अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 8 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 1/ सूक्त 8/ मन्त्र 1
    ऋषि: - चातनः देवता - बृहस्पतिः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - यातुधाननाशन सूक्त

    इ॒दं ह॒विर्या॑तु॒धाना॑न्न॒दी फेन॑मि॒वा व॑हत्। य इ॒दं स्त्री पुमा॒नक॑रि॒ह स स्तु॑वतां॒ जनः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ॒दम् । ह॒वि: । या॒ऽतुधाना॑न् । न॒दी । फेन॑म्ऽइव । आ । व॒ह॒त् ।य: । इ॒दम् । स्त्री । पुमा॑न् । अक॑: । इ॒ह । स: । स्तु॒व॒ता॒म् । जन॑: ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इदं हविर्यातुधानान्नदी फेनमिवा वहत्। य इदं स्त्री पुमानकरिह स स्तुवतां जनः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इदम् । हवि: । याऽतुधानान् । नदी । फेनम्ऽइव । आ । वहत् ।य: । इदम् । स्त्री । पुमान् । अक: । इह । स: । स्तुवताम् । जन: ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 8; मन्त्र » 1

    पदार्थ -
    (इदम्) यह (हविः) [हमारी] भक्ति (यातुधानान्) राक्षसों को (आवहत्) ले आवे, (इव) जैसे (नदी) नदी (फेनम्) फेन को। (यः) जिस किसी (पुमान्) मनुष्य ने अथवा (स्त्री) स्त्री ने (इदम्) इस [पापकर्म] को (अकः) किया है (सः जनः) वह पुरुष (स्तुवताम्) [तेरी] स्तुति करे ॥१॥

    भावार्थ -
    प्रजा की पुकार सुनकर जब राजा दुष्टों को पकड़ता है, अपराधी स्त्री और पुरुष अपने अपराध को अङ्गीकार कर लेते और उस प्रतापी राजा की स्तुति करते हैं ॥१॥ (स्त्री) शब्द का अर्थ संग्रह करने हारी वा स्तुति योग्य और [पुमान्] का अर्थ रक्षक वा पुरुषार्थी है।

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