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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 2 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 2/ मन्त्र 1
    ऋषिः - सिन्धुद्वीपम् देवता - आपः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - आपः सूक्त
    104

    शं त॒ आपो॑ हैमव॒तीः शमु॑ ते सन्तू॒त्स्याः। शं ते॑ सनिष्य॒दा आपः॒ शमु॑ ते सन्तु व॒र्ष्याः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    शम्। ते॒। आपः॑। है॒म॒ऽव॒तीः। शम्। ऊं॒ इति॑। ते॒। स॒न्तु॒। उ॒त्स्याः᳡। शम्। ते॒। स॒नि॒स्यदाः॑। आपः॑। शम्। ऊं॒ इति॑। ते॒। स॒न्तु॒। व॒र्ष्याः᳡ ॥२.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    शं त आपो हैमवतीः शमु ते सन्तूत्स्याः। शं ते सनिष्यदा आपः शमु ते सन्तु वर्ष्याः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    शम्। ते। आपः। हैमऽवतीः। शम्। ऊं इति। ते। सन्तु। उत्स्याः। शम्। ते। सनिस्यदाः। आपः। शम्। ऊं इति। ते। सन्तु। वर्ष्याः ॥२.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 2; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    जल के उपकार का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे मनुष्य !] (ते) तेरे लिये (हैमवतीः) हिमवाले पहाड़ों से उत्पन्न (आपः) जल (शम्) शान्तिदायक, (उ) और (ते) तेरे लिये (उत्स्याः) कूपों से निकले हुए [जल] (शम्) शान्तिदायक (सन्तु) होवें। (ते) तेरे लिये (सनिष्यदाः) शीघ्र बहनेवाले (आपः) जल (शम्) शान्तिदायक (उ) और (ते) तेरे लिये (वर्ष्याः) वर्षा से उत्पन्न (जल) (शम्) शान्तिदायक (सन्तु) होवें ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्य प्रबन्ध करें कि पहाड़ों, कुओं, नदियों और वर्षा के जल खान-पान, खेती, शिल्प आदि के कामों में आते रहें ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(शम्) शान्तिप्रदाः (ते) तुभ्यम् (आपः) जलानि (हैमवतीः) तत आगतः। पा० ४।३।७४। इत्यण्। हैमवत्यः। हिमवद्भ्यः पर्वतेभ्य उत्पन्नाः (शम्) (उ) चार्थे (ते) (सन्तु) (उत्स्याः) उत्सः कूपनाम-निघ० ३।२३। कूपेषु भवाः (सनिष्यदाः) स्यन्दू प्रस्रवणे−यङ्, अच्, यङ्लुकि निगागमः। सर्वदाः स्यन्दमानाः। शीघ्रं स्रवन्त्यः (वर्ष्याः) वर्षासु भवाः। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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    विषय

    'हैमवतीः - वर्ष्याः' आपः

    पदार्थ

    १. गत सूक्त में वर्णित (ते) = तुझ यज्ञशील पुरुष के लिए (हेमवती: आपः) = हिमवाले पर्वतों से बहनेवाली जलधाराएँ (शम्) = शान्ति देनेवाली हों। (उ) = और (ते) = तेरे लिए (उत्स्याः) = स्रोतों से बहनेवाली जलधाराएँ भी (शं सन्तु) = शान्ति देनेवाली हों। २. (सनिष्यदा: आप:) = सर्बदा स्यन्दमान निरन्तर बहनेवाली-जलधाराएँ (ते शम्) = तेरे लिए शान्तिकर हों। (उ) = और (वा:) = वृष्टि से प्राप्त होनेवाले ये जल (ते शम्) = तेरे लिए शान्तिकर हों।।

    भावार्थ

    हिमवान् पर्वतों से आनेवाले, स्रोतों से बहनेवाले, निरन्तर प्रवाहित होनेवाले तथा वृष्टि के जल हमारे लिए शान्तिकर हों।

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    भाषार्थ

    हे मनुष्य! (ते) तेरे लिए (हैमवतीः) हिमवाले पर्वतों के (आपः) जल (शम्) शान्तिदायक और रोगशामक (सन्तु) हों, (ते) तेरे लिए (उत्स्याः) कूपों के जल (शम् उ) निश्चय से शान्तिदायक और रोगनाशक हों। (ते) तेरे लिए (सनिष्यदाः) स्यन्दन करते हुए या शीघ्रप्रवाही (आपः) जल (शम्) शान्तिदायक और रोगनाशक हों। (ते) तेरे लिए (वर्ष्याः) वर्षा के जल (शम् उ) निश्चय से रोगनाशक और शान्तिदायक (सन्तु) हों।

    टिप्पणी

    [उत्सः कूपनाम (निघं० ३.२३)। सनिष्यदाः=स्यन्द्+यङ् लुक्+अच्।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Apah

    Meaning

    O man, may the streams flowing from snowy mountains be for your peace and pleasure. May the wells and lakes and tanks bring you peace and joy. May the rivers flowing fast be full of peace for you. And may the showers of rain bring you peace and joy.

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    Subject

    Praise and prayer to the Waters

    Translation

    Auspicious to you be the waters of the Snowy mountain, auspicious to you the spring waters; auspicious to you the fast-running waters, auspicious to you be the waters of rain.

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    Translation

    May the waters of snow covered hills be swcet for you, O man, may the waters of well be favourable for you, may the streams running swift be auspicious for you and may the waters of rain be pleasant to you.

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    Translation

    O man, may the waters from the snowy hills be peace-giving the thee. May the spring waters bring calmness to thee. May the swift-flowing waters be pleasant for thee. So may the rainy waters be a source of tranquility to thee.

    Footnote

    (1-5) The whole hymn instructs man about various kinds of waters and the right use of their healing powers.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(शम्) शान्तिप्रदाः (ते) तुभ्यम् (आपः) जलानि (हैमवतीः) तत आगतः। पा० ४।३।७४। इत्यण्। हैमवत्यः। हिमवद्भ्यः पर्वतेभ्य उत्पन्नाः (शम्) (उ) चार्थे (ते) (सन्तु) (उत्स्याः) उत्सः कूपनाम-निघ० ३।२३। कूपेषु भवाः (सनिष्यदाः) स्यन्दू प्रस्रवणे−यङ्, अच्, यङ्लुकि निगागमः। सर्वदाः स्यन्दमानाः। शीघ्रं स्रवन्त्यः (वर्ष्याः) वर्षासु भवाः। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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