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अथर्ववेद के काण्ड - 2 के सूक्त 31 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 31/ मन्त्र 1
    ऋषिः - काण्वः देवता - मही अथवा चन्द्रमाः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - कृमिजम्भन सूक्त
    134

    इन्द्र॑स्य॒ या म॒ही दृ॒षत्क्रिमे॒र्विश्व॑स्य॒ तर्ह॑णी। तया॑ पिनष्मि॒ सं क्रिमी॑न्दृ॒षदा॒ खल्वाँ॑ इव ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इन्द्र॑स्य । या । म॒ही । दृ॒षत् । क्रिमे॑: । विश्व॑स्य । तर्ह॑णी । तया॑ । पि॒न॒ष्मि॒ । सम् । क्रिमी॑न् । दृ॒षदा॑ । खल्वा॑न्ऽइव ॥३१.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इन्द्रस्य या मही दृषत्क्रिमेर्विश्वस्य तर्हणी। तया पिनष्मि सं क्रिमीन्दृषदा खल्वाँ इव ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इन्द्रस्य । या । मही । दृषत् । क्रिमे: । विश्वस्य । तर्हणी । तया । पिनष्मि । सम् । क्रिमीन् । दृषदा । खल्वान्ऽइव ॥३१.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 2; सूक्त » 31; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    छोटे-छोटे दोषों का भी नाश करे।

    पदार्थ

    (इन्द्रस्य) बड़े ऐश्वर्यवाले जगदीश्वर की (या) जो (मही) विशाल [सर्वव्यापिनी विद्यारूप] (दृषत्) शिला (विश्वस्य) प्रत्येक (क्रिमेः) क्रिमि (कीड़े) की (तर्हणी) नाश करनेवाली है, (तया) उससे (क्रिमीन्) सब क्रिमियों को (सम्) यथानियम (पिनष्मि) पीस डालूँ, (इव) जैसे (दृषदा) शिला से (खल्वान्) चनों को [पीसते हैं] ॥१॥

    भावार्थ

    परमेश्वर अपनी अटूट न्यायव्यवस्था से प्रत्येक दुराचारी को दण्ड देता है, इस प्रकार मनुष्य अपने छोटे-छोटे दोषों का नाश करे। क्योंकि छोटे-छोटों से ही बड़े-बड़े दोष उत्पन्न होकर अन्त में बड़ी हानि पहुँचाते हैं। जैसे कि शिर वा उदर में छोटे-छोटे कीड़े उत्पन्न होकर बड़ी व्याकुलता और रोग के कारण होते हैं ॥१॥ इस सूक्त में क्रिमियों के उदाहरण से क्षुद्र दोषों के नाश का उपदेश है ॥ इस सूक्त और आगामी सूक्त का मिलान अथर्ववेद का० ५ सूक्त २३ से कीजिये ॥

    टिप्पणी

    १–इन्द्रस्य। परमैश्वर्यवतः परमात्मनः। मही। मह पूजायाम्–अच्। षिद्गौरादिभ्यश्च। पा० ४।१।४१। इति ङीष्। मह्यते मही। महती। विशाला। दृषत्। दृणातेः षुग्घ्रस्वश्च। उ० १।१३१। इति दृ विदारे–अदि प्रत्यये–धातोः षुग् ह्रस्वश्च। दीर्यते यया। शिला। क्रिमेः। क्रमितमिशतिस्तम्भामत इच्च। उ० ४।१२२। इति क्रमु पादविक्षेपे–इन्, कित्, अत इत्। कृमेः। क्षुद्रजन्तोः कीटस्य। विश्वस्य। सर्वस्य। प्रत्येकस्य। तर्हणी। तृह हिंसे–करणे ल्युट्। ङीप्। हन्त्री। पिनष्मि। पिष्लृ संचूर्णे। संचूर्णयामि। क्रिमीन्। कीटान्। दृषदा। शिलया। खल्वान्। सर्वनिघृष्व०। उ० १।१५३। इति खल संचये–वन्। चणकान्–इति सायणः ॥

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    विषय

    मही दृषत्

    पदार्थ

    १. (इन्द्रस्य) = जितेन्द्रिय पुरुष को (या) = जो (मही) = महनीय (दुषत्) = शिला है, अर्थात् [मही-पृथिवी] पत्थर के समान दृढ़ यह शरीररूप पृथिवी है, यह (विश्वस्य क्रिमे:) = शरीर में प्रविष्ट हो जानेवाले कृमियों का (तर्हण)-नाश करनेवाली है। जब एक व्यक्ति जितेन्द्रिय बनता है तब उसका शरीर पत्थर के समान दृढ़ हो जाता है। इस शरीर में जो भी रोगकृमि प्रवेश करते हैं, वे इस जितेन्द्रिय की वीर्यशक्ति से कम्पित होकर नष्ट हो जाते हैं। २. (तया) = उस महनीय दृषत् से मैं (क्रिमीन्) = इन रोगकृमियों को ऐसे (संपिनष्मि) = पीस डालता हूँ, (इव) = जैसे (दृषदा) = पत्थर से (खल्वान्) = [चणकान् सा०] चनों को पीस डालते हैं।

    भावार्थ

    जितेन्द्रिय पुरुष का शरीर एक महनीय दृषत् के समान होता है, जिससे रोगकृमि इसप्रकार पिस जाते हैं, जैसे पत्थर से चने।

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    भाषार्थ

    (इन्द्रस्य) परमेश्वर की (या) जो (मही दुषत्) बड़ी शिला है, (विश्वस्य क्रिमेः) सब क्रिमियों की (तर्हणी) हिंसा अर्थात् हनन करनेवाली, (तया) उस द्वारा (क्रिमीन्१) क्रिमियों को (सम् पिनष्मि) सम्यकतया मैं पीसता हूँ, (दृषदा) पत्थर की चक्की द्वारा (इव) जैसे (खल्वान्) चणों को पीसा जाता है।

    टिप्पणी

    [परमेश्वर की महती शिला है, सूर्यरूपी शिला। सौरचिकित्सा का वर्णन है, सूर्य की रश्मियों के प्रयोग द्वारा क्रिमियों के नाश का विधान हुआ है। शरीरान्तर्गतान् सर्वान् क्षुद्रजन्तून् (सायण) । इससे प्रकट होता है कि मन्त्र में रोगजनक कीटाणुओं (germs) का वर्णन हुआ है। ये अदृष्ट कीटाणु हैं, (मन्त्र २) । अदृष्ट, जोकि अतिसूक्ष्म होने से आँख से देखे नहीं जा सकते।] [१. कृञ् हिंसायाम् (क्र्यादिः) तथा कृ हिंसायाम् (भ्वादिः)।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Afflictive Germs and Insects

    Meaning

    Mighty is the destructive force of Indra: rays of the sun, gusts of the wind, currents of electricity, showers of clouds, running waters and catalytic fragrances of yajna, these are destroyers of dangerous insects and germs of disease. With these and with the resistant force of the body, I crush the germs and insects as I crush hard grain with the grinding stone.

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    Subject

    Mahi (Earth)

    Translation

    With the resplendent Lord’s great grinding tone which is a sure crusher of all the worms, I crush the worms to bits, as they grind and pound vetches and entails with mill-stone.

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    Translation

    As the grain is crushed with stone so I crush the germs of diseases with the stone (or calcium preparation) which is the great production of the Indra the mighty heat inside the earth and destroyer of all the germs.

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    Translation

    With soul’s mighty millstone that which crushes worms of every sort, I bray and bruise the worms to bits like vetches on the grinding stone. [1]

    Footnote

    [1] Millstone means power. Worms means spiritual vices, which eat into the vitals of of our souls, as worms in the belly eat our body.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १–इन्द्रस्य। परमैश्वर्यवतः परमात्मनः। मही। मह पूजायाम्–अच्। षिद्गौरादिभ्यश्च। पा० ४।१।४१। इति ङीष्। मह्यते मही। महती। विशाला। दृषत्। दृणातेः षुग्घ्रस्वश्च। उ० १।१३१। इति दृ विदारे–अदि प्रत्यये–धातोः षुग् ह्रस्वश्च। दीर्यते यया। शिला। क्रिमेः। क्रमितमिशतिस्तम्भामत इच्च। उ० ४।१२२। इति क्रमु पादविक्षेपे–इन्, कित्, अत इत्। कृमेः। क्षुद्रजन्तोः कीटस्य। विश्वस्य। सर्वस्य। प्रत्येकस्य। तर्हणी। तृह हिंसे–करणे ल्युट्। ङीप्। हन्त्री। पिनष्मि। पिष्लृ संचूर्णे। संचूर्णयामि। क्रिमीन्। कीटान्। दृषदा। शिलया। खल्वान्। सर्वनिघृष्व०। उ० १।१५३। इति खल संचये–वन्। चणकान्–इति सायणः ॥

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