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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 57 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 57/ मन्त्र 4
    ऋषिः - यमः देवता - दुःष्वप्ननाशनम् छन्दः - षट्पदोष्णिग्बृहतीगर्भा विराट्शक्वरी सूक्तम् - दुःस्वप्नानाशन सूक्त
    50

    तं त्वा॑ स्वप्न॒ तथा॒ सं वि॑द्म॒ स त्वं स्व॒प्नाश्व॑ इव का॒यमश्व॑ इव नीना॒हम्। अ॑नास्मा॒कं दे॑वपी॒युं पिया॑रुं वप॒ यद॒स्मासु॑ दुः॒ष्वप्न्यं॒ यद्गोषु॒ यच्च॑ नो गृ॒हे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तम्। त्वा॒। स्व॒प्न॒। तथा॑। सम्। वि॒द्म॒। सः। त्वम्। स्व॒प्न॒। अश्वः॑ऽइव। का॒यम्। अश्वः॑ऽइव। नी॒ना॒हम्। अ॒ना॒स्मा॒कम्। दे॒व॒ऽपी॒युम्। पिया॑रुम्। व॒प॒। यत्। अ॒स्मासु॑। दुः॒ऽस्वप्न्य॑म्। यत्। गोषु॑। यत्। च॒। नः॒। गृ॒हे ॥५७.४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स त्वं स्वप्नाश्व इव कायमश्व इव नीनाहम्। अनास्माकं देवपीयुं पियारुं वप यदस्मासु दुःष्वप्न्यं यद्गोषु यच्च नो गृहे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तम्। त्वा। स्वप्न। तथा। सम्। विद्म। सः। त्वम्। स्वप्न। अश्वःऽइव। कायम्। अश्वःऽइव। नीनाहम्। अनास्माकम्। देवऽपीयुम्। पियारुम्। वप। यत्। अस्मासु। दुःऽस्वप्न्यम्। यत्। गोषु। यत्। च। नः। गृहे ॥५७.४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 57; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    बुरे स्वप्न दूर करने का उपदेश।

    पदार्थ

    (स्वप्न) हे स्वप्न ! (तं त्वा) उस तुझको (तथा) वैसा ही (सम्) पूरा-पूरा (विद्म) हम जानते हैं, (सः त्वम्) सो तू, (स्वप्न) हे स्वप्न ! (अश्वः इव) जैसे घोड़ा (कायम्) अपनी पेटी को, और (अश्वः इव) जैसे घोड़ा (नीनाहम्) अपनी बागडोर [को तोड़ डालता है, वैसे], (अनास्माकम्) हमारे न होनेवाले (देवपीयुम्) विद्वानों के सतानेवाले (पियारुम्) दुःखदायी को (वप) तोड़ डाल और (दुःष्वप्न्यम्) उस दुष्ट स्वप्न को [तोड़ दे], (यत्) जो (अस्मासु) हम में है, (यत्) जो (नः) हमारी (गोषु) गौओं में हैं, (च) और (यत्) जो (गृहे) घर में है ॥४॥

    भावार्थ

    जैसे बलवान् घोड़ा अपनी पेटी और बागडोर को तोड़-ताड़ डालता है, वैसे ही मनुष्य शुभ विचारों द्वारा दुष्ट विचारों को नाश करें और सबको स्वस्थ रक्खें ॥४॥

    टिप्पणी

    ४−(तम्) तादृशम् (त्वा) त्वाम् (स्वप्न) (तथा) तेन प्रकारेण (सम्) सम्पूर्णम् (विद्म) जानीमः (सः) (त्वम्) (स्वप्न) (अश्वः) (इव) यथा (कायम्) स्वशरीरसम्बधिनीं पार्श्वरज्जुम् पेटीम् (अश्वः) (इव) (नीनाहम्) नि+णह बन्धने-घञ्। रश्मिम्। मुखरज्जुम् (अनास्माकम्) युष्मदस्मदोरन्यतरस्यां खञ् च। पा० ४।३।१। अस्मद्-अण्। योऽस्माकं न भवति तम् (देवपीयुम्) अ० ४।३५।७। विदुषां हिंसकम् (पियारुम्) अ० ११।२।२१। पीयतिर्हिंसाकर्मा-निरु० ४।२५। अङ्गिमदिमन्दिभ्य आरन् उ० ३।१३४। अत्र बाहुलकात् पीयतेः-आरुप्रत्ययो ह्रस्वश्च। हिंसकम्। दुःखप्रदम् (वप) डुवप बीजसन्ताने छेदने च। छिन्धि (यत्) (अस्मासु) (दुःष्वप्न्यम्) दुष्टस्वप्नभावः (यत्) (गोषु) धेनुषु (यत्) (च) (नः) अस्माकम् (गृहे) निवासे ॥

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    भाषार्थ

    (स्वप्न) हे भद्र स्वप्न! [मन्त्र ३] (तं त्वा) उस तुझ को (तथा) वैसा अर्थात् भद्र ही (सं विद्म) हम सम्यक् रूप से जानते हैं। (सः त्वं स्वप्न) वह तू हे भद्र स्वप्न! (अश्व इव) अश्व जैसे (कायम्) शरीर को, तथा (अश्व इव) अश्व जैसे (नीनाहम्) बन्धी रस्सी या काठी को झुंझला देता है, वैसे तू उस (दुष्वप्न्यम्) दुःस्वप्न को झुंझला दे, (यत्) जोकि अब (अनास्माकम्) हमारा नहीं है। (देवपीयुम्) जो दिव्य विचारों और दिव्य भावनाओं का विनाशक, तथा (पियारुम्) दुःखदायी है। तथा (यद्) जो दुःस्वप्न अभी (अस्मासु) हम में (गृहे) तथा हमारे गृहवासियों में है, (च यद्) और जो (गोषु) पार्थिव भूखण्डों में है, उसे (वप) छिन्न-भिन्न कर दे।

    टिप्पणी

    [भद्र स्वप्न= स्वप्न दो प्रकार के होते हैं-भद्र और अभद्र। भद्र तो वे हैं जो कि सुखदायक और कल्याणकारी हैं। यथा स्वप्न में भी सद्विचारों का उठना, महात्माओ का संग करना, मन्त्रों तथा ओ३म् का जप आदि। तथा अभद्र स्वप्न वे होते है जो कि दुःखदायक और अकल्याणकारी हैं। भद्र स्वप्नों के द्वारा अभद्र स्वप्नों का शनैः शनैः विनाश करना चाहिए। जागरित अवस्था में सद्विचार, सत्संग, स्वाध्याय, ईश्वरीय भावना आदि द्वारा सत्संस्कार जैसे-जैसे सुदृढ़ होते जायेंगे, वैसे-वैसे स्वप्न भद्र होते जायेंगे, और अभद्र स्वप्न ढीले पड़ते जायेंगे। इस विधि को “वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम्” (योग० २।३३) द्वारा ही निर्दिष्ट किया है। देवपीयुम्, पियारुम्=पीयतिः हिंसाकर्मा (निरु० ४।४।२५)। गोषुः=“गौरिति पृथिव्या नामधेयम्” (निरु० २।२।५)। गोषु=भूखण्डेषु, भूप्रदेशेषु।]

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    विषय

    'देवपीयु-पियारु' अशुभस्वप्न

    पदार्थ

    १. हे (स्वप्न:) = स्वप्न! (तं त्वा) = उस तुझको हम (तथा संविाद्म) = उस प्रकार सम्यक् समझ लें, जिससे कि (सः त्वम्) = वह त, हे स्वप्न | (इव) = जैसे (अश्व:) = एक घोड़ा (कायम्) = अपने रजोधूसर शरीर को कम्पित करता है, अथवा (इव) = जैसे (अश्व:) = घोड़ा (नीनाहम्) = पल्याणकवच [काठी], आदि को दूर फेंक देता है। इसी प्रकार हे स्वप्न ! तू भी (अनास्माकम्) = हमारा हित न करनेवाले, (देवपीयुम्) = दिव्यगुणों का हिंसन करनेवाले पियारुम् शारीरिक शक्तियों के विघातक (दुःष्वप्न्य) = अशुभ स्वप्नों के कारणभूत मल को वप हमसे छिन्न करके दूर कर । २. (यत्) = जो भी अस्मास-हममें (दुःष्वप्न्य) = अशुभ स्वप्नों का कारणभूत मल है, (यत्) = गोषु-जो भी हमारी इन्द्रियों में दोष है, (यत् च) = और जो (न:) = हमारे (गृहे) = घर में-शरीररूप गृह में-(दुःष्वप्न्य) = है, उस सबको दूर कर।

    भावार्थ

    हम प्रयत्न करें कि हमें अशुभ स्वप्न न आएँ। ये हमारे लिए हितकर न होकर हमारी उत्तम प्रवृत्तियों व शरीर की शक्तियों के विध्वंस का कारण बनते हैं।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Duh-Svapna

    Meaning

    O Dream, we know you as you are. Therefore, as a horse shakes its body to get rid of dust or a burden on the back, you throw off the dream which is not our love, which is hurtful to our mind and senses, and which vitiates our soul. Throw off all evil dreams of ours about our cows, our home and our family. Uproot that.

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    Translation

    You as such we know well, O dream May you, O dream like a horse his halter, like a horse his girth, throw of the bad dream that is within us, within our cows, and within our homes on him, who is not one of us, is a reviler of the enlightened ones and a mocker.

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    Translation

    This dream is the binding force of the protective powers of the organs and is the hand of the mind. Whatever is favorable in it be ours and whatever is bad of it we send it to malignancy which malign us. Let this bad dream become the beak of black bird in addition to other cruelties.

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    Translation

    O sleep Or drowsiness, we know thee as such. The self-same thou mayst give a thorough shaking to the evil-doer, the hater of the noblepersons, other than ourselves, just as horse shakes off the dust from his body and the saddle, etc., from his back.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ४−(तम्) तादृशम् (त्वा) त्वाम् (स्वप्न) (तथा) तेन प्रकारेण (सम्) सम्पूर्णम् (विद्म) जानीमः (सः) (त्वम्) (स्वप्न) (अश्वः) (इव) यथा (कायम्) स्वशरीरसम्बधिनीं पार्श्वरज्जुम् पेटीम् (अश्वः) (इव) (नीनाहम्) नि+णह बन्धने-घञ्। रश्मिम्। मुखरज्जुम् (अनास्माकम्) युष्मदस्मदोरन्यतरस्यां खञ् च। पा० ४।३।१। अस्मद्-अण्। योऽस्माकं न भवति तम् (देवपीयुम्) अ० ४।३५।७। विदुषां हिंसकम् (पियारुम्) अ० ११।२।२१। पीयतिर्हिंसाकर्मा-निरु० ४।२५। अङ्गिमदिमन्दिभ्य आरन् उ० ३।१३४। अत्र बाहुलकात् पीयतेः-आरुप्रत्ययो ह्रस्वश्च। हिंसकम्। दुःखप्रदम् (वप) डुवप बीजसन्ताने छेदने च। छिन्धि (यत्) (अस्मासु) (दुःष्वप्न्यम्) दुष्टस्वप्नभावः (यत्) (गोषु) धेनुषु (यत्) (च) (नः) अस्माकम् (गृहे) निवासे ॥

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