अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 28/ मन्त्र 5
भि॒न्द्धि द॑र्भ स॒पत्ना॑न्मे भि॒न्द्धि मे॑ पृतनाय॒तः। भि॒न्द्धि मे॒ सर्वा॑न्दु॒र्हार्दो॑ भि॒न्द्धि मे॑ द्विष॒तो म॑णे ॥
स्वर सहित पद पाठभि॒न्द्धि। द॒र्भ॒। स॒ऽपत्ना॑न्। मे॒। भि॒न्द्धि। मे॒। पृ॒त॒ना॒ऽय॒तः। भि॒न्द्धि। मे॒। सर्वा॑न्। दुः॒ऽहार्दः॑। भि॒न्द्धि। मे॒। द्वि॒ष॒तः। म॒णे॒ ॥२८.५॥
स्वर रहित मन्त्र
भिन्द्धि दर्भ सपत्नान्मे भिन्द्धि मे पृतनायतः। भिन्द्धि मे सर्वान्दुर्हार्दो भिन्द्धि मे द्विषतो मणे ॥
स्वर रहित पद पाठभिन्द्धि। दर्भ। सऽपत्नान्। मे। भिन्द्धि। मे। पृतनाऽयतः। भिन्द्धि। मे। सर्वान्। दुःऽहार्दः। भिन्द्धि। मे। द्विषतः। मणे ॥२८.५॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
सेनापति के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थ
(दर्भ) हे दर्भ ! [शत्रुविदारक सेनापति] (मे) मेरे (सपत्नान्) वैरियों को (भिन्द्धि) तोड़ दे, (मे) मेरे लिये (पृतनायतः) सेना चढ़ानेवालों को (भिन्द्धि) तोड़ दे, (मे) मेरे (सर्वान्) सब (दुर्हार्दः) दुष्ट हृदयवालों को (भिन्द्धि) तोड़ दे, (मणे) हे प्रशंसनीय ! (मे) मेरे (द्विषतः) वैरियों को (भिन्द्धि) तोड़ दे ॥५॥
भावार्थ
स्पष्ट है ॥५॥
टिप्पणी
५−(भिन्द्धि) विदारय (दर्भ) म०१। हे शत्रुविदारक सेनापते (सपत्नान्) शत्रून् (मे) मम (भिन्द्धि) (मे) मह्यम् (पृतनायतः) अ०१।२१।२। सुप आत्मनः क्यच्। पा०३।१।८। पृतना-क्यच्, आकारलोपाभावश्छान्दसः। ततः शतृ। पृतन्यतः। पृतनां सेनामात्मन इच्छतः शत्रून् (भिन्द्धि) (मे) मम (सर्वान्) (दुर्हार्दः) म०२। दुष्टहृदयान् (भिन्द्धि) (मे) मम (द्विषतः) विरोधकान् (मणे) हे प्रशंसनीय ॥
विषय
रोगों का विदारण
पदार्थ
१.हे (दर्भ) = वीर्यमणे! (मे) = मेरे (सपत्नान्) = शत्रुभूत रोगों को (भिन्धि) = विदीर्ण कर डाल। ये (पूतनायत:) = मुझपर सेना से चढ़ाई करनेवाले-नाना प्रकार के उपद्रवों के साथ आक्रमण करनेवाले इन रोगों को (भिन्धि) = नष्ट कर। २. मेरे प्रति (सर्वान्) = सब (दुर्हार्दिः) = दुष्ट हृदयवाले मेरा अशुभ चाहनेवाले शत्रुओं को (भिन्धि) = विदीर्ण कर। हे (मणे) = वीर्य! तू (मे द्विषत:) = मेरे साथ अप्रीतिवाले इन रोगरूप शत्रुओं को (भिन्धि) = विदीर्ण कर।
भावार्थ
रोग हमारे सपत्न है-हमारे शरीर पर अपना आधिपत्य स्थापित करना चाहते हैं। ये रोग विविध उपद्रवोंरूप सैन्य के साथ हमपर आक्रमण करते हैं। ये हमारे प्रति दुष्टभाववाले हैं-ये कभी हमारा भला नहीं करते। इनकी हमारे साथ कोई प्रीति नहीं। वीर्य शरीर में सुरक्षित होने पर इनका विदारण कर देता है।
भाषार्थ
(दर्भ) हे शत्रुविदारक, (मणे) शिरोमणि सेनापति! (मे) मुझ राजा के (सपत्नान्) आन्तरिक-विद्रोहियों को (भिन्धि) भेदनीति द्वारा भिन्न-भिन्न कर। (मे) मुझ राजा के राष्ट्र पर (पृतनायतः) सेना द्वारा आक्रमण चाहनेवालों को (भिन्धि) भेदनीति द्वारा भिन्न-भिन्न कर। (मे) मुझ राजा के (सर्वान्) सब (दुर्हार्दः) दुष्ट हार्दिक भावनाओं वालों को (भिन्धि) भेदनीति द्वारा भिन्न-भिन्न कर। (मे) मुझ राजा के (द्विषतः) अमित्रों को (भिन्द्धि) भेदनीति द्वारा भिन्न-भिन्न कर।
विषय
शत्रुनाशक सेनापति दर्भ मणि का वर्णन।
भावार्थ
हे (दर्भ) शत्रु नाशकारी पुरुष ! तू (मे) मेरे (सपत्नान्) शत्रुओं और (मे पृतनायतः) मेरे राष्ट्र पर सेना लेकर चढ़ने वाले शत्रुओं को (भिन्धि) तोड़दे. नाश कर। और हे (मणे) मननशील शिरोमणि पुरुष ! तू (मे) मेरे प्रति (सर्वान् दुर्हार्दः) सब प्रकार के दुष्ट हृदय वाले (द्विषतः) द्वेषकारी पुरुषों को (भिन्धि) विनाश कर।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
सपत्नक्षय कामो ब्रह्माऋषिः। मन्त्रोक्तो दर्भमणिर्देवता। अनुष्टुभः। दशर्चं सूक्तम्।
इंग्लिश (4)
Subject
Darbha Mani
Meaning
O Darbha, break down my rival forces, disintegrate the forces that fight against me. Break off all those that act against my heart and soul. O Jewel, break down all the forces that jealously deplete me.
Translation
Split, O darbha, my rivals; split them who invade me; split all my enemies; O blessing, split them, who hate me.
Translation
Let this excellent Darbha rend my enemies, let it tear my adversaries, Yet it pierce all those who have evil hearts for me and lei it rend my haters.
Translation
O Darbha, penetrate these enemies of mine. Crush those who come to fight with me. O radiating Mane, smash all these evil-hearted people. Crush all these haters of mine.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
५−(भिन्द्धि) विदारय (दर्भ) म०१। हे शत्रुविदारक सेनापते (सपत्नान्) शत्रून् (मे) मम (भिन्द्धि) (मे) मह्यम् (पृतनायतः) अ०१।२१।२। सुप आत्मनः क्यच्। पा०३।१।८। पृतना-क्यच्, आकारलोपाभावश्छान्दसः। ततः शतृ। पृतन्यतः। पृतनां सेनामात्मन इच्छतः शत्रून् (भिन्द्धि) (मे) मम (सर्वान्) (दुर्हार्दः) म०२। दुष्टहृदयान् (भिन्द्धि) (मे) मम (द्विषतः) विरोधकान् (मणे) हे प्रशंसनीय ॥
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