ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 88/ मन्त्र 8
राज्ञो॒ नु ते॒ वरु॑णस्य व्र॒तानि॑ बृ॒हद्ग॑भी॒रं तव॑ सोम॒ धाम॑ । शुचि॒ष्ट्वम॑सि प्रि॒यो न मि॒त्रो द॒क्षाय्यो॑ अर्य॒मेवा॑सि सोम ॥
स्वर सहित पद पाठराज्ञः॑ । नु । ते॒ । वरु॑णस्य । व्र॒तानि॑ । बृ॒हत् । ग॒भी॒रम् । तव॑ । सो॒म॒ । धाम॑ । शुचिः॑ । त्वम् । अ॒सि॒ । प्रि॒यः । न । मि॒त्रः । द॒क्षाय्यः॑ । अ॒र्य॒माऽइ॑व । अ॒सि॒ । सो॒म॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
राज्ञो नु ते वरुणस्य व्रतानि बृहद्गभीरं तव सोम धाम । शुचिष्ट्वमसि प्रियो न मित्रो दक्षाय्यो अर्यमेवासि सोम ॥
स्वर रहित पद पाठराज्ञः । नु । ते । वरुणस्य । व्रतानि । बृहत् । गभीरम् । तव । सोम । धाम । शुचिः । त्वम् । असि । प्रियः । न । मित्रः । दक्षाय्यः । अर्यमाऽइव । असि । सोम ॥ ९.८८.८
ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 88; मन्त्र » 8
अष्टक » 7; अध्याय » 3; वर्ग » 24; मन्त्र » 8
Acknowledgment
अष्टक » 7; अध्याय » 3; वर्ग » 24; मन्त्र » 8
Acknowledgment
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
हे परमात्मन् ! (ते, वरुणस्य, राज्ञः) यस्त्वं निजशक्त्यां सर्वेषां वस्तूनां स्थापको राजासि (ते) तव (नु) निश्चयेन (व्रतानि) अहम् आराधनानि दधानि। (सोम) हे परमात्मन् ! (तव धाम) तव स्वरूपाणि (बृहद्गभीरं) अतिगभीराणि सन्ति। अपि च (शुचिः, त्वम्, असि) त्वं नित्यशुद्धादिस्वभावोऽसि। (प्रियः, न) प्रियतुल्योऽसि। (मित्रः, न) सखेवासि। (दक्षाय्यः) मान्योऽसि। (अर्यमा, इवासि, सोम) हे परमात्मन् ! न्यायकारी भवानस्ति ॥८॥ इत्यष्टाशीतितमं सूक्तं चतुर्विंशो वर्गश्च समाप्तः ॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
हे परमात्मन् ! (ते वरुणस्य राज्ञः) तुम सब वस्तुओं को अपनी शक्ति में रखनेवाले श्रेष्ठतम राजा हो। (ते) तुम्हारे (नु) निश्चय करके (व्रतानि) व्रतों को हम धारण करें। (सोम) हे परमात्मन् ! (तव धाम) तुम्हारा स्वरूप (बृहद्गभीरं) बहुत गम्भीर है और (शुचिस्त्वमसि) तुम नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव हो। (प्रियो न) प्रिय के समान हो। (मित्रो न) मित्र के समान हो। (दक्षाय्यः) मान्य हो। (अर्य्यमा, इवासि, सोम) हे सोम परमात्मन् ! आप न्यायकारी हो ॥८॥
भावार्थ
इस मन्त्र में परमात्मा ने व्रतपालन का उपदेश किया। जो पुरुष व्रती होकर परमात्मा के नियम का पालन करता है, वह परमात्मा की आज्ञाओं का पालन करता है ॥८॥ यह ८८ वाँ सूक्त और २४ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
विषय
राजा के अनेक कर्त्तव्य।
भावार्थ
हे (सोम) उत्तम शासक ! वीर्यवन् ! बलवन् ! (ते राज्ञः वरुणस्य) तुझ सर्ववृत श्रेष्ठ तेजस्वी राजा के (व्रतानि) नाना कर्त्तव्य हैं। (तब गभीरम् बृहत् धाम) तेरा तेज, सामर्थ्य बड़ा गम्भीर हो। (शुचिः त्वम् प्रियः मित्रः न असि) शुद्ध चित्त वाला, ईमानदार, प्रिय, स्नेही मित्र के समान विपत्ति से बचाने वाला हो। तू (दक्षाय्यः) बलवान् (अर्यमा इव) न्यायकारी शासकवत् (असि) हो। इति चतुर्विंशो वर्गः॥
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
उशना ऋषिः। पवमानः सोमो देवता॥ छन्दः – १ सतः पंक्ति:। २, ४, ८ विराट् त्रिष्टुप्। ३, ६, ७ निचृत् त्रिष्टुप्। ५ त्रिष्टुप्। अष्टर्चं सूक्तम्॥
विषय
'ज्ञानशक्ति पवित्रता व उन्नति' का साधक सोम
पदार्थ
हे सोम ! (नु) = अब (ते) = तेरे (व्रतानि) = कर्म (राज्ञः वरुणस्य) = राजा वरुण के हैं। वरुण 'प्रचेताः है, तू भी हमें प्रकृष्ट चेतनावाला बनाता है। यह वरुण 'पाशी' है, तू भी हमारे शत्रुओं को जकड़नेवाला है। हे सोम ! (तव धाम) = तेरा तेज (बृहद् गभीरम्) = वृद्धि का कारणभूत व गम्भीर है। सोम की शक्ति शरीर में खूब गहराई तक प्रविष्ट होकर सम्पूर्ण शरीर को स्वस्थ बनाती है । हे सोम! (त्वं) = तू (प्रियः मित्रः न) = प्रिय मित्र के समान (शुचिः असि) = पवित्र है । हमारे जीवन को सोम पवित्र बनाता है, इस प्रकार यह हमारा हितचिंतक मित्र है । हे सोम ! तू (अर्यमा इव) = जितेन्द्रिय पुरुष की तरह (दक्षाय्य:) = [दक्ष to grow] शत्रुओं का हिंसक है और इस प्रकार हमें उन्नत करनेवाला है ।
भावार्थ
भावार्थ- सोम 'ज्ञान- शक्ति - पवित्रता व शत्रु संहार शक्ति' को देनेवाला है । सम्पूर्ण उन्नति का साधक यह सोम ही है। अगला सूक्त भी 'उशना' ऋषि का ही है-
इंग्लिश (1)
Meaning
Bless us, O Soma, that we may observe the rules and laws of your discipline, refulgent ruler and highest justicier. Profound is your presence, infinite your space. Immaculate you are, dear as a friend, unfailing as an expert guide, adorable, all bliss, beauty and pure joy.
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात परमेश्वराने व्रत पालनाचा उपदेश केलेला आहे. जो पुरुष व्रती बनून त्याच्या नियमांचे पालन करतो. तो परमात्म्याच्या आज्ञांचे पालन करतो.
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
N/A
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
N/A
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
Shri Virendra Agarwal
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal