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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 57 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 57/ मन्त्र 5
    ऋषिः - यमः देवता - दुःष्वप्ननाशनम् छन्दः - त्र्यवसाना पञ्चपदा पराशाक्वरातिजगती सूक्तम् - दुःस्वप्नानाशन सूक्त
    75

    अ॑नास्मा॒कस्तद्दे॑वपी॒युः पिया॑रुर्नि॒ष्कमि॑व॒ प्रति॑ मुञ्चताम्। नवा॑र॒त्नीनप॑मया अ॒स्माकं॒ ततः॒ परि॑। दुः॒ष्वप्न्यं॒ सर्वं॑ द्विष॒ते निर्द॑यामसि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒ना॒स्मा॒कः। तत्। दे॒व॒ऽपी॒युः। पिया॑रुः। नि॒ष्कम्ऽइ॑व। प्रति॑। मु॒ञ्च॒ता॒म्। नव॑। अ॒र॒त्नीन्। अप॑ऽमयाः। अ॒स्माक॑म्। ततः॑। परि॑। दुः॒ऽस्वप्न्य॑म्। सर्व॑म्। द्वि॒ष॒ते। निः। द॒या॒म॒सि॒ ॥५७.५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अनास्माकस्तद्देवपीयुः पियारुर्निष्कमिव प्रति मुञ्चताम्। नवारत्नीनपमया अस्माकं ततः परि। दुःष्वप्न्यं सर्वं द्विषते निर्दयामसि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अनास्माकः। तत्। देवऽपीयुः। पियारुः। निष्कम्ऽइव। प्रति। मुञ्चताम्। नव। अरत्नीन्। अपऽमयाः। अस्माकम्। ततः। परि। दुःऽस्वप्न्यम्। सर्वम्। द्विषते। निः। दयामसि ॥५७.५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 57; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    बुरे स्वप्न दूर करने का उपदेश।

    पदार्थ

    (अनास्माकः) हमारा न होनेवाला, (देवपीयुः) विद्वानों का सतानेवाला, (पियारुः) दुःखदायी [शत्रु] (तत्) उस [दुष्ट स्वप्न] को (निष्कम् इव) सुवर्ण के समान (प्रति मुञ्चताम्) धारण करे। (अस्माकम्) हमारे (ततः) उस [स्थान] से [दुष्ट स्वप्न को] (नव) नौ (अरत्नीन्) हाथों पर (परि) अलग करके (अपमयाः) तू दूर ले जा। (सर्वम्) सब (दुःष्वप्न्यम्) दुष्ट स्वप्न को (द्विषते) वैरी के लिये (निः दयामसि) हम बाहर हाँकते हैं ॥५॥

    भावार्थ

    धर्मात्मा लोग दुष्टों के समान कुविचारों को अपने में न आने देवें, किन्तु उत्तम विचारों को आत्मा में सदा धारण करते रहें ॥५॥

    टिप्पणी

    ५−(अनास्माकः) म० ४। योऽस्माकं न भवति सः (तत्) दुःष्वप्न्यम् (देवपीयुः) म० ४। विदुषां हिंसकः (पियारुः) म० ४। दुःखप्रदः (निष्कम्) सुवर्णम् (इव) यथा (प्रति मुञ्चताम्) धारयतु (नव) (अरत्नीन्) अ+ऋ गतौ-कत्नि, रत्निर्बद्धमुष्टिकरः स नास्ति यत्र। विस्तृतकनिष्ठाङ्गुलिमुष्टिकहस्तप्रमाणानि (अपमयाः) मय गतौ भ्वादिः, लेट् णिजर्थः। अपगमयेः (अस्माकम्) (ततः) तस्मात् स्थानात् (परि) पृथग्भावे (दुःष्वप्न्यम्) दुष्टस्वप्नभावम् (सर्वम्) (द्विषते) शत्रवे (निः दयामसि) दय दानगतिरक्षणहिंसादानेषु। अपगमयामः बहिष्कुर्मः ॥

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    भाषार्थ

    जो दुःस्वप्न (अनास्माकः) हमारा नहीं रहा, (तत्) उस (देवपीयुः) दिव्यगुणनाशक (पियारुः) दुःखदायक दुःस्वप्न को [हम में से प्रत्येक] (प्रतिमुञ्चताम्) त्याग दे। (न) जैसे [कि मृत व्यक्ति] (निष्कम्) सुवर्णनिर्मित हार को त्याग देता है। (ततः परि) तत्पश्चात् (अस्माकम्) हमारे से (नव अरत्नीन्) नौ अरत्नियां दूर (अपमयाः) हे दुःस्वप्न! तू चला जा। (सर्वम्) सब (दुष्वप्न्यम्) दुःस्वप्नों और उनके दुष्परिणामों को (द्विषते) द्वेष्यपक्ष में (निर्दयामसि) हम सब निर्दयतापूर्वक फैंक देते हैं।

    टिप्पणी

    [प्रतिमुञ्चताम्= इस पद के दो अर्थ होते हैं, पहिनना तथा त्याग देना। दुःस्वप्न को त्यागा जाता है, पहिना नहीं जाता। प्रतिमुञ्च=यथा-“गृहीतप्रतिमुक्तस्य” (रघुवंश ४।४३), तथा-“अमुं तुरङ्गं प्रतिमोक्तुमर्हसि” (रघुवंश ३।४६) में “प्रतिमुञ्च्” का अर्थ-त्यागना, छोड़ना। दुःस्वप्न की दृष्टि से ही "मृतक व्यक्ति" का अध्याहार किया है। "नव अरत्नीन्"=अरत्नि का अर्थ "मुट्ठि" भी होता है। यथा अरत्निः=sometimes the fist itself (आप्टे), अर्थात् कभी-कभी अरन्ति का अर्थ मुट्ठि भी होता है। अङ्गूठे के मूलभाग से यदि मुट्ठि को नापा जाय, तो प्रायः करके औसतन ९ मुट्ठियों के परिमाण वाला शरीर होता है । अतः "नव अरत्नीन्" का अभिप्राय है- ९ मुट्ठि परिमाण वाला शरीर । उस समग्र शरीर से दुःस्वप्न को निकाल देना, यह अर्थ यहां अभिप्रेत है । अपमयाः=अप+मय् (गतौ)। निर्दयामसि=निर् +दय् (गतौ, हिंसा)।]

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    विषय

    'अनास्माकं' दुःष्वप्न्य

    पदार्थ

    १. दुष्ट स्वप्नों का कारणभूत मल (अनास्माक:) = हमारा अहितकर है। तत्-यह देवपीयु: दिव्यगुणों का हिंसक है। (पियारु:) = शारीरिक शक्तियों का विनाशक है। यह दु:ष्वप्न्य हमें इसप्रकार प्रतिमुञ्चयताम्-छोड़ दे [quit, leave, abandon] इव-जैसेकि निष्कम्-एक स्नानार्थी को गले का हार छोड़ देता है। वह जैसे हार को उतार कर अलग रख देता है, इसीप्रकार यह दु:ष्वप्न्य हमसे पृथक् हो जाए। हे स्वप्न! इस दुःष्वप्न्य को अस्माकम्-हमारे ततः परि उन इन्द्रियों व शरीरगृहों से पृथक् करके अब (नव अरत्नीन्) = नौ हाथ (अपमया:) = दूर ले-जा [मय गतौ] न दुःष्वप्न्य होगा, न अशुभ स्वप्न आएँगे। २. (सर्व दुःष्वप्न्यम्) = सब दुःष्वप्नों के कारणभूत मलों को (द्विषते) = शत्रु के लिए (निर्दयामसि) = अपने से बाहर भेजते हैं। यह दु:ष्वप्न्य हमें छोड़कर द्विषत् पुरुषों को प्राप्त हो।

    भावार्थ

    दु:ष्वप्न्य हमसे दूर हो, यह द्विषन् पुरुषों को प्राप्त हो। सब दु:ष्वज्यों को दूर करके और परिणामतः अपने से 'देवपीयुत्व व पियारु' को भी दूर करता हुआ अपने देवत्व का वर्धन करता हुआ यह 'ब्रह्मा' बनता है। यही अब इस काण्ड में अन्त तक सूक्तों का ऋषि है

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Duh-Svapna

    Meaning

    Let him who is not ours, who hurts the divines, who is mischievous, own and wear the evil dream as gold. Throw away the evil dream nine cubits far from where we are. We throw out all evil dreams for that part of our value system which we hate and reject.

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    Translation

    May he, who is not one of us; is a revile of the: enlightened ones and a mocker, wear that like a golden necklace. May the bad dream get nine cubits away rom us - even farther than that AIl: the bad dreams; we do send out to the malicious enemy.

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    Translation

    I know this dream as it is in reality, this s just like a horse. As a horse throws away dust from body by trembling, as it throws away its gird so let it shake the mischief-causing trouble to organs and mind which is foreign to us and also shake off the bad dream which occurs in us, occurs in cows and which occurs in the men of our house,

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    Translation

    Whatever evil effects of the drowsiness there are in us, in our cattle or our homes, let all those be borne like an ornament, by the mischief-monger who hates the noble persons, other than ourselves. O bad dream, get thee off nine cubits away from us all around. We totally expell all this laziness to¬ wards the enemy.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ५−(अनास्माकः) म० ४। योऽस्माकं न भवति सः (तत्) दुःष्वप्न्यम् (देवपीयुः) म० ४। विदुषां हिंसकः (पियारुः) म० ४। दुःखप्रदः (निष्कम्) सुवर्णम् (इव) यथा (प्रति मुञ्चताम्) धारयतु (नव) (अरत्नीन्) अ+ऋ गतौ-कत्नि, रत्निर्बद्धमुष्टिकरः स नास्ति यत्र। विस्तृतकनिष्ठाङ्गुलिमुष्टिकहस्तप्रमाणानि (अपमयाः) मय गतौ भ्वादिः, लेट् णिजर्थः। अपगमयेः (अस्माकम्) (ततः) तस्मात् स्थानात् (परि) पृथग्भावे (दुःष्वप्न्यम्) दुष्टस्वप्नभावम् (सर्वम्) (द्विषते) शत्रवे (निः दयामसि) दय दानगतिरक्षणहिंसादानेषु। अपगमयामः बहिष्कुर्मः ॥

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