ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 83 के मन्त्र
1 2 3 4 5

मन्त्र चुनें

  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 83/ मन्त्र 1
    ऋषि: - पवित्रः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - निचृज्जगती स्वरः - निषादः
    पदार्थ -

    (ब्रह्मणस्पते) हे वेदों के पति परमात्मन् ! (ते) तुम्हारा स्वरूप (पवित्रं) पवित्र है और (विततं) विस्तृत है। (प्रभुः) आप सबके स्वामी हैं और (विश्वतः, गात्राणि) सब मूर्त पदार्थों के (पर्येषि) चारों ओर व्यापक हैं। (अतप्ततनूः) जिसने अपने शरीर से तप नहीं किया, (तदामः) वह पुरुष कच्चा है। वह तुम्हारे आनन्द को (न, अश्नुते) नहीं भोग सकता। (शृतास इत्) अनुष्ठानी पुरुष ही (वहन्तः) तुमको प्राप्त हो सकते हैं। वे (तत्) तुम्हारे आनन्द को (समाशत) भोग सकते हैं ॥१॥

    भावार्थ -

    इस मन्त्र में तप का वर्णन स्पष्ट रीति से किया गया है। जो लोग तपस्वी हैं, वे ही परमात्मा को प्राप्त हो सकते हैं, अन्य नहीं। यहाँ शरीर का तप एक उपलक्षणमात्र है। वास्तव में आध्यात्मिकादि सब प्रकार के तपों का यहाँ ग्रहण है ॥१॥

    पदार्थ -

    (ब्रह्मणस्पते) हे वेदपते परमात्मन् ! (ते) तावकं स्वरूपं (पवित्रम्) पूतमस्ति। अथ च (विततम्) विस्तृतमपि वर्तते। भवान् (प्रभुः) सर्वेषां स्वामी। तथा (विश्वतः, गात्राणि) सकलमूर्तपदार्थानां (पर्येषि) परितो व्यापकोऽस्ति। अथ च (अतप्ततनूः) यो हि तपो रहितोऽसि (तदामः) स अपरिपक्वबुद्धिस्तवानन्दं (नाश्नुते) न भोक्तुं शक्नोति। (शृतास इत्) तपस्वी जन एव (वहन्तः) त्वां प्राप्स्यन्ति। ते (तत्) भवदानन्दं (समाशत) भोक्ष्यन्ति ॥१॥

    कृपया कम से कम 20 शब्द लिखें!
    Top