the warp, he knows the woof, he speaks of what ought to be spoken according to the season and the circumstances, he who knows the flow of the stream of life and time, who is the master and keeper of the eternals, and eternal knowledge, who knows and moves up and down, far and near, seeing the reality by the eye of the other, the supreme lord of eternal light.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
Something about the son is more is told.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O men! he understands the warp and woof or the origin and the Protector of the world, who being the the Protector of the Immortal soul goes up and below i.e. every where. He sees with another eye of wisdom and knows or preserves the semen (i. e. Observes Brahmacharya. Ed.). He speaks at proper time the right thing.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
Those persons only are able to know and tell others about the origin of this materials. Ed world, who receive true knowledge and education from the absolutely truthful enlightened persons with Brahmacharya (continence).
Foot Notes
(तन्तुम्) कारणम्। = Cause, origin. (ओतुम्) रक्षकम् । (ओतुम्) अव-रक्षणादिषु (भ्वा०) = Protector. (ईम्). उदकम् इव शुक्रम् । ईम् इति उदकनाम (NG 1, 12 ) अत्र वीर्यार्थे | = Semen like water.
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