अथर्ववेद के काण्ड - 2 के सूक्त 23 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 2/ सूक्त 23/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - आपः छन्दः - एकावसानासमविषमात्रिपाद्गायत्री सूक्तम् - शत्रुनाशन सूक्त
    पदार्थ -

    (आपः) हे जल [जल पदार्थ !] (यत्) जो (वः) तुम्हारा (तपः) प्रताप है, (तेन) उससे (तम् प्रति) उस [दोष] पर (तपत) प्रतापी हो, (यः) जो (अस्मान्) हमसे (द्वेष्टि) अप्रिय करे, (यम्) जिससे (वयम्) हम (द्विष्मः) अप्रिय करें ॥१॥

    भावार्थ -

    वृष्टि, नदी, कूप आदि का जल अनावृष्टि दोषों को मिटाकर अन्न आदि पदार्थों को उत्पन्न करके प्राणियों को बल और सुख देता है और वही कुप्रबन्ध से दुःख का कारण होता है, ऐसे ही राजा सामाजिक नियमों के विरोधी दुष्टों का नाश करके प्रजा को समृद्ध करता और सुख देता है ॥१॥

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