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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 103 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 103/ मन्त्र 4
    ऋषिः - द्वितः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - पादनिचृदुष्णिक् स्वरः - ऋषभः

    परि॑ णे॒ता म॑ती॒नां वि॒श्वदे॑वो॒ अदा॑भ्यः । सोम॑: पुना॒नश्च॒म्वो॑र्विश॒द्धरि॑: ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    परि॑ । ने॒ता । म॒ती॒नाम् । वि॒श्वऽदे॑वः । अदा॑भ्यः । सोमः॑ । पु॒ना॒नः । च॒म्वोः॑ । वि॒श॒त् । हरिः॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    परि णेता मतीनां विश्वदेवो अदाभ्यः । सोम: पुनानश्चम्वोर्विशद्धरि: ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    परि । नेता । मतीनाम् । विश्वऽदेवः । अदाभ्यः । सोमः । पुनानः । चम्वोः । विशत् । हरिः ॥ ९.१०३.४

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 103; मन्त्र » 4
    अष्टक » 7; अध्याय » 5; वर्ग » 6; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (विश्वदेवः)  अखिलविश्वप्रकाशकः  (अदाभ्यः)  अनभिभाव्यः परमात्मा  (मतीनां,  नेता)  सर्वेषां  बुद्धेर्नेतास्ति  (सोमः) सर्वोत्पादकः (हरिः) परमात्मा (चम्वोः) जीवप्रकृत्योः (परिविशत्)प्रविशति ॥४॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (विश्वदेवः) जो सम्पूर्ण विश्व का प्रकाशक परमात्मा है, (अदाभ्यः) किसी से तिरस्कृत नहीं हो सकता किन्तु सर्वोपरि होकर विराजमान है, (हरिः) परमात्मा (चम्वोः) जीव और प्रकृतिरूपी दोनों प्रकृतियों में (परिविशत्) प्रवेश करता है ॥४॥

    भावार्थ

    परमात्मा शुभ बुद्धियों का प्रदान करनेवाला है ॥४॥

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    विषय

    सर्वव्यापक, सर्वेश्वर, सर्वनेता, सर्वदुःखहारी है।

    भावार्थ

    वह (विश्वदेवः) सब सुखों का देने वाला, सब लोकों का प्रकाशक, सब का उपास्य देव, (अदाभ्यः) अविनाशी (सोमः) सर्व जगत् का उत्पादक, सर्वैश्वर्यवान् (मतीनां नेता) सब स्तुतियों बुद्धियों और विद्वानों का नायक, प्रवर्त्तक, (हरिः) सर्वदुःखहारी प्रभु (पुनानः) व्यापता हुआ (चम्वोः परि विशत्) भूलोक और धौलोक दोनों को व्यापता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    द्वित आप्त्य ऋषिः॥ पवमानः सोमो देवता॥ छन्दः- १ ३ उष्णिक्। २, ५ निचृदुष्णिक्। ४ पादनिचृदुष्णिक्। ६ विराडुष्णिक्॥ षडृचं सूक्तम्॥

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    विषय

    बुद्धि - दिव्यगुम व नीरोगता

    पदार्थ

    यह सोम (मतीनां परिणेता) = बुद्धियों का हमें सब प्रकार से प्राप्त करानेवाला है। (विश्वदेवः) = सब दिव्य गुणों वाला है और (अदाभ्यः) = रोग आदि से हिंसित होनेवाला नहीं। सुरक्षित सोम बुद्धि को बढ़ाता है, दिव्य गुणों का उपजाता है और शरीर को नीरोग बनाता है। यह (सोमः) = सोम [वीर्य] (पुनानः) = पवित्र किया जाता हुआ (चम्वोः) = द्यावापृथिवी में, मस्तिष्क व शरीर में (विशत्) = प्रवेश करता है शरीर को सशक्त व मस्तिष्क को ज्ञानदीप्त बनाता हुआ यह (हरिः) = सब शारीर व मानस दुःखों का हरण करनेवाला होता है।

    भावार्थ

    भावार्थ- सुरक्षित सोम बुद्धि को तीव्र, मन को दिव्य, शरीर को नीरोग बनाता है ।

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Soma, guiding spirit of the mind and soul, self- refulgent soul of the universe, undaunted and invincible, pure and purifying, pervading the heaven and earth, manifests inspiring in the mind and soul of meditative celebrants, eliminating their darkness and sufferance.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    परमेश्वर शुद्ध बुद्धीचे प्रदान करणारा आहे. ॥४॥

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