ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 18/ मन्त्र 6
ऋषिः - असितः काश्यपो देवलो वा
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
परि॒ यो रोद॑सी उ॒भे स॒द्यो वाजे॑भि॒रर्ष॑ति । मदे॑षु सर्व॒धा अ॑सि ॥
स्वर सहित पद पाठपरि॑ । यः । रोद॑सी॒ इति॑ । उ॒भे इति॑ । स॒द्यः । वाजे॑भिः । अर्ष॑ति । मदे॑षु । स॒र्व॒ऽधाः । अ॒सि॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
परि यो रोदसी उभे सद्यो वाजेभिरर्षति । मदेषु सर्वधा असि ॥
स्वर रहित पद पाठपरि । यः । रोदसी इति । उभे इति । सद्यः । वाजेभिः । अर्षति । मदेषु । सर्वऽधाः । असि ॥ ९.१८.६
ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 18; मन्त्र » 6
अष्टक » 6; अध्याय » 8; वर्ग » 8; मन्त्र » 6
Acknowledgment
अष्टक » 6; अध्याय » 8; वर्ग » 8; मन्त्र » 6
Acknowledgment
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
(य) यः परमात्मा (उभे रोदसी) उभयोरपि द्यावापृथिव्योर्मध्ये (वाजेभिः पर्यर्षति) सहैश्वर्येण व्याप्नोति स एव (मदेषु) सर्वहर्षयुक्तद्रव्येषु सर्वविधशोभानां धारकः (असि) अस्ति ॥६॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(यः) जो परमात्मा (उभे रोदसी) पृथिवी और आकाश इन दोनों लोकों में (वाजेभिः पर्यर्षति) ऐश्वर्यों के सहित व्याप्त है, वही (मदेषु) सब हर्षयुक्त वस्तुओं में (सर्वधाः) सब प्रकार की शोभा को धारण करानेवाला (असि) है ॥६॥
भावार्थ
यद्यपि परमात्मा के ऐश्वर्य से कोई स्थान भी खाली नहीं, तथापि प्राकृत ऐश्वर्यों का स्थान जैसा द्युलोक और पृथिवीलोक है, ऐसा अन्य नहीं, इसी भाव से इन दोनों का वर्णन विशेष रीति से किया है ॥६॥
विषय
शक्ति सम्पन्न मस्तिष्क व शरीर
पदार्थ
[१] यह सोम वह है (यः) = जो (सद्यः) = शीघ्र ही उभे रोदसी इन दोनों द्यावापृथिवी को, मस्तिष्क व शरीर को (वाजेभिः) = शक्तियों के साथ (परि अर्षति) = समन्तात् प्राप्त होता है । सोम के द्वारा मस्तिष्क भी शक्ति सम्पन्न बनता है, शरीर भी । शक्ति सम्पन्न मस्तिष्क ज्ञान से दीप्त हो उठता है और शक्ति सम्पन्न शरीर तेजस्विता से चमक आता है। [२] हे सोम ! तू (मदेषु) = उल्लासों के होने पर (सर्वधाः असि) = सबका धारण करनेवाला है।
भावार्थ
भावार्थ- सुरक्षित सोम मस्तिष्क व शरीर दोनों को शक्ति सम्पन्न बनाता है ।
विषय
सर्वोपदेष्टा।
भावार्थ
(यः) जो (उभे रोदसी परि) दोनों लोकों में (वाजेभिः) अपने नाना ऐश्वर्यों सहित (परि अर्पति) सर्वत्र व्याप्त है, हे प्रभो ! वह तू (मदेषु) आनन्ददायक सब ऐश्वर्यों में (सर्वधाः) सब को धारण करने हारा (असि) है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
असितः काश्यपो देवलो वा ऋषिः। पवमानः सोमो देवता॥ छन्दः– १, ४ निचृद् गायत्री। २ ककुम्मती गायत्री। ३, ५, ६ गायत्री। ७ विराड् गायत्री॥ सप्तर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (1)
Meaning
You who always pervade the dynamics of both heaven and earth with food, energy and the spirit of evolution, are the sustainer and dispenser for all in bliss divine.
मराठी (1)
भावार्थ
जरी परमात्म्याच्या ऐश्वर्याशिवाय कोणतेही स्थान रिकामे नाही, तरी प्राकृत ऐश्वर्याचे स्थान असे द्युलोक व पृथ्वीलोक आहे असे दुसरे नाही. याच भावाने या दोन्हीचे वर्णन विशेषरूपाने केलेले आहे. ॥६॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
N/A
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
N/A
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
Shri Virendra Agarwal
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal