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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 57 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 57/ मन्त्र 3
    ऋषिः - यमः देवता - दुःष्वप्ननाशनम् छन्दः - त्र्यवसाना चतुष्पदा त्रिष्टुप् सूक्तम् - दुःस्वप्नानाशन सूक्त
    45

    देवा॑नां पत्नीनां गर्भ॒ यम॑स्य कर॒ यो भ॒द्रः स्व॑प्न। स मम॒ यः पा॒पस्तद्द्वि॑ष॒ते प्र हि॑ण्मः। मा तृ॒ष्टाना॑मसि कृष्णशकु॒नेर्मुख॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    देवा॑नाम्। प॒त्नी॒ना॒म्। ग॒र्भ॒। यम॑स्य। क॒र॒। यः। भ॒द्रः। स्व॒प्न॒। सः। मम॑। यः। पा॒पः। तत्। द्वि॒ष॒ते। प्र। हि॒ण्मः॒। मा। तृ॒ष्टाना॑म्। अ॒सि॒। कृ॒ष्ण॒ऽश॒कु॒नः। मुख॑म् ॥५७.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    देवानां पत्नीनां गर्भ यमस्य कर यो भद्रः स्वप्न। स मम यः पापस्तद्द्विषते प्र हिण्मः। मा तृष्टानामसि कृष्णशकुनेर्मुखम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    देवानाम्। पत्नीनाम्। गर्भ। यमस्य। कर। यः। भद्रः। स्वप्न। सः। मम। यः। पापः। तत्। द्विषते। प्र। हिण्मः। मा। तृष्टानाम्। असि। कृष्णऽशकुनः। मुखम् ॥५७.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 57; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    बुरे स्वप्न दूर करने का उपदेश।

    पदार्थ

    (देवानाम्) हे विद्वानों की (पत्नीनाम्) पालन शक्तियों के (गर्भ) गर्भ ! [उदररूप पोषक] और (यमस्य) हे यम [मृत्यु] के (कर) हाथ ! (स्वप्न) हे स्वप्न ! (यः) जो तू (भद्रः) कल्याणकारी है, (सः) वह (मम) मेरा [होवे], (तत्) इसलिये (यः) जो तू (पापः) पापी [अनहित] है, [उसे] (द्विषते) वैरी के लिये (प्र हिण्मः) हम भेजते हैं। (तृष्टानाम्) क्रूरों के मध्य (कृष्णशकुनेः) काले पक्षी [कौवे आदि] का (मुखम्) मुख (मा असि) तू मत हो ॥३॥

    भावार्थ

    स्वप्न दो प्रकार के हैं, एक शुभ विद्वानों के हितकारी और दूसरे अशुभ जो दुःखदायी हैं, विद्वान् लोग अपने शुभ विचारों के अनुरूप शुभ स्वप्न देखें और कुविचारों के कारण से कुस्वप्न देखकर शत्रु न बनें ॥३॥

    टिप्पणी

    ३−(देवानाम्) विदुषाम् (पत्नीनाम्) पालनशक्तीनाम् (गर्भ) हे उदरवत् पोषक (यमस्य) मृत्योः (कर) हे हस्त इव हितकर (यः) यस्त्वम् (भद्रः) कल्याणकारी भवसि (स्वप्न) (सः) स त्वम् (मम) भवेः-इति शेषः (यः) त्वम् (पापः) अनिष्टकारी भवसि (तत्) तस्मात् (द्विषते) शत्रवे (प्र हिण्मः) हि गतौ, अन्तर्गतण्यर्थः। प्रेरयामः (तृष्टानाम्) ञितृषा पिपासायाम्-क्त। तृषितानां लोभिनां क्रूराणां मध्ये (मा असि) मा भव (कृष्णशकुनेः) कृष्णपक्षिणः। काकादेः (मुखम्) मुखमिव क्रूरम् ॥

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    भाषार्थ

    (देवानाम्) दिव्यगुणी उपासकों की (पत्नीनाम्) रक्षिका चित्तवृत्तियों के (गर्भ) हे गर्भभूत! तथा (यमस्य) यमनियमों के परिपालक के (कर) हस्तरूप से सहायक (स्वप्न) हे सात्त्विक स्वप्न! (यः) जो तू (भद्रः) सुखदायक और कल्याणकारी है, (सः) वह तू (मम) मेरा हो गया है। (यः) और जो (पापः) पापमय दुःस्वप्न है (तद्) उसे (द्विषते) द्वेष्यपक्ष में (प्र हिण्मः) हम प्रेषित करते हैं। हे दुःस्वप्न! (तृष्टानाम्) अध्यात्म तृष्णावालों का (मा असि) तू अब नहीं है। तू (कृष्णशकुनेः) काले पक्षी के (मुखम्) काले मुख के सदृश है।

    टिप्पणी

    [देवानाम्= दिव्यगुणी उपासक। यथा—“यत्र देवा अमृतमानशानास्तृतीये धामन्नध्यैरयन्त” (यजु० ३२/१०); तथा “देवाः=साध्याः=साधना-सम्पन्न तथा, ऋषि लोग=वेदार्थ साक्षात्कर्ता। यथा—“तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये” (यजु० ३१/९)। गर्भ=जैसे माताओं के गर्भभूत शिशु माताओं से पैदा होते हैं, वैसे सात्त्विक स्वप्न सात्त्विक चित्तवृत्तियों से प्रकट होते हैं। कर=हस्त। भद्रस्वप्न हस्तवत् सहायक होते हैं। भद्र स्वप्न यमनियमों के पालक को ऐसे सहायक होते हैं, जैसे कि काम करने और वीरता में हाथ। दुःस्वप्न तामसिक हैं, तमोगुण के परिणाम हैं। तमोगुण को कृष्णवर्ण का कहा गया है। यथा—“अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णाम्” (श्वेता० उप० ४/५); लोहित= रजोगुण; शुक्ल= सत्त्वगुण; कृष्ण=तमोगुण। अजा= अजन्मा नित्य प्रकृति। काला पक्षी=अर्थात् कौए का मुख काला होता है, और इस मुख के द्वारा वह चोरी से पड़े अन्न को खा जाता है। तमोगुण भी काला होता है, और चोरी आदि करने का कारण बनता है, और तदनुरूप दुःस्वप्नों को उत्पन्न करता है।]

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    विषय

    'भद्र व अभद्र' स्वप्न

    पदार्थ

    १. हे (देवानां पत्नीनां गर्भ) = देवशक्तियों को अपने में धारण करनेवाले! अथवा (यमस्य) = कर-यम के हस्तभूत स्वप्न-स्वप्न ! (य:) = जो तो भद्र! कल्याणकर स्वप्न है (सः मम) = वह मेरा हो। (यः पाप:) = जो पाप [अशुभ] स्वप्न है (तत्) = उसको (द्विषते) = हमसे अप्रीति करनेवाले के लिए (प्रहिण्मः) = भेजते हैं। २. स्वप्न दो प्रकार के होते हैं-एक शुभ और दूसरे अशु । शुभ स्वप्न मानो अपने अन्दर दिव्यशक्तियों को धारण किये हुए है-ये हमें प्रभु का दर्शन करानेवाले होते हैं ज्ञान का प्रकाश देनेवाले होते हैं। अशुभ स्वप्न हमें मृत्यु की ओर ले जाते हैं। हम स्वप्नों में पाप कर बैठते हैं। हे स्वप्न! तू हमारे लिए (तृष्टानाम्) = वैषयिक तृष्णाओं का तथा (कृष्णशकुनै:) = काले शक्तिशाली घोर पाप का (मुखम्) = प्रवर्तक (मा असि) = मत हो। हम स्वप्न में लोभ-प्रवृत्त होकर बोर अशुभ कार्यों को करनेवाले न बन जाएँ। स्वप्न में इसप्रकार के पाप हमसे न हो जाएँ।

    भावार्थ

    स्वप्न शुभ व अशुभ दो प्रकार के हैं। हमें शुभ स्वप्न ही प्राप्त हों अशुभ नहीं। हम स्वप्न में भी प्रभु का दर्शन करें। स्वप्न में लोभवश अशुभ कर्म न कर रहे हों।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Duh-Svapna

    Meaning

    O Dream, you are a product of the supportive powers of senses and mind. You are a gift of the hand of the subconscious reflection of the discipline of yama and niyama which is auspicious. But that dream of ours which is evil, we cast away as an object of hate and rejection. As a black omen of misfortune, you are no favourite of those who thirst for divinity. Be not that.

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    Translation

    O child of the divine protecting powers, o hand of the controlling Lord: Ó dream whatever is benign may that be mine; whàt is evil, thát we send away to the malicious enemy. May you not be the mouth of the black bird. ( crow) for the sufferers.

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    Translation

    The Princes come together (one by one) debts become accumulated (little by little) the infection of leprosy comes together (by and by) and the phase of moon comes to completion (one by one}. So in the same way whatever evil dream visit let us to send that bad dream to that bad effect of the dream which is unfavorable to us.

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    Translation

    O sleep, thou art born of the protective powers of the sense-organs and art the inducer of the controlling energy. Whatever is peaceful and pleasant in thee, let it be mine; whatever is evil or bad in thee, let us kick it off to the enemy. Let not thee be like the mouth of the crow, among the thirsty birds, (i.e., just as a thirsty crow caws and caws, so let us not be muttering aloud in our sleep like the thirsty crow).

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(देवानाम्) विदुषाम् (पत्नीनाम्) पालनशक्तीनाम् (गर्भ) हे उदरवत् पोषक (यमस्य) मृत्योः (कर) हे हस्त इव हितकर (यः) यस्त्वम् (भद्रः) कल्याणकारी भवसि (स्वप्न) (सः) स त्वम् (मम) भवेः-इति शेषः (यः) त्वम् (पापः) अनिष्टकारी भवसि (तत्) तस्मात् (द्विषते) शत्रवे (प्र हिण्मः) हि गतौ, अन्तर्गतण्यर्थः। प्रेरयामः (तृष्टानाम्) ञितृषा पिपासायाम्-क्त। तृषितानां लोभिनां क्रूराणां मध्ये (मा असि) मा भव (कृष्णशकुनेः) कृष्णपक्षिणः। काकादेः (मुखम्) मुखमिव क्रूरम् ॥

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