अथर्ववेद के काण्ड - 15 के सूक्त 2 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 15/ सूक्त 2/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अध्यात्म अथवा व्रात्य देवता - साम्नी अनुष्टुप् छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - अध्यात्म प्रकरण सूक्त

    स उद॑तिष्ठ॒त्सप्राचीं॒ दिश॒मनु॒ व्यचलत् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स: । उत् । अ॒ति॒ष्ठ॒त् । स: । प्राची॑म् । दिश॑म् । अनु॑ । वि । अ॒च॒ल॒त् ॥२.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    स उदतिष्ठत्सप्राचीं दिशमनु व्यचलत् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    स: । उत् । अतिष्ठत् । स: । प्राचीम् । दिशम् । अनु । वि । अचलत् ॥२.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 15; सूक्त » 2; मन्त्र » 1

    पदार्थ -
    (सः) वह [व्रात्यपरमात्मा] (उत् अतिष्ठत्) खड़ा हुआ (सः) वह (प्राचीम्) सामनेवाली [अथवा पूर्व] (दिशम् अनु) दिशा की ओर (वि अचलत्) विचरा ॥१॥

    भावार्थ -
    मनुष्य परमात्मा कोअपने सामने वा पूर्व दिशा में व्यापक जानकर आगे को प्रवृत्ति करे ॥१॥इस सूक्तमें परमात्मा के विराट् रूप का वर्णन है ॥

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