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अथर्ववेद के काण्ड - 15 के सूक्त 6 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 6/ मन्त्र 12
    ऋषिः - अध्यात्म अथवा व्रात्य देवता - निचृत बृहती छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - अध्यात्म प्रकरण सूक्त
    206

    इ॑तिहा॒सस्य॑ च॒वै स पु॑रा॒णस्य॑ च॒ गाथा॑नां च नाराशं॒सीनां॑ च प्रि॒यं धाम॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ॒ति॒ह॒ऽआ॒सस्य॑ । च॒ । वै । स: । पु॒रा॒णस्य॑ । च॒ । गाथा॑नाम् । च॒ । ना॒रा॒शं॒सीना॑म् । च॒ । प्रि॒यम् । धाम॑ । भ॒व॒ति॒ । य: । ए॒वम् । वेद॑ ॥६.१२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इतिहासस्य चवै स पुराणस्य च गाथानां च नाराशंसीनां च प्रियं धाम भवति य एवं वेद॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इतिहऽआसस्य । च । वै । स: । पुराणस्य । च । गाथानाम् । च । नाराशंसीनाम् । च । प्रियम् । धाम । भवति । य: । एवम् । वेद ॥६.१२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 15; सूक्त » 6; मन्त्र » 12
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ईश्वर के सर्वस्वामी होने का उपदेश।

    पदार्थ

    (सः) वह [विद्वान्]पुरुष (वै) निश्चय करके (इतिहासस्य) इतिहास का (च च) और (पुराणस्य) पुराण का (च) और (गाथानाम्) गाथाओं का (च) और (नाराशंसीनाम्) नाराशंसियों का (प्रियम्) प्रिय (धाम) धाम [घर] (भवति) होता है, (यः) जो [विद्वान्] (एवम्) ऐसे वा व्यापक [व्रात्य परमात्मा] को (वेद) जानता है ॥१२॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य परमात्मा केगुण कर्म स्वभाव के साथ उत्तम मनुष्यों के गुण कर्म स्वभाव का उपदेश करता है, वहइतिहास पुराण आदि द्वारा कीर्ति पाता है ॥१०, ११, १२॥मन्त्र १०-१२ महर्षिदयानन्दकृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका वेदसंज्ञाविचार पृष्ठ ८२ में उद्धृत हैं ॥

    टिप्पणी

    ११, १२−(तम्)व्रात्यम् (इतिहासः) इतिह पारम्पार्य्योपदेश आस्तेऽस्मिन्। इतिह+आस उपवेशनेविद्यमानतायां च-घञ्। महापुरुषाणां वृत्तान्तः (च) (पुराणम्) प्राचीनपुरुषाणांवृत्तान्तः (च) (गाथाः) उपिकुषिगार्तिभ्यस्थन्। उ० २।४। गै गाने-थन्। गानयोग्यावेदमन्त्राः। शिक्षाप्रदाः श्लोकादयः (नाराशंसीः) अ० १४।१।७। नर+शंसुस्तुतौ-अण्। दीर्घश्च, ततः स्वार्थे-अण्, ङीप्। येन नराः प्रशस्यन्ते स नाराशंसोमन्त्रः-निरु० ९।९। वीरनराणां कीर्तनानि (अनुव्यचलन्) अनुसृत्य व्यचरन्। अन्यत्पूर्ववत् स्पष्टं च ॥

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    विषय

    बृहती दिशा में 'इतिहास, पुराण, गाथा और नाराशंसी'

    पदार्थ

    १. (सः) = वह व्रात्य (बृहती दिशं अनुव्यचलत्) = बृहती दिशा-वृद्धि की दिशा का लक्ष्य करके चला। (तम्) = उस बृहती दिशा में चलनेवाले व्रात्य को (इतिहासः पुराणं च) = सृष्टि-उत्पत्ति आदि का नित्य इतिहास और जगदुत्पत्ति आदि का वर्णनरूप पुराण (च) = तथा (गाथा: नाराशंसी: च) = किसी का दृष्टान्त-दान्तिरूप कथा-प्रसंग कहनारूप गाथाएँ तथा मनुष्यों के प्रसंशनीय कर्मों का कहनारूप नाराशंसी (अनुव्यचलन्) = अनुकूलता से प्राप्त हुई। इनके द्वारा ही वस्तुत: वह वेद व्याख्यान को सुन्दरता से कर पाया। २. (यः एवं वेद) = जो इसप्रकार इतिहास आदि के महत्त्व को समझता है, (सः) = वह व्रात्य (वै) = निश्चय से (इतिहासस्य पुराणस्य च) = इतिहास व पुराण का (च) = तथा (गाथानां नाराशंसीनां च) = गाथाओं व नाराशंसियों का (प्रियं धाम भवति) = प्रिय धाम होता है। इनके द्वारा वह वेद को खूब व्याख्यात कर पाता है।

    भावार्थ

    एक व्रात्य विद्वान 'इतिहास, पुराण, गाथा व नाराशंसी' द्वारा वेद का वर्धन व्याख्यान करता हुआ 'बृहती दिक्' की ओर चलता है-वृद्धि की दिशा में आगे बढ़ता है।

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    भाषार्थ

    (इतिहासस्य, च) इतिहास का (वै) निश्चय से (पुराणस्य, च) और पुराण का (गाथानाम्, च) और सामगानों का, (नाराशंसीनाम्, च) और नाराशंसी ऋचाओं का (सः) वह (प्रियम्, धाम) प्रिय स्थान (भवति) हो जाता है, (यः) जो संन्यासी कि (एवम्) इस प्रकार के तथ्य को (वेद) जानता और तदनुसार आचरण करता है।

    टिप्पणी

    [अभिप्राय यह कि इस तथ्य का वेत्ता व्यक्ति भी, इतिहास आदि का मनन कर, उन्हें निज जीवन का अङ्ग बना लेता है। वैदिक दृष्टि में ज्ञान का पर्यवसान क्रिया या आचरण में होता है । यथा आग्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थदयमतदर्थानाम्" (पूर्व मीमांसा १।२।१)।]

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    विषय

    व्रात्य प्रजापति का प्रस्थान।

    भावार्थ

    (सः) वह (बृहतीं दिशम् अनुव्यचलत्) ‘बृहती’ दिशा को चला। (११) (तम् इतिहासः च, पुराणं च गाथाः च, नाराशंसीः च अनु वि-अवलन्) उसके पीछे पीछे इतिहास, पुराण, गाथाएं और नाराशंसिय भी चलीं। (१२) (यः एवं वेद) जो इस प्रकार जानता है (सः वै इतिहासस्य च, पुराणस्य च गाथानां च नाराशंसीनां च प्रियं धाम भवति) वह निश्चय ही इतिहास पुराण, अर्थात् सृष्टि विषयक पुरातन ऐतिह्य, गाथा और नाराशंसियों का भी प्रिय आश्रय हो जाता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    १ प्र०, २ प्र० आसुरी पंक्तिः, ३-६, ९ प्र० आसुरी बृहती, ८ प्र० परोष्णिक्, १ द्वि०, ६ द्वि० आर्ची पंक्तिः, ७ प्र० आर्ची उष्णिक्, २ द्वि०, ४ द्वि० साम्नी त्रिष्टुप्, ३ द्वि० साम्नी पंक्तिः, ५ द्वि०, ८ द्वि० आर्षी त्रिष्टुप्, ७ द्वि० साम्नी अनुष्टुप्, ६ द्वि० आर्ची अनुष्टुप्, १ तृ० आर्षी पंक्तिः, २ तृ०, ४ तृ० निचृद् बृहती, ३ तृ० प्राजापत्या त्रिष्टुप्, ५ तृ०, ६ तृ० विराड् जगती, ७ तृ० आर्ची बृहती, ९ तृ० विराड् बृहती। षड्विंशत्यृचं षष्ठं पर्यायसूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Vratya-Prajapati daivatam

    Meaning

    One who knows this becomes the favourite love of Histories, Puranas, Gathas and Narashansis, deeply absorbed in these studies.

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    Translation

    Surely he, who knows it thus, becomes a pleasing abode of Itihása and Puranas, of Gathas and Narasansis.

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    Translation

    He who knows this becomes the favourable abode or Itihasa, Purana, Gatha and Narashavsi. [. N.B :- The science of describing and composing the theme in a way which seems personal story but in reality the description and composition are concerned with impersonal and having no connection with the proper names of person, place or things. Itihaaasa is the method of dealing with In this science. This is called a kind of the dexterity of intelligence. Purana, the science of cosmic creation. How and by whom and from whence was this earth etc. extended are the theme of this science. Gatha, those vedic verses which are pregmant with the imaginary conversation are called Gatha. Narashansi. are those vedic verses in which the description of man is found.]

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    Translation

    Becomes the dear home: Studies them and derives full benefit from them to multiply his store of knowledge.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ११, १२−(तम्)व्रात्यम् (इतिहासः) इतिह पारम्पार्य्योपदेश आस्तेऽस्मिन्। इतिह+आस उपवेशनेविद्यमानतायां च-घञ्। महापुरुषाणां वृत्तान्तः (च) (पुराणम्) प्राचीनपुरुषाणांवृत्तान्तः (च) (गाथाः) उपिकुषिगार्तिभ्यस्थन्। उ० २।४। गै गाने-थन्। गानयोग्यावेदमन्त्राः। शिक्षाप्रदाः श्लोकादयः (नाराशंसीः) अ० १४।१।७। नर+शंसुस्तुतौ-अण्। दीर्घश्च, ततः स्वार्थे-अण्, ङीप्। येन नराः प्रशस्यन्ते स नाराशंसोमन्त्रः-निरु० ९।९। वीरनराणां कीर्तनानि (अनुव्यचलन्) अनुसृत्य व्यचरन्। अन्यत्पूर्ववत् स्पष्टं च ॥

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