अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 9/ मन्त्र 4
ऋषिः - अथर्वा
देवता - अग्निः
छन्दः - त्रिष्टुप्
सूक्तम् - विजय प्रार्थना सूक्त
95
ऐषां॑ य॒ज्ञमु॒त वर्चो॑ ददे॒ऽहं रा॒यस्पोष॑मु॒त चि॒त्तान्य॑ग्ने। स॒पत्ना॑ अ॒स्मदध॑रे भवन्तूत्त॒मं नाक॒मधि॑ रोहये॒मम् ॥
स्वर सहित पद पाठआ । ए॒षा॒म् । य॒ज्ञम् । उ॒त । वर्च॑: । द॒दे॒ । अ॒हम् । रा॒य: । पोष॑म् । उ॒त । चि॒त्तानि॑ । अ॒ग्ने॒ । स॒ऽपत्ना॑: । अ॒स्मत् । अध॑रे । भ॒व॒न्तु॒ । उ॒त्ऽत॒मम् । नाक॑म् । अधि॑ । रो॒ह॒य॒ । इ॒मम् ॥
स्वर रहित मन्त्र
ऐषां यज्ञमुत वर्चो ददेऽहं रायस्पोषमुत चित्तान्यग्ने। सपत्ना अस्मदधरे भवन्तूत्तमं नाकमधि रोहयेमम् ॥
स्वर रहित पद पाठआ । एषाम् । यज्ञम् । उत । वर्च: । ददे । अहम् । राय: । पोषम् । उत । चित्तानि । अग्ने । सऽपत्ना: । अस्मत् । अधरे । भवन्तु । उत्ऽतमम् । नाकम् । अधि । रोहय । इमम् ॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
सब सम्पत्तियों के लिये प्रयत्न का उपदेश।
पदार्थ
(अग्ने) हे परमेश्वर ! (एषाम्) इनके [अपने लोगों] के दिये (यज्ञम्) सत्कार, (उत) और (वर्चः) तेज, (रायः) धन की (पोषम्) बढ़ती (उत) और (चित्तानि) मानसिक बलों को (अहम्) मैं (आददे) ग्रहण करता हूँ। (सपत्नाः) वैरी लोग (अस्मत्) हमसे (अधरे) नीचे (भवन्तु) होवें, (उत्तमम्) अति ऊँचे (नाकम्) सुख में (एनम्) इसको [मुझे] (अधि) ऊपर (रोहय) चढ़ा ॥४॥
भावार्थ
बुद्धिमान् नीतिनिपुण पुरुष अपने पक्षवालों के किये हुए उपकार और सत्कार को सधन्यवाद स्वीकार करे और विपक्षियों को नीचा दिखा कर अपनी प्रतिष्ठा बढ़ावे ॥४॥ इस मन्त्र का उत्तरार्ध मन्त्र २ का उत्तरार्ध है ॥
टिप्पणी
४−एषाम्। स्वपुरुषाणाम्। यज्ञम्। यजयाचयतविच्छप्रच्छरक्षो नङ्। पा० ३।३।९०। इति यज देवार्चादानसङ्गतिकरणेषु-नङ्। पूजाम्, कीर्तिम्। वर्चः। सर्वधातुभ्योऽसुन्। उ० ४।१८९। इति वर्च दीप्तौ−असुन्। नित्त्वाद् आद्युदात्तः। वर्चः। अन्ननाम−निघं० २।७। रूपम्। तेजः। आ-ददे। आङ् पूर्वात् डुदाञ् ग्रहणे-लट्। अहं गृह्णामि, स्वीकरोमि। रायः। रातेर्डैः। उ० २।६६। इति रा दाने डै प्रत्ययः, रै। धनस्य। पोषम्। पुष पुष्टौ−घञ्। पोषणं वर्धनं समृद्धिम्। रायस्पोषम्। षष्ठ्याः पतिपुत्र०। पा० ८।३।५३। इति विसर्गस्य सः। चित्तानि। चित ज्ञाने-क्त। मनांसि, मानसबलानि। अग्ने म० ३। हे परमेश्वर। सपत्ना...........इमम्। व्याख्यातम् २ ॥
विषय
यज्ञ व वर्चस्
पदार्थ
१. गतमन्त्र के अनुसार सजातों में श्रेष्ठ बननेवाला व्यक्ति कहता है हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो! आपके द्वारा ज्ञान से श्रेष्ठता को प्राप्त कराया गया (अहम्) = मैं (एषाम्) = इन सजातों के (यज्ञम्) = यज्ञ को (उत वर्च:) = और शक्ति को (आ ददे) = देता हूँ-इनके जीवन को यज्ञात्मक बनाकर इन्हें विलास से ऊपर उठाता हूँ, परिणामतः इनकी शक्ति का वर्धन करता हूँ। यज्ञमय जीवन से ही शक्ति का वर्धन होता है। २. मैं इन्हें (रायस्पोषम्) = धन का पोषण प्रास कराता हूँ-धनार्जन योग्य बनाता हूँ (उत) = और साथ ही (चित्तानि) = इन्हें चित्तों को भी प्राप्त कराता हूँ। इनकी स्मृतियों को भी ठीक रखता हूँ ताकि ये अपने स्वरूप व जीवनोद्देश्य को [कोऽह, कुत आयातः] न भूलते हुए धन का सदा सव्यय ही करें। ३. हे प्रभो! आप ऐसी कृपा कीजिए कि (सपत्ना:) = काम, क्रोध, लोभ आदि शत्रु (अस्मत्) = हमारे (अधरे भवन्तु) = पाँवों-तले ही रहें, हम इन्हें पराजित करनेवाले हों। इसप्रकार हमें शत्रु-दलन के योग्य बनाकर आप (इमम्) = इस आपके भक्त को (उत्तम नाकम्) = उत्तम स्वर्गलोक में (अधिरोहय) = अधिरूढ़ कीजिए। कामादि सपत्न ही नरक के द्वार हैं, इन्हें जीतकर स्वर्ग क्यों न मिलेगा?
भावार्थ
हमारा जीवन यज्ञमय हो जिससे हमारी शक्तियाँ जीर्ण न हों। हम धन के पोषण के साथ आत्म-स्मृतिवाले हों जिससे उन धनों के कारण विलासमय जीवनवाले न हो जाएँ।
विशेष
सूक्त का आरम्भ 'वसु व ज्योति' की प्राप्ति की प्रार्थना से होता है[१]। हम काम, क्रोध व लोभ को जीतकर उत्तम स्वर्गलोक का अधिरोहण करनेवाले हों [२]। हमें श्रेष्ठपद की प्राप्ति हो [३]। यज्ञमय जीवन से हम वर्चस्वी बने रहें। धनों के साथ आत्म-स्मरणवाले हों ताकि धन हमारे निधन का कारण न बन जाए [४]। असत्य भाषणादि पापों से हम ऊपर उठ सकें -
भाषार्थ
(एषाम्) इन वरुण राजाओं की (यज्ञम् ) यज्ञपद्धति को, (उत) तथा (वर्चः) तेज को, (रायस्पोषम् ) "कर" रूप में प्रदत्त परिपुष्ट-धन को, (उत) तथा (चित्तानि) परामर्श में दिये सम्यक-ज्ञानों को (अग्ने) हे ज्ञानाग्नि सम्पन्न परमेश्वर ! (अहम्) मैं सम्राट् ( आददे) ग्रहण करता हूँ। ताकि (सपत्ना:) शत्रु (अस्मत् अधरे) हम से निकृष्ट (भवन्तु) हो जायें और (इमम्) इस सम्राट को (नाकम् अधिरोहय ) तू हे ब्रह्म अर्थात् हे परमेश्वर! नाक पर अधिरूढ़ कर।
टिप्पणी
["अग्ने" यथा "तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः। तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म ता ऽ आपः स प्रजापतिः" (यजु० ३२।१) में अग्नि आदि नाम ब्रह्म के कहे हैं। ब्रह्म=परमेश्वर।]
विषय
ब्रह्मतेज और आयु की प्रार्थना ।
भावार्थ
( एषां ) इन प्रजाजनों के ( यज्ञ ) राष्ट्रमय यज्ञ या संगति या प्रेम से लाये गये दान भेंट को ( उत्त ) और ( वर्चः ) बलको ( आददे ) स्वीकार करता हूं । हे अग्ने ! सबके साक्षी परमात्मन् ! इन के (रायस्पोषम्) धन और अन्न आदि पोषक पदार्थों ( उत ) और ( चितानि ) स्नेह भरे चित्तों को भी (आददे) स्वीकार करता हूं, अपने वश करता हूं, जिससे ( सपत्नाः ) शत्रुगण मेरे मुकाबले में खड़े होने और प्रजा का पति होने का दावा करने वाले ( अस्मत् अधरे ) हम से निकृष्ट ( भवन्तु ) रहें अर्थात् हमारे आधीन रहें, और हे परसात्मन् ! ( इमं ) इस उत्तम प्रजाशिय राजा को ( उत्तमं ) उत्कृष्ट ( नाकं ) स्वर्ग समान, दुःख रहित समृद्ध राज्यपद पर ( अधि रोहय ) स्थापित कर ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। १,२ वस्वादयो मन्त्रोक्ता देवताः। ३, ४ अग्निर्देवता । त्रिष्टुप् छन्दः। चतुर्ऋचं सूक्तम् ॥
इंग्लिश (4)
Subject
Power and Lustre
Meaning
O lord omniscient and self-refulgent, Agni, I take on the rule and governance of the yajna of these people’s social order, their lustre and grandeur, their wealth, growing assets and their common will. Pray, let our adversaries be under the rule of our order, and raise this commonwealth to the heights of enlightenment and heavenly glory on earth.
Translation
O adorable Lord, I have taken to myself their sacrifice, their splendour, their abundance of riches as well as their minds. May our rivals be under us. May you make him ascend to the highest place of bliss.
Translation
O' self, effulgent God, I, the king assume the helm of affairs of these subjects, I enjoy the strength of their co-operation their financial helps and their wishes. O Lord, the foes and rivals prostrate beneath our (subjects) feet and please uplift the king to happiness of this world and beyond.
Translation
O God, I accept their gifts, their glory, their riches fulness, and their hopes; May our internal foes lie prostrate beneath our feet. Grant him the highest pitch of earthly happiness.
Footnote
‘I’ refers to the king. ‘Their refers to the subjects ‘Him’ refers to me, the king.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
४−एषाम्। स्वपुरुषाणाम्। यज्ञम्। यजयाचयतविच्छप्रच्छरक्षो नङ्। पा० ३।३।९०। इति यज देवार्चादानसङ्गतिकरणेषु-नङ्। पूजाम्, कीर्तिम्। वर्चः। सर्वधातुभ्योऽसुन्। उ० ४।१८९। इति वर्च दीप्तौ−असुन्। नित्त्वाद् आद्युदात्तः। वर्चः। अन्ननाम−निघं० २।७। रूपम्। तेजः। आ-ददे। आङ् पूर्वात् डुदाञ् ग्रहणे-लट्। अहं गृह्णामि, स्वीकरोमि। रायः। रातेर्डैः। उ० २।६६। इति रा दाने डै प्रत्ययः, रै। धनस्य। पोषम्। पुष पुष्टौ−घञ्। पोषणं वर्धनं समृद्धिम्। रायस्पोषम्। षष्ठ्याः पतिपुत्र०। पा० ८।३।५३। इति विसर्गस्य सः। चित्तानि। चित ज्ञाने-क्त। मनांसि, मानसबलानि। अग्ने म० ३। हे परमेश्वर। सपत्ना...........इमम्। व्याख्यातम् २ ॥
बंगाली (3)
पदार्थ
(অগ্নে) হে পরমাত্নন! (এষাং) ইহাদের (য়জ্ঞং) সৎকর্ম (উত) এবং (বর্চঃ) তেজ (রায়ঃ) ধনের (পোষং) বৃদ্ধি (উত) এবং (চিত্তানি) মানসিক বলকে (অহং) আমি (আ দদে) গ্রহণ করিতেছি। (সপত্নাঃ) শত্রুগণ (অস্মং) আমার অপেক্ষা (অধরে) নিম্নে (ভবন্তু) থাকুক। (উত্তমং) অত্যুচ্চ (নাকং) সুখে (এনম্) ইহাকে (অধি) উপরে (রোহয়) উঠাও।।
भावार्थ
হে পরমাত্মন! আমাদের এই স্বজনগণের সদ্ব্যবহার তেজ, ধন বৃদ্ধি এবং মানসিক বলকে আমি গ্রহণ করিতেছি। শত্রুগণ আমার অপেক্ষা নিম্ন স্তরে থাকুক এবং উপাসকদের অত্যুচ্চ সুখের বিধান কর।।
मन्त्र (बांग्ला)
ঐয়াং য়জ্ঞমুত বৰ্চো দদে হহং রায় স্পোষমুত চিত্তান্যগ্নে। সপত্না অম্মদবরে ভবন্তূ ত্তমং নাকমধি রোহয়েমম্।।
ऋषि | देवता | छन्द
অর্থবা। অগ্নিঃ। ত্রিষ্টুপ্
मन्त्र विषय
(সর্বসম্পত্তিপ্রয়ত্নোপদেশঃ) সমস্ত সম্পত্তির জন্য চেষ্টার উপদেশ
भाषार्थ
(অগ্নে) হে পরমেশ্বর ! (এষাম্) এঁদের [নিজের লোকেদের] দেওয়া/প্রদত্ত (যজ্ঞম্) সৎকার, (উত) ও (বর্চঃ) তেজ, (রায়ঃ) ধনের (পোষম্) বৃদ্ধি (উত) ও (চিত্তানি) মানসিক বল (অহম্) আমি (আদদে) গ্রহণ করি। (সপত্নাঃ) শত্রুরা (অস্মৎ) আমাদের (অধরে) নীচে (ভবন্তু) হোক, (উত্তমম্) অতি উচ্চ (নাকম্) সুখে (এনম্) একে [আমাকে] (অধি) উপরে (রোহয়) ওঠাও/আরোহণ করাও ॥৪॥
भावार्थ
বুদ্ধিমান নীতি নিপুণ পুরুষ নিজের লোকেদের দ্বারা কৃত উপকার ও সৎকারকে ধন্যবাদ সহিত স্বীকার করুক এবং বিপক্ষকে নিচু করে নিজের প্রতিষ্ঠা বৃদ্ধি করুক ॥৪॥ এই মন্ত্রের উত্তরার্ধ মন্ত্র ২ এর উত্তরার্ধ ॥
भाषार्थ
(এষাম্) এই বরুণ রাজাদের (যজ্ঞম্) যজ্ঞপদ্ধতিকে, (উত) এবং (বর্চঃ) তেজকে, (রায়স্পোষম্ ) "কর" রূপে প্রদত্ত পরিপুষ্ট-ধনকে, (উত) এবং (চিত্তানি) পরামর্শের মাধ্যমে প্রদত্ত সম্যক-জ্ঞানকে (অগ্নে) হে জ্ঞানাগ্নি সম্পন্ন পরমেশ্বর ! (অহম্) আমি সম্রাট্ (আদদে) গ্রহণ করি। যাতে (সপত্নাঃ) শত্রু (অস্মৎ অধরে) আমাদের থেকে নিকৃষ্ট (ভবন্তু) হয়/হোক/হয়ে যাক এবং (ইমম্) এই সম্রাটকে (উত্তমম্ নাকম্ অধিরোহয়) তুমি হে ব্রহ্ম অর্থাৎ হে পরমেশ্বর! নাকে/মোক্ষে অধিরূঢ়/অধিষ্ঠিত/আরূঢ় করো।
टिप्पणी
["অগ্নে" যথা "তদেবাগ্নিস্তদাদিত্যস্তদ্বায়ুস্তদু চন্দ্রমাঃ। তদেব শুক্রং তদ্ ব্রহ্ম তা আপঃ স প্রজাপতিঃ" (যজু০ ৩২।১) এ অগ্নি আদি নাম ব্রহ্মের বলা হয়েছে। ব্রহ্ম=পরমেশ্বর।]
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