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ऋग्वेद मण्डल - 7 के सूक्त 96 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 7/ सूक्त 96/ मन्त्र 2
    ऋषिः - वसिष्ठः देवता - सरस्वती छन्दः - भुरिगार्षी स्वरः - मध्यमः

    उ॒भे यत्ते॑ महि॒ना शु॑भ्रे॒ अन्ध॑सी अधिक्षि॒यन्ति॑ पू॒रव॑: । सा नो॑ बोध्यवि॒त्री म॒रुत्स॑खा॒ चोद॒ राधो॑ म॒घोना॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    उ॒भे इति॑ । यत् । ते॒ । म॒हि॒ना । शु॒भ्रे॒ । अन्ध॑सी॒ इति॑ । अ॒धि॒ऽक्षि॒यन्ति॑ । पू॒रवः॑ । सा । नः॒ । बो॒धि॒ । अ॒वि॒त्री । म॒रुत्ऽस॑खा । चोद॑ । राधः॑ । म॒घोना॑म् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    उभे यत्ते महिना शुभ्रे अन्धसी अधिक्षियन्ति पूरव: । सा नो बोध्यवित्री मरुत्सखा चोद राधो मघोनाम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    उभे इति । यत् । ते । महिना । शुभ्रे । अन्धसी इति । अधिऽक्षियन्ति । पूरवः । सा । नः । बोधि । अवित्री । मरुत्ऽसखा । चोद । राधः । मघोनाम् ॥ ७.९६.२

    ऋग्वेद - मण्डल » 7; सूक्त » 96; मन्त्र » 2
    अष्टक » 5; अध्याय » 6; वर्ग » 20; मन्त्र » 2
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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (शुभ्रे) हे शुद्धे ! (पूरवः) मनुष्याः त्वत्तः (उभे) द्वे फले लभन्ते (यत्, ते) ये फले ते (अन्धसी) दिव्ये स्तः अभ्युदयनिःश्रेयाख्ये च (सा) सा ब्रह्मविद्या (नः) अस्माकं (बोध्यवित्री) बोधनकर्त्री भवति (मघोनाम्) ऐश्वर्याणां सर्वोपरि (राधः) यद्धनमस्ति, हे विद्ये ! (चोद) तन्मह्यं प्रयच्छ। (मरुत्सखा) त्वं ज्ञानाधारोऽसि (महिना, अधिक्षियन्ति) तव महिम्ना तत्र ज्ञाने ते भक्ता निवसन्ति ॥२॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (शुभ्रे) हे पवित्र स्वभाववाली विद्ये ! (पूरवः) मनुष्य लोग तुम से (उभे) दो प्रकार के फल लाभ करते हैं, (यत्ते) तुम्हारे वे दोनों (अन्धसी) दिव्य हैं अर्थात् एक अभ्युदय और दूसरा निःश्रेयस, (सा) वह ब्रह्मविद्या (नः) हमारी (बोध्यवित्री) बोधन करनेवाली है, (मघोनां) ऐश्वर्य्य में से सर्वोपरि ऐश्वर्य्य (राधः) जो धनरूप है, हे विद्ये ! तू वह (चोद) हमको दे ॥२॥

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    विषय

    वेदवाणी सरस्वती का वर्णन ।

    भावार्थ

    ( यत् ) जिस ( ते ) तेरे ( महिना ) महान् सामर्थ्य से ( पूरवः ) मनुष्य गण ( उभे ) दोनों को (अधि क्षियन्ति) प्राप्त करते हैं हे (शुभ्रे) अति उज्ज्वल स्वरूप वाली सरस्वति ! परमेश्वरि ! ज्ञानमयि ! (सा) वह तू ( मरुत्सखा ) विद्वानों की मित्र ( अवित्री ) समस्त संसार की रक्षा करने वाली वा स्नेहमयी होकर ( नः बोधि ) हमें ज्ञान दे और ( मघोनां ) ऐश्वर्यवान् जनों को ( राधः चोद ) धनादि प्रदान कर।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वसिष्ठ ऋषिः॥ १—३ सरस्वती। ४—६ सरस्वान् देवता॥ छन्द:—१ आर्ची भुरिग् बृहती। ३ निचृत् पंक्तिः। ४, ५ निचृद्गायत्री। ६ आर्षी गायत्री॥

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    विषय

    वेद स्वाध्याय

    पदार्थ

    पदार्थ- (यत्) = जिस (ते) = तेरे (महिना) = सामर्थ्य से (पूरवः) = मनुष्य (उभे) = दोनों को (अधि क्षियन्ति) = प्राप्त करते हैं हे (शुभ्रे) = उज्ज्वल रूपवाली सरस्वति ! ज्ञानमयी ! (सा) = वह तू (मरुत्सखा) = विद्वानों की मित्र (अवित्री) = संसार की रक्षक होकर (नः बोधि) = हमें ज्ञान दे और (मघोनां) = ऐश्वर्यवान् जनों को (राधः चोद) = धनादि दे।

    भावार्थ

    भावार्थ- वेदवाणी के स्वाध्याय से मनुष्य विद्वानों के संसर्ग में आकर ज्ञान तथा ऐश्वर्य को प्राप्त करे। ज्ञान प्राप्त करके ईश्वर की प्राप्ति भी करे।

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O divine stream of crystalline power and purity, by the grandeur of your light of knowledge devoted celebrants of all time receive both material nourishment and spiritual enlightenment, and thereby achieve both worldly honour and ultimate freedom. O saving spirit, protective mother, companion of the vibrations of divinity, awaken us and inspire in us the power and potential of eternal wealth and grandeur implicit in us and raise it to realisation and perfection.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    ब्रह्मविद्येने माणसांना अभ्युदय व नि:श्रेयस ही दोन फळे प्राप्त होतात. या मंत्राद्वारे प्रार्थना केलेली आहे, की बोधन करणाऱ्या ब्रह्मविद्येने आम्हाला संपूर्ण धनरूप ऐश्वर्य प्रदान करावे. ॥२॥

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