Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 7 के सूक्त 96 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 7/ सूक्त 96/ मन्त्र 4
    ऋषिः - वसिष्ठः देवता - सरस्वान् छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    ज॒नी॒यन्तो॒ न्वग्र॑वः पुत्री॒यन्त॑: सु॒दान॑वः । सर॑स्वन्तं हवामहे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ज॒नी॒यन्तः॑ । नु । अग्र॑वः । पु॒त्रि॒ऽयन्तः॑ । सु॒ऽदान॑वः । सर॑स्वन्तम् । ह॒वा॒म॒हे॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    जनीयन्तो न्वग्रवः पुत्रीयन्त: सुदानवः । सरस्वन्तं हवामहे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    जनीयन्तः । नु । अग्रवः । पुत्रिऽयन्तः । सुऽदानवः । सरस्वन्तम् । हवामहे ॥ ७.९६.४

    ऋग्वेद - मण्डल » 7; सूक्त » 96; मन्त्र » 4
    अष्टक » 5; अध्याय » 6; वर्ग » 20; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ उक्तब्रह्मविद्याफलरूपं ज्ञानं स्तूयते।

    पदार्थः

    (जनीयन्तः) शुभं कुटुम्बमिच्छन्तः (पुत्रीयन्तः) शुभसन्तानमिच्छन्तः (अग्रवः) ब्रह्मपदमिच्छन्तः (सुदानवः) सुदातारः वयम् (नु) अद्य (सरस्वन्तम्) सरस्वतीसुतं ज्ञानम् (हवामहे) आह्वयामः ॥४॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    हिन्दी (3)

    विषय

    अब उक्त विद्या के फलरूप ज्ञान का कथन करते हैं।

    पदार्थ

    (जनीयन्तः) शुभ सन्तान की इच्छा करते हुये (पुत्रीयन्तः) पुत्रवाले होने की इच्छा करते हुए (सुदानवः) दानी लोग (अग्रवः) ब्रह्म की समीपता चाहनेवाले (नु) आज (सरस्वन्तम्) सरस्वती के पुत्ररूपी ज्ञान को (हवामहे) आवाहन करते हैं ॥४॥

    भावार्थ

    परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे पुरुषो ! तुम ब्रह्मज्ञान का आवाहन करो, जो विद्यारूपी सरस्वती माता से उत्पन्न होता है और सम्पूर्ण प्रकार के अनिष्टों को दूर करनेवाला है, परन्तु उसके पात्र वे पुरुष बनते हैं, जो उदारता के भाव और वेदरूपी विद्या के अधिकारी हों, अर्थात् जिनके मल-विक्षेपादि दोष सब दूर हो गये हों और यम-नियमादि सम्पन्न हों, वे ही ब्रह्मज्ञान के अधिकारी होते हैं, अन्य नहीं, या यों कहो कि जो अङ्ग और उपाङ्गों के साथ वेद का अध्ययन करते और यम-नियमादिसम्पन्न होते हैं ॥४॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    ज्ञानवान् प्रभु सरस्वान् से प्रार्थना ।

    भावार्थ

    हम लोग ( जनीयन्तः ) भार्या रूप उत्तम संतति जनक क्षेत्र की कामना करने वाले, ( पुत्रीयन्तः ) पुत्रों की कामना करने वाले, ( अग्रवः नु ) आगे बढ़ने वाले और ( सु-दानवः ) उत्तम दानशील पुरुष ( सरस्वन्तं ) उत्तम ज्ञानवान् प्रभु को ( हवामहे ) प्राप्त होते, पुकारते और उसी से याचना करते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वसिष्ठ ऋषिः॥ १—३ सरस्वती। ४—६ सरस्वान् देवता॥ छन्द:—१ आर्ची भुरिग् बृहती। ३ निचृत् पंक्तिः। ४, ५ निचृद्गायत्री। ६ आर्षी गायत्री॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    ईश्वर से याचना

    पदार्थ

    पदार्थ- हम लोग (जनीयन्तः) = भार्या रूप संतति जनक क्षेत्र की कामनावाले, (पुत्रीयन्तः) = पुत्रों की कामनावाले, (अग्रवः नु) = आगे बढ़नेवाले और (सु-दानव:) = उत्तम दानशील पुरुष (सरस्वन्तं) = उत्तम ज्ञानवान् प्रभु को (हवामहे) = प्राप्त होते, पुकारते, उसी से याचना करते हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ- मनुष्य लोग ईश्वर को पुकारते हुए उत्तम ज्ञान द्वारा श्रेष्ठ गुणवाली पत्नी व उत्तम सन्तान की प्राप्ति करें। इस प्रकार उत्तम ऐश्वर्य को पाकर दानशील वृत्ति रखें।

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Wishing for marriage, or looking forward to good progeny, liberally giving in charity, or meditating to realise the light of divinity, we pray for the living flow of the waters of Sarasvati, radiating light of divinity, the eternal ocean whence flow the light and the waters of life.

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    परमात्मा उपदेश करतो, की हे पुरुषांनो! तुम्ही ब्रह्मज्ञानाचे आव्हान करा. ते विद्यारूपी सरस्वती मातेपासून उत्पन्न होते व संपूर्ण अनिष्टांना दूर करणारे असते; परंतु जे उदारभाव व वेदरूपी विद्येचे अधिकारी असतात ते त्याचे पात्र बनतात. अर्थात, ज्यांचे मल, विक्षेप इत्यादी दोष दूर झालेले आहेत व यम नियम इत्यादींनी संपन्न झालेले आहेत, तेच ब्रह्मज्ञानाचे अधिकारी असतात. इतर नाही किंवा असे म्हणता येईल, की जे अंग व उपांगासह वेदाचे अध्ययन करतात ते यम नियम इत्यादींनी संपन्न होतात. ॥४॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top