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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 18 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 18/ मन्त्र 5
    ऋषिः - असितः काश्यपो देवलो वा देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    य इ॒मे रोद॑सी म॒ही सं मा॒तरे॑व॒ दोह॑ते । मदे॑षु सर्व॒धा अ॑सि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यः । इ॒मे इति॑ । रोद॑सी॒ इति॑ । म॒ही इति॑ । सम् । मा॒तरा॑ऽइव । दोह॑ते । मदे॑षु । स॒र्व॒ऽधाः । अ॒सि॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    य इमे रोदसी मही सं मातरेव दोहते । मदेषु सर्वधा असि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यः । इमे इति । रोदसी इति । मही इति । सम् । मातराऽइव । दोहते । मदेषु । सर्वऽधाः । असि ॥ ९.१८.५

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 18; मन्त्र » 5
    अष्टक » 6; अध्याय » 8; वर्ग » 8; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (यः) यः परमात्मा (मातरा इव) जीवानां मातेव (इमे मही रोदसी) आभ्यां महद्भ्यां द्युलोकपृथिवीलोकाभ्यां (सम् दोहते) पय इव नानाविधधनरत्नानि दोग्धि स एव (मदेषु) हर्षयुक्तसर्ववस्तुषु (सर्वधाः) सर्वविधशोभानां धारकः (असि) अस्ति ॥५॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (यः) जो परमेश्वर (मातरा इव) जीवों की माता के समान (इमे मही रोदसी) इस महान् आकाश और पृथिवीलोक से (सम् दोहते) दूध के समान नाना प्रकार के धन रत्नादिकों को दुहता है (मदेषु) वही परमात्मा हर्षयुक्त वस्तुओं में (सर्वधाः) सब प्रकार की शोभा को धारण करानेवाला (असि) है ॥५॥

    भावार्थ

    माता शब्द यहाँ उपलक्षणमात्र है, वास्तव में भाव यह है कि जीवों की माता-पिता के समान जो पृथिवीलोक और द्युलोक हैं, इनसे नानाविध भोग पैदा करनेवाला एकमात्र परमात्मा ही है, कोई अन्य नहीं ॥५॥

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    विषय

    माता-पिता का पूरक पुत्र

    पदार्थ

    [१] सोम वह है (यः) = जो (इमे) = इन (मही रोदसी) = महत्त्वपूर्ण द्यावापृथिवी को (मातरा इव) = माता-पिता के समान (संदोहते) = सम्यक् प्रपूरित करता है। जैसे एक पुत्र माता-पिता की पूर्ति करनेवाला होता है [अथ यदैव जायां विन्दते उत प्रजायते, तर्हि हि सर्वो भवति श० ५। २ । १ । १० ] पति जाया को प्राप्त करके, सन्तान को जन्म देने पर पूर्ण होता है । एवं सन्तान माता-पिता को मानो पूर्णता प्राप्त कराता है, इसी प्रकार यह सोम मस्तिष्क व शरीर रूप [ द्यावापृथिवी] पिता- माता को पूर्णता प्राप्त करानेवाला होता है। [२] सुरक्षित होने पर (मदेषु) = उल्लासों की वर्तमानता में, हे सोम ! तू (सर्वधाः असि) = 'शरीर, मन व बुद्धि' सभी का धारण करनेवाला है ।

    भावार्थ

    भावार्थ- सुरक्षित सोम मस्तिष्क व शरीर की न्यूनताओं को दूर करता है।

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    विषय

    माता पितावत् प्रभु।

    भावार्थ

    (मातरा इव) जिस प्रकार एक ही पुत्र दो माताओं वा माता पिता दोनों को (दोहते) सुख प्रदान करता, दोनों से दुग्धपान करता, दोनों की गोद पूरता है, उसी प्रकार (यः) जो परमेश्वर (इमे मही रोदसी दोहते) इन दोनों आकाश और भूमि को नाना रसों, जलों से पूर्ण करता है, वही तू प्रभु (मदेषु) तृप्तिकारक अन्नों और जलों के ऊपर (सर्वधाः असि) सब प्राणियों को पोषण करने में समर्थ है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    असितः काश्यपो देवलो वा ऋषिः। पवमानः सोमो देवता॥ छन्दः– १, ४ निचृद् गायत्री। २ ककुम्मती गायत्री। ३, ५, ६ गायत्री। ७ विराड् गायत्री॥ सप्तर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    You who fill these great mother-like heaven and earth with the wealth of food and drink and obtain for us all nourishments from these are the sustainer and provider for all in bliss divine.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    माता शब्द येथे उपलक्षणात्मक आहे. वास्तविक भाव हा आहे की जीवांच्या माता-पित्याप्रमाणे जे पृथ्वीलोक व द्युलोक आहेत यापासून नाना प्रकार उत्पन्न करणारा एकमेव परमात्मा आहे. दुसरा कुणी नाही. ॥५॥

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