ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 18/ मन्त्र 4
ऋषिः - असितः काश्यपो देवलो वा
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - निचृद्गायत्री
स्वरः - षड्जः
आ यो विश्वा॑नि॒ वार्या॒ वसू॑नि॒ हस्त॑योर्द॒धे । मदे॑षु सर्व॒धा अ॑सि ॥
स्वर सहित पद पाठआ । यः । विश्वा॑नि । वार्या॑ । वसू॑नि । हस्त॑योः । द॒धे । मदे॑षु । स॒र्व॒ऽधाः । अ॒सि॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
आ यो विश्वानि वार्या वसूनि हस्तयोर्दधे । मदेषु सर्वधा असि ॥
स्वर रहित पद पाठआ । यः । विश्वानि । वार्या । वसूनि । हस्तयोः । दधे । मदेषु । सर्वऽधाः । असि ॥ ९.१८.४
ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 18; मन्त्र » 4
अष्टक » 6; अध्याय » 8; वर्ग » 8; मन्त्र » 4
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अष्टक » 6; अध्याय » 8; वर्ग » 8; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
(यः) यः परमात्मा (विश्वानि) सर्वाणि (वार्या) प्रार्थनीयानि (वसूनि) धनरत्नादीनि (हस्तयोः आदधे) विज्ञानिनां हस्तगतानि करोति स एव (मदेषु) सर्वहर्षयुक्तवस्तुषु (सर्वधाः) सर्वविधशोभानां धारकः (असि) अस्ति ॥४॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(यः) जो परमात्मा (विश्वानि) सब (वार्या) ‘वरितुं योग्यानि वार्याणि’ प्रार्थनीय (वसूनि) धन रत्नादिकों को (हस्तयोः आदधे) विज्ञानी लोगों के हस्तगत कर देता है, वही (मदेषु) सब हर्षयुक्त वस्तुओं में (सर्वधाः) सब प्रकार की शोभा को धारण करानेवाला (असि) है ॥४॥
भावार्थ
जो सम्पूर्ण वस्तुओं को अपने हस्तगत करना चाहते हो, तो ईश्वर के उपासक बनो ॥४॥
विषय
'वसुप्रापक' सोम
पदार्थ
[१] हे सोम ! तू वह है (यः) = जो (विश्वानि) = सब वार्यावरणीय, चाहने योग्य (वसूनि) = वसुओं को निवास के लिये आवश्यक तत्त्वों को (हस्तयोः) = हाथों में (आ दधे) = धारण करता है। इस सोम के धारण से हमें सब वसुओं की प्राप्ति होती है । [२] हे सोम ! तू (मदेषु) = उल्लासों के होने पर (सर्वधाः असि) = सबका धारण करनेवाला है। 'शरीर, मन, मस्तिष्क' सभी को तू उत्तम बनाता है ।
भावार्थ
भावार्थ- सुरक्षित सोम सब वसुओं को प्राप्त करानेवाला है।
विषय
सब ऐश्वर्यो का स्वामी।
भावार्थ
(यः) जो परमेश्वर (हस्तयोः) अपने हाथों में, अपने वश में (विश्वानि वार्या दधे) समस्त ऐश्वर्यो को रक्खे हुए है, वही तू (मदेषु सर्वधाः असि) आनन्दप्रद सुखों और ऐश्वर्यों में सब को धारण करता और सर्व-विधाता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
असितः काश्यपो देवलो वा ऋषिः। पवमानः सोमो देवता॥ छन्दः– १, ४ निचृद् गायत्री। २ ककुम्मती गायत्री। ३, ५, ६ गायत्री। ७ विराड् गायत्री॥ सप्तर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (1)
Meaning
You who hold in hands the entire wealth of the world, we cherish, you who are the sole sustainer and dispenser for all in bliss divine.
मराठी (1)
भावार्थ
जर संपूर्ण वस्तू आपल्याजवळ बाळगाव्या अशी इच्छा असेल तर ईश्वराचे उपासक बना ॥४॥
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